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नाटक: इंकलाबी लेखन के अहम दस्तावेज

सत्ता और साहित्य (विशेषतः रंगकर्म) के संबंध हमेशा तनावपूर्ण ही रहे हैं. देशकाल कोई भी हो और व्यवस्था चाहे राजशाही हो, तानाशाही या फिर लोकशाही-हमेशा रंगकर्म को शक की नजर से देखती है.

अपडेटेड 10 जनवरी , 2012

सितम की इन्तिहा क्या है?
सत्येंद्र कुमार तनेजा
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवान दास रोड, नई दिल्ली,
कीमतः 500 रु.

सत्येंद्र कुमार तनेजाः वैज्ञानिक दृष्टि

सत्ता और साहित्य (विशेषतः रंगकर्म) के संबंध हमेशा तनावपूर्ण ही रहे हैं. देशकाल कोई भी हो और व्यवस्था चाहे राजशाही हो, तानाशाही या फिर लोकशाही-हमेशा रंगकर्म को शक की नजर से देखती है. सत्ता का मूल चरित्र यथास्थितिवादी होता है और नाटक  स्वभावतः परिवर्तन कामी. मानव जाति का इतिहास इस तथ्य की गवाही देता है कि रूप चाहे कोई भी हो, सेंसर, पाबंदी और प्रतिबंध शासनतंत्र के मुख्य हथियार रहे हैं. आईना देखना उसे कभी गवारा नहीं होता.
प्रतिष्ठित नाट्यालोचक सत्येंद्र कुमार तनेजा की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक सितम की इन्तिहा क्या है? में संकलित सात जब्तशुदा हिंदी नाटक भावोद्रेक में साधारण लेखकों द्वारा लिखे होने के बावजूद ब्रिटिश सरकार के छल, दमन और अन्याय की आपबीती का ऐसा सजीव चित्रण है, जिसके अक्स मात्र से विदेशी सत्ता की चूलें हिलने लगती हैं. लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी और दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार से इन जब्तशुदा नाटकों को पाने  और इन्हें छापने की अनुमति पाने में आजादी के छह दशक बाद भी वर्षों लग गए.
पूर्व पीठिका के अलावा इस पुस्तक के दूसरे खंड का पहला नाटक कुली प्रथा (1916) सुप्रसिद्ध लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान के पति ठाकुर लक्ष्मण सिंह का लिखा है, जिसमें कुछ धन-लोलुप भारतीयों को ही इस्तेमाल करके अंग्रेजों ने धर्म और धन के नाम पर बहुसंख्यक निर्धनों को मजदूर/कुली बनाकर विदेश भेजा. किशन चंद जेबा का जख्मी पंजाब (1922) जलियांवाला बाग के नृशंस हत्याकांड की त्रासदी पर आधारित है. शासन की पोल (1922) असहयोग आंदोलन के संदर्भ में लिखा गया एक एकांकी है. प्रसिद्ध रचनाकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र का लघु नाटक लाल क्रांति के पंजे में (1924) रूस की जनक्रांति और उसके नायक 'महात्मा लेनिन' के प्रसंग से आजादी की बात उठाता है. गोविंद राम सेठी का बरबादिए हिंद (1929) सधा-मंजा पारसी शैली का अच्छा नाटक है, जो भारत की तत्कालीन दुर्दशा का चित्रण करता है. रक्त ध्वज (1931) भूख और क्रांति का अधूरा किंतु उत्तेजक नाटक है. बुद्धिनाथ झा द्विज 'कैरव' का लवण-लीला (1931) गांधी की दांडी यात्रा से प्रभावित एक रोचक प्रयोग है. इन सभी नाटकों की भूमिकाओं में रचनाकारों और रचनाओं की व्याख्या और विवेचना करते हुए समीक्षक-संपादक ने अपनी तटस्थ दृष्टि और परिपक्व वैचारिकता का गंभीर परिचय दिया है.
यहां संकलित नाटकों में सशस्त्र क्रांतिवादी नाटकों के मुकाबले अहिंसक क्रांतिपरक नाटकों की संख्या कम नहीं है. परंतु सारे विवेचन, विश्लेषण का मूल स्वर सशस्त्र क्रांति के पक्ष में है. हालांकि लेखक बार-बार अपने आप और अपने पाठक को याद दिलाता चलता है कि आजादी की लड़ाई में गांधी का ''सत्याग्रही सिद्धांत किसी क्रांतिकारी पहल से कम नहीं है.'' परंतु शीर्षकों के चुनाव तथा विप्लवी-वृत्ति के मुकाबले गांधीवाद को 'याचना-वृत्ति' कहना लेखक की पक्षधरता का स्पष्ट प्रमाण है. नैतिक आत्मबल और साध्य के साथ साधन की पवित्रता पर टिकी गांधीवादी दृष्टि के संदर्भ में यह कहना भी उचित नहीं है कि  ''हिंसा और अहिंसा की बेबाकी के प्रतिपादन से सभी बचते रहे.'' यह निष्कर्ष गांधी के साथ-साथ सशस्त्र क्रांतिकारियों के प्रति भी न्याय नहीं करता कि ''व्यवहार में उन्हें अहिंसा-कवच का लाभ उठाकर हिंसा द्वारा लक्ष्य सिद्ध करने में कोई हर्ज नहीं लगा.''
खैर, वर्षों की लगन, मेहनत, वैचारिक ईमानदारी और शोधपरक वैज्ञानिक दृष्टि से लिखी गई दस्तावेजी महत्व की यह एक जरूरी किताब है.

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