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इकोनॉमिक सर्वे में सेहत को लेकर किस बड़े खतरे की बात कही गई है?

आर्थिक समीक्षा 2025-26 में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स और डिजिटल एडिक्शन को दो बड़ी चुनौतियों के तौर पर बताया गया है और साथ ही इनके समाधान के बारे में बात की गई है

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लगातार दूसरी बार आर्थिक समीक्षा में जंक फूड के खतरे को लेकर बात की गई है
अपडेटेड 1 फ़रवरी , 2026

जनवरी की 29 तारीख को संसद में पेश आर्थिक समीक्षा 2025-26 में स्वास्थ्य के विषय में बात करते हुए दो समस्याओं को खास तौर पर रेखांकित किया गया. पहला अल्ट्रा प्रोसेस्ड फ़ूड और दूसरा डिजिटल एडिक्शन. 

अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स पर लगातार दूसरे साल आर्थिक समीक्षा में बात की गई है. आर्थिक समीक्षा में न सिर्फ इन दोनों समस्याओं पर बात की गई बल्कि इनके समाधान की राह भी सुझाई गई है.

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन के जरिए तैयार की गई आर्थिक समीक्षा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPF) पर लगातार दूसरे साल चर्चा की गई है. इससे यह पता चलता है कि यह समस्या कितनी गंभीर हो गई है. आर्थिक समीक्षा 2025-26 में इसको लेकर कहा गया है कि स्वस्थ आबादी किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था की नींव है. लेकिन, ये समस्याएं उत्पादकता घटाने, स्वास्थ्य खर्च बढ़ाने के साथ ही दीर्घकालिक आर्थिक बोझ डालने का खतरा पैदा कर रहे हैं.

दरअसल, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स वैसे खाद्य पदार्थ हैं, जो फैक्ट्री में भारी प्रोसेसिंग से गुजरते हैं. रोजमर्रा के जीवन से इसके उदाहरण के तौर पर चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स, पैकेटेड स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स, चॉकलेट्स और प्रोसेस्ड मीट का नाम लिया जा सकता है. इसके बारे में आर्थिक समीक्षा कहती, ''UPF पारंपरिक आहार पैटर्न को विस्थापित कर रहे हैं और आहार की गुणवत्ता को खराब कर रहे हैं. साथ ही ये कई क्रॉनिक बीमारियों के जोखिम को भी बढ़ा रहे हैं.''

क्रोनिक डिजीज वे बीमारियां हैं जो लंबे समय तक रहती हैं और धीरे-धीरे बढ़ती हैं. अक्सर पूरी तरह ठीक नहीं होतीं बल्कि उन्हें नियंत्रित करना पड़ता है, जैसे मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, अस्थमा और गठिया. भारत UPF की बिक्री के लिहाज से दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है. ऐसे खाद्य पदार्थों की बिक्री भारत में 2006 के 0.9 अरब डॉलर के मुकाबले 2019 में 38 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी.

आखिर अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स की समस्या इतनी गंभीर क्यों है? आर्थिक समीक्षा में प्रख्यात स्वास्थ्य जर्नल लैंसेट के रिसर्च का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि UPF के ज्यादा इस्तेमाल से से मोटापा, क्रॉनिक हार्ट डिजीज, श्वसन संबंधी बीमारियां, डायबिटीज और मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याएं जुड़ी हुई हैं.

UPF के संदर्भ में आर्थिक समीक्षा मोटापा की समस्या के बारे में भी विस्तार से बात करती है. यह एक तथ्य है कि भारत में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) के आंकड़ों से पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों में मोटापा ग्रामीण इलाकों से ज्यादा है और अब यह युवाओं में भी फैल रहा है. 

इस बारे में आर्थिक समीक्षा चेतावनी देती है कि मोटापा अब सिर्फ अमीरों की समस्या नहीं रहा बल्कि यह मध्यम और निम्न आय वर्गों में भी घुसपैठ कर रहा है. समीक्षा में यह भी कहा गया है कि मोटापा बढ़ने से स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च तो बढ़ता ही है लेकिन साथ ही साथ लोगों के उत्पादकता में कमी आती है और इससे पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में अनुमानित बताया गया है कि मोटापा और इससे जुड़ी बीमारियां भारत की GDP पर 2 फीसद तक प्रभावित कर रही है. 

पिछले साल की आर्थिक समीक्षा में भी UPF पर जोर दिया गया था. आर्थिक समीक्षा 2024-25 में इसे गैर-संचारी रोगों (NCD) का प्रमुख कारण बताया गया था. इस साल की आर्थिक समीक्षा में इस बारे में और गहराई से चर्चा की गई है. समीक्षा कहती है कि भारत में बढ़ते शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और मार्केटिंग के प्रभाव से UPF की खपत बढ़ रही है. आर्थिक समीक्षा यह भी कहती है कि सेलिब्रिटी इंडोर्समेंट, इमोशनल सेलिंग और बच्चों को टारगेट करने वाली विज्ञापन रणनीतियां भी इस समस्या को बढ़ा रही हैं.

