scorecardresearch

डॉक्टरों की हड़ताल ने मरीजों को बेहाल कर डाला

प्रदेश में डॉक्टरों की लंबी हड़ताल ने एक बार फिर गहलोत सरकार का नाकारापन उजागर किया. हड़ताल से मरीजों का बुरा हाल है.

इलाज की टूटी आस
इलाज की टूटी आस
अपडेटेड 3 जनवरी , 2012

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पिछले बुधवार को जब कहा कि 21 दिसंबर से जारी डॉक्टरों की हड़ताल में भारतीय जनता पार्टी का हाथ है, तो उनके इस बयान को कांग्रेस आलाकमान में गहलोत के कुछ हमदर्दों के सिवा किसी ने तवज्‍जो नहीं दी. वे हमदर्द जो नाकामी को ढकने के लिए उनके इस तरह के बयानों को फौरन लपक लेते हैं.

04 जनवरी 2012: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

प्रदेश में डॉक्टरों की मौजूदा हड़ताल बेसुध गहलोत सरकार का एक और खास नमूना है. डॉक्टरों के साथ 11 जुलाई को हुए समझौते पर अमल के लिए सरकार 20 दिसंबर तक नहीं जगी. डॉक्टरों की शिकायत जायज है. राज्‍य में डॉक्टर दशकों से निजी प्रैक्टिस के अलावा दवा कंपनियों और मेडिकल जांच की प्रयोगशालाओं के कमीशन से कमाते आ रहे हैं. उनकी तनख्वाह कम है. मेडिकल कॉलेजों के प्रोफेसरों को भी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अपने समकक्षों के मुकाबले एक-तिहाई सैलरी ही मिलती है.

इस नजरिए का नतीजा यह रहा कि ज्‍यादातर डॉक्टरों ने शोध