अगर आप उत्तरी भारत में रहते हैं, खासकर कश्मीर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच के किसी इलाके में, तो आपके शहर-गांव का आसमान भी अभी बादलों से भरा होगा. 15 और 17 अप्रैल को बरसात की संभावनाएं भी हैं और खेतों में खड़ी रबी की फसल के लिए आशंकाएं भी. लेकिन अगली खरीफ के लिए जरूरी दक्षिण-पश्चिम मॉनसून का इस बार इंतजार लंबा नहीं खिंचेगा.
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि अगले 40 दिनों में ही बंगाल की खाड़ी में मॉनसून बनना शुरू हो जाएगा. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस बार मई में हिंद महासागर में एमजेओ सक्रिय रहेगा. हालांकि, यह अनुमान जितने दिन या हफ्तों आगे का होता है उसकी संभाव्यता उतनी कम होती जाती है.
ब्यूरो ऑफ मेटरोलॉजी 45 दिन पहले ही एमजेओ का पूर्वानुमान लगाता है.
ब्यूरो के इस बार के अनुमान के मुताबिक, "हिंद महासागर में एमजेओ की मौजूदगी दर्ज की जा रही है. यह उसी वक्त हिंद महासागर में रहेगा जब मॉनसून अंडमान –निकोबार द्वीपसमूह के आसपास रहेगा. यह समय मई के दूसरे पखवाड़े की शुरुआत में होगा."
ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि मॉनसून तेज़ होकर सही वक्त पर केरल तट पर अपनी आमद दर्ज कराएगा.
असल में, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की बरसात और एक हद तक अर्थव्यवस्था की अवस्था के लिए भी मॉनसून की सेहत का ठीक रहना बेहद अहम है. और मॉनसून की सेहत का अंदाजा लगाने के लिए मौसम वैज्ञानिकों के लिए कुछ खास तकनीकी शब्द चर्चा में आते रहते हैं. इनमें से एक तो अलनीनो है जिसके बारे में काफी बातचीत होती रहती है.
वैसे अलनीनो के साथ ही एमजेओ और आइओडी ऐसी शब्दावलियां हैं जिनका सकारात्मक होना, भारत की धरती पर मॉनसून की पहली बूंद गिरने से पहले ही उम्मीद की फसलों को लहलहा देती हैं. यह तिकड़ी अमूमन हमें अपनी ताकत और अपनी भूमिका का सशक्त अहसास कराती रहती हैं.
मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली निजी एजेंसी स्काईमेट के मुताबिक, “साल 2019 का मॉनसून एक तरह से यादगार ही रहेगा. बढ़ते अलनीनो ने पहले तो जून तक बरसात को बिलंवित कर दिया. बाद में एमजेओ और आइओडी ने आकर अपना असर दिखाया और किसानो की खुशी बढ़ गई. यह एक ऐतिहासिक अध्याय है”
वैसे, मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक अलनीनो 9 से 12 महीनों तक बना रहता है, आइओडी (इंडियन ओशन डायपोल) 4 से 6 महीने तक और एमजेओ यानी मैडन जूलियन ऑशिलेशन मॉनसून के दौरान लहरों की तरह कुछ दिनों और कुछ वक्त के लिए आता है. असल में अलनीनो, आइओडी और एमजेओ की तिकड़ी में एमजेओ का पूर्वानुमान लगाना सबसे मुश्किल होता है. लोगों को इसके बारे में मालूमात भी कम ही है.
स्काइमेट के मुताबिक, “एमजेओ का मॉनसूनी बरसात पर नाटकीय प्रभाव पड़ता है. अलनीनो और आइओडी तो स्थायी भाव के होते हैं पर एमजेओ उष्णकटिबंधीय इलाकों में भूमध्य रेखा के आसपास के इलाकों में बादलों, बारिश की मात्रा और तरीके, हवा और वायुदाब के संतुलन को गड़बड़ कर देता है.”
एमजेओ का औसत चक्र 30 से 60 दिन का होता है जबकि अलनीनो और आइओडी कई सीजन तक टिके रहते हं.
सुविधा के लिए मौसम वैज्ञानिकों ने इस धरती को आठ चरणों में बांट रखा है. पर भारतीय मॉनसून के लिए एमजेओ वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय रहा है, क्योंकि यह न सिर्फ सूखे, बाढ़ और मॉनसून को ब्रेक करने के लिए जिम्मेदार हो सकता है बल्कि यह हीट वेव (लू) को भी ताकतवर बना सकता है.
इस वैज्ञानिक अनुमान लगा रहे हैं कि मई के दूसरे और तीसरे हफ्ते के समय हिंद महासागर में एमजेओ की उपस्थिति उत्साहवर्धक बात है और इससे मॉनसून की गति तेज होगी और वह सही वक्त पर भारतीय भूमि पर दस्तक देगा.
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