विज्ञापनों में इंस्टेंट फूड्स को 'क्विक और कन्वीनिएंट' बताकर बेचा जाता है. यह व्यस्त शहरी जीवन में रह रहे लोगों को अपील तो करता है लेकिन स्वास्थ्य को काफी नुकसान पहुंचाता है. आर्थिक समीक्षा में कहा गया है, ''UPF की मार्केटिंग चुनौतियां इतनी बड़ी हैं कि इन्हें सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखा जाना चाहिए.''

आर्थिक समीक्षा में डिजिटल एडिक्शन को एक उभरती हुई महामारी के तौर पर बताया गया है. समीक्षा में यह भी कहा गया है कि डिजिटल एडिक्शन युवाओं और बच्चों के लिए एक नई व्यवहारिक स्वास्थ्य चुनौती यानी विहेविरल हेल्थ चैलेंज बनकर उभरा है. आम तौर पर बच्चों और किशोरों में यह डिजिटल एडिक्शन स्मार्टफोन, गेमिंग और सोशल मीडिया के बहुत अधिक इस्तेमाल की वजह से विकसित हो रहा है.

इस बारे में आर्थिक समीक्षा कहती है, ''डिजिटल एडिक्शन युवाओं में चिंता, डिप्रेशन और इमोशनल डिस्ट्रेस को बढ़ा रहा है और साथ ही शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है.'' NFHS और कई दूसरे अध्ययनों के हवाले से समीक्षा बताती है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम से नींद में कमी, प्रोडक्टिविटी में कमी और पढ़ाई के समय का नुकसान हो रहा है. साथ ही समीक्षा यह भी कहती है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सामाजिक तुलना से बच्चों और किशोरों में तनाव बढ़ रहा है और इससे मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ रहा है.

भारत में बढ़ते स्मार्टफोन के इस्तेमाल को भी इस समस्या की एक वजह के तौर पर देखा जा रहा है. केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 2025 में भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों की संख्या 85 करोड़ के पार पहुंच गई. इसी संदर्भ में आर्थिक समीक्षा में इस बात पर चिंता जताई गई है कि बच्चे और युवा औसतन छह से आठ घंटे स्क्रीन पर बिता रहे हैं और इससे सिडेंटरी लाइफस्टाइल को बढ़ावा मिल रहा है.

इस वजह से मोटापा और डायबिटीज जैसी समस्याएं भी बच्चों और युवाओं में दिख रही है. समीक्षा में यह भी कहा गया है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम से तनाव बढ़ता है और इससे खानपान की आदतें प्रभावित हो रही हैं. समीक्षा में कहा गया है, ''डिजिटल एडिक्शन एक उभरती हुई व्यवहारिक स्वास्थ्य समस्या है. यह शिक्षा और नौकरियों को प्रभावित कर रही है.''

इन समस्याओं के समाधान के लिए आर्थिक समीक्षा कई स्तर पर काम करने की जरूरत बताती है. समीक्षा में कहा गया है कि UPF की समस्या से निपटने के लिए आहार सुधारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता बनानी होगी. समीक्षा में एक सुझाव यह भी दिया गया है कि UPF पर सभी मीडिया में सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक मार्केटिंग बैन लगे.

साथ ही UPF पर सबसे ऊंची दर की GST लगाने की सिफारिश भी समीक्षा में की गई है. साथ ही सेलिब्रिटी इंडोर्समेंट और इमोशनल सेलिंग पर रोक लगाने की बात भी समीक्षा में कही गई है. पोषण और जागरूकता अभियानों पर जोर देते हुए आर्थिक समीक्षा सुझाती है कि स्कूलों में हेल्दी ईटिंग की शिक्षा दी जाए और पारंपरिक आहार को प्रमोट किया जाए.

डिजिटल एडिक्शन की समस्या के लिए आर्थिक समीक्षा कई सिफारिशें करती है. इनमें ऑनलाइन सुरक्षा दिशानिर्देश तैयार करने के अलावा मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइंस और क्लीनिक्स स्थापित करने की बात भी कही गई है. साथ ही युवाओं के लिए अलग हब बनाकर उनके बीच ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देने की बात भी आर्थिक समीक्षा कहती है.

समीक्षा में कहा गया है कि डिजिटल एडिक्शन को रोकने के लिए स्कूलों में स्क्रीन टाइम लिमिट और पैरेंटल कंट्रोल्स को प्रोत्साहित किया जाए. साथ ही AI और डिजिटल टूल्स से 'हेल्थ हॉटस्पॉट्स' की पहचान करने की सिफारिश भी समीक्षा में की गई है.

इन दोनों समस्याओं के अलावा आर्थिक समीक्षा में स्वास्थ्य सिस्टम को मजबूत बनाने पर जोर दिया गया है. इसमें भी प्रिवेंटिव हेल्थकेयर पर खास फोकस दिया गया है. इसके लिए गैर संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए खान-पान और लाइफस्टाइल में बदलाव की बात भी आर्थिक समीक्षा करती है. 

देश के डिजिटल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार करने का सुझाव भी समीक्षा देती है. आर्थिक समीक्षा 2025-26 स्वास्थ्य को आर्थिक विकास की कुंजी मानते हुए यह कहती है, ''स्वस्थ व्यक्ति ही मजबूत राष्ट्र बनाते हैं.'' अब देखना होगा कि 1 फरवरी यानी रविवार को आने वाले 2026-27 के बजट में इन सुझावों को अपनाकर क्या नई घोषणाएं होती हैं.

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