हास्यास्पद और बेढंगे में ठीक-ठीक क्या फर्क है? वे एक जैसा अर्थ देते हैं. यहां भाषा विज्ञान बहुत मदद नहीं कर पाता. क्यों? अब भाषा में तो कोई पोप होता नहीं कि उसका कहा ही कानून हो जाए, इसलिए इस क्यों का हमें कोई जवाब नहीं मिल पाएगा. मेरे ख्याल से यह विचार कि हास्यास्पद प्रभाव से संबंधित है और बेढंगा भाव से, शायद वर्णनातीत को न्यायोचित ठहराने के लिए खींचे गए साहित्यिक दंभ से अधिक कुछ नहीं है.
चूंकि अच्छी-बुरी तमाम तरह की सूचियां साल के अंत के कर्मकांडों का एक सहज हिस्सा हैं तो परंपरा का सम्मान करने में किसी को खुशी ही महसूस हो सकती है. दो छोटी सूचियों से काम चल जाएगाः सर्वाधिक हास्यास्पद, और सर्वाधिक बेढंगे. राजनीति का चप्पा-चप्पा खंगालना समस्या खड़ी करता है. वहां बहुत अधिक चीजों में से चुनना है. यह इतनी मेहनत लायक काम नहीं लगता. इस तड़क-भड़क वाले क्षेत्र, सत्ता और भ्रष्टाचार के बहुत घटिया स्तरों वाले क्षेत्र से बाहर फसल कहीं अधिक बेहतर रही है.
04 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
28 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
बीते साल 2011 की ओर मुड़कर देखें तो मैंने ऑस्ट्रेलिया के 'अग्निपथ दौरे' पर जा रही अपनी क्रिकेट टीम को सौरव गांगुली के इस संदेश से ज्यादा हास्यास्पद कुछ भी नहीं सुना-निडर बनो ! उसके बाद उन्होंने खुद अपनी निडरता में एक जयगीत जोड़ा. वह बहुत ढीठ और मूर्खतापूर्ण था. अपने रिटायर होने के बहुत पहले से ही गांगुली अपनी गर्दन से क्रिकेट खेलने लगे थे- उनकी गर्दन, उठती गेंद के खिलाफ उनके बैट से ज्यादा तेज थी. एक से ज्यादा मौकों पर मैच के पहले दिन हरी पिच देखकर गांगुली की पीठ में रहस्यमय दर्द उभर आया था. दुनिया के तेज गेंदबाजों को जब भी मजाक की कमी होती तो उन्हें सिर्फ यह करना पड़ता कि वे गेंद के रास्ते से हटने की कोशिश करते हुए गांगुली का एक वीडियो देखते और जश्न शुरू हो जाता.
21 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
गांगुली के पास स्टाइल तो था, मगर उनमें साहस का अभाव था. यह बात तो ठीक है कि कोई पूर्ण नहीं होता. वीरेंद्र सहवाग के पास बाल्टी भर साहस है और डोल भर प्रतिभा, मगर उनके निर्णय-क्षमता की माप आपको चम्मच से ही करनी पड़ेगी. यही हैं वे. स्वीकार करिए या छोड़ दीजिए, और हमने खुशी-खुशी उन्हें स्वीकार किया है क्योंकि सहवाग की उपस्थिति उनकी विदाई की सिसकियों से बहुत अधिक भारी बैठती है. दूसरी तरफ यदि आप बेढंगेपन का कोई नमूना पाना चाहें तो उस रफ्तार को देख सकते हैं जिससे सहवाग की खोपड़ी पर दोबारा बाल उग रहे हैं.
अब चूंकि हमने सहवाग के बाल प्रत्यारोपण की गति का अध्ययन करने के लिए उन पर निगाह नहीं रखी है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
2011 में स्थापित बेढंगेपन की चोटियों के लिए हमें अन्य जगहों पर अपनी नजरें दौड़ानी पड़ेंगी. यह तो सर्वविदित है कि प्रेस परिषद के चेयरमैन न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू का दिल सही जगह पर है और उनकी तीक्ष्ण बुद्धि उन लोगों के समान है जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की बेंच में स्थान प्राप्त किया है.
