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पृथ्वी दिवसः कोरोना संकट ने चेताया, धरती सिर्फ इंसानों की नहीं

एक गणना के मुताबिक, इस समय दुनिया में वजन किए जाने लायक जीवों की कुल संख्या का 90 फीसद हिस्सा या तो इंसान हैं या उसके पालतू पशु. धरती पर जिंदगी की शुरुआत हुए कोई 4 अरब साल हुए हैं. पर अभी तक भूवैज्ञानिक समय के इतिहास में कोई समय ऐसा नहीं रहा जब किसी नस्ल ने अपने दम पर पूरे विश्व की पारिस्थितिकी को बदलकर रख दिया हो.

फोटो साभार-इंडिया टुडे
फोटो साभार-इंडिया टुडे
अपडेटेड 22 अप्रैल , 2020

पृथ्वी दिवस की पचासवीं वर्षगांठ पर हम एक महामारी के दौर में साफ आबो-हवा, साफ माटी और साफ-सुथरी नदियां देख पा रहे हैं. प्रदूषण कम हुआ है. चिड़ियों का चहचहाना सुनाई देने लगा है, सड़कों पर जंगली जानवर भी दिख रहे हैं. क्या हमने कभी सोचा है कि यह धरती सिर्फ इंसानों की नहीं है.

पृथ्वी दिवस की पचासवीं वर्षगांठ पर एक उत्परवर्ती (म्यूटेट) वायरस की दहशत से सही, इंसान घरों में कैद है. आसमान फिर से नीला दिखाई देने लगा है, आप फेफड़ों में साफ हवा को गहरे खींच सकते हैं.

गाड़ियों से निकला अधजला जीवाश्म ईंधन हवा को जहरीला नहीं बना रहा है. गाड़ियों के इंजनों और हॉर्न के शोर की बजाए परिंदों का चहचहाना सुनाई पड़ रहा है. गंगा-यमुना जैसी देश भर की नदियां फिर से जी उठी हैं.

क्या हम इंसानों ने खुद को देवता मान लिया था? कम से कम उन जानवरों के संदर्भ में देखिए, जो जंगलों में रहते हैं या फिर जिन्हें हम अपने मेन्यू में शामिल करने के लिए या यूं ही शौकिया पालते हैं उनके नजरिए से देखें तो इंसानों ने खुद को देवता जैसी स्थिति में तो ला ही दिया था. हम जब भी धरती को, पूरे ग्लोब को देखते हैं वह नीला ग्रह हमें याद दिलाता है कि धरती असल में पानी से भरी है.

हम बर्फ से ढंकी चोटियों और जंगलों की बात करते हैं तो हमें नेट जियो और डिस्कवरी और यहां तक कि एनीमेशन फिल्मों के जरिए बताया जाता है कि जंगलों पर जंगली जानवरों का राज है. कि, एक सिम्बा होता है जो जंगल से सभी जीवों का राजा होता है. कि, एक बिग वेड वूल्फ होता है, कि मोगली जंगल-जंगल फूल खिलाता हुआ बघीरा के साथ मिलकर शेर खान से मुकाबिल है.

पर यह महज कहानियां हैं.

सचाई यह है कि यह धरती तो महज इंसानों और उनके पालतू पशुओं से आबाद है. बिग बेड वूल्फ की परीकथाओं वाले जर्मनी में महज सौ भेड़िए मौजूद हैं जबकि इसी जर्मनी में 50 लाख कुत्ते रहते हैं. इसकी तुलना पूरी दुनिया से करिए, जहां जंगलों में 2 लाख भेड़िए मौजूद हैं जबकि पूरी दुनिया में पालतू कुत्तों की संख्या 40 करोड़ है.

युवाल नोआ हरारी अपनी मशहूर किताब होमो डेयस में इसको लेकर कुछ दिलचस्प मिसालें देते हैं. मसलन, दुनिया भर में 60 करोड़ पालतू बिल्लियां हैं, जबकि शेर सिर्फ 40 हजार हैं. अफ्रीकी जंगली भैंसे सिर्फ 9 लाख हैं जबकि पालतू गायों की संख्या 1.5 अरब है. पेंगुइ 5 करोड़ हैं और चूजे (चिकन) 20 अरब हैं.

1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद से दुनिया भर में जंगलों और वन्य जीवन को लेकर जागरूकता भले ही बढ़ी है, लेकिन वन्य जीवों की संख्या आधी ही रह गई है.

हरारी के मुताबिक, 1980 में यूरोप में जंगली परिंदों की संख्या 2 अरब थी, 2009 में यह घटकर 1.6 अरब रह गई. जबकि इसी साल 2009 में, यूरोपवासियों ने अपने डाइनिंग टेबल के लिए 1.9 अरब चूजे पैदा किए.

एक गणना के मुताबिक, इस समय दुनिया में वजन किए जाने लायक जीवों की कुल संख्या का 90 फीसद हिस्सा या तो इंसान हैं या उसके पालतू पशु.

धरती पर जिंदगी की शुरुआत हुए कोई 4 अरब साल हुए हैं. पर अभी तक भूवैज्ञानिक समय के इतिहास में कोई समय ऐसा नहीं रहा जब किसी नस्ल ने अपने दम पर पूरे विश्व की पारिस्थितिकी को बदलकर रख दिया हो.

पहले भी नस्लें लुप्त होती रही हैं. जाहिर है आपके दिमाग में डायनोसोर या ऐसी ही किसी प्रजाति की तस्वीर उभर रही होगी. पर उसकी या उस जैसी प्रजातियों की विलुप्ति के पीछे जलवायु परिवर्तन, भौगौलिक कारण (ज्वालामुखीय घटनाएं या भूकंप) या क्षुद्रग्रहों का धरती से टकराना रहा था.

हमने, यानी इंसानों ने अपने विकास के साथ खेल के नियम ही बदल डाले हैं. जंगली जीवन से लेकर पहाड़, झरने, नदियां सब हमारी दया पर हैं.

पर, कुदरत को लेकर हमारी मनमानी के बीच कोई न कोई शह तो कुदरत के पास भी होती है. और तब हमें किसी अर्धजीव से डरकर लॉकडाउन में बंद रह जाना पड़ता है.

आज बुरी वजहों से सही, लेकिन नदियों से लेकर हवा तक साफ है. यकीन मानिए यह पृथ्वी का प्रतिशोध है. धरती पर इंसानों का जितना हक है उतना ही एक खरगोश का भी. हम जिस दिन इसे समझ जाएंगे, हमें जंगल बचाने के लिए अधिनियम और कानून नहीं बनाने होंगे.

(मंजीत ठाकुर इंडिया टुडे के विशेष संवाददाता हैं)

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