14 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
07 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
सेक्स सर्वे: तस्वीरों से जानिए कैसे बदल रहा है भारतीय समाज
मगर उनके दिमाग को यदा-कदा अंतरिक्ष की सैर पर निकलना पसंद है. पत्रकारों की जमीर के रखवाले और धर्मपिता के अपने नए अवतार में उन्होंने कहा है कि पत्रकार अनपढ़ और नीरस हो सकते हैं और अपने दफ्तर में अफीम सी पिनक का मजा लेने वाले भी. उनकी आदर्श दुनिया में क्रिकेट और देव आनंद की मौत की खबरें मुखपृष्ठ के लायक नहीं हैं. ऐसे ओलंपियाई स्तरों के हिसाब से भविष्य में उनके पास काफी काम रहने वाला है, इसलिए आइए उन्हें नए साल की शुभकामनाएं दें.
मगर मि.र्जा गालिब और शरतचंद्र चटोपाध्याय को भारतरत्न दिए जाने के लिए उनका अभियान बेढंगा है. मेरे बड़े व्यक्तिगत पश्चातापों में से एक उर्दू की अपर्याप्त जानकारी और फारसी की अज्ञानता हैः जो दो किताबें मैं कहावतों वाले मरुस्थलीय द्वीप में भी ले जाना पसंद करूंगा, वे हैं शेक्सपीयर और गालिब का समग्र साहित्य. गा़लिब की शायरी शाश्वत है.
30 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
मगर उनके विचार सदैव आधुनिक भारत की कहानी से सरोकार नहीं रखते. 1857 के दौर में गालिब जीवित थे. उन्होंने निर्मम ब्रिटिश सेना के हाथों 23 मुगल शहजादों को फांसी पर लटकते और दिल्लीवालों का भयानक कत्लेआम होते देखा. जैसा कि उनकी डायरी, दस्त अम्बूह से जाहिर है कि गालिब की रुचि आजादी की लड़ाई की बजाए रानी विक्टोरिया से पेंशन पाने में अधिक थी. इससे उनकी शायरी का महत्व कम नहीं होता मगर यह उनकी राजनीति पर सवाल जरूर खड़े करती है.
23 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे16 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
किसी नादान पत्रकार की अपेक्षा न्यायमूर्ति काटजू ने लाखों किताबें जरूर अधिक पढ़ी होंगी मगर शायद उन्होंने जोया चटर्जी की बंगाल डिवाइडेड (कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस 1996) नहीं देखी अन्यथा उन्होंने 1926 में दिए गए शरतचंद्र, जो निस्संदेह महान साहित्यकार थे, के एक भाषण पर अवश्य ध्यान दिया होता. यहां पूरा भाषण प्रकाशित करने की जगह तो नहीं है मगर आपको कुछ वाक्यों से ही अंदाजा मिल जाएगा-और मेरा भरोसा कीजिए मैं अधिक वीभत्स अंशों को छोड़े दे रहा हूं, ''सच तो यह है कि यदि मुसलमान कभी भी यह कहें कि वे हिंदुओं के साथ एकता चाहते हैं तो इससे बड़ा झंसा और कोई नहीं हो सकता. हिंदुस्तान में मुसलमानों का आगमन, राज्य स्थापित करने के लिए नहीं लूटने के लिए हुआ था...एकता कव्वल बराबरी वाले लोगों के बीच ही हो सकती है...हिंदू-मुसलमान एकता एक शब्दाडंबरपूर्ण नारा भर है. हिंदुस्तान हिंदुओं की जन्मभूमि है.'' वगैरह-वगैरह.
9 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे2 नवंबर 201: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
शरतचंद्र का भारत वह भारत नहीं था जिसके लिए महात्मा गांधी जीवित रहे और जिसके लिए उन्होंने अपने प्राण भी न्यौछावर किए. अतीत की अपनी महिमा होती है. अतीत की अपनी दुविधाएं होती हैं. अतीत की अपनी गलतियां होती हैं. अतीत का अपना क्रोध होता है.
क्या हम भारत रत्न को उन लोगों के लिए सुरक्षित रखेंगे जिन्होनें ऐसे भविष्य के लिए संघर्ष किया जिसमें सभी भारतीय एक समान हैं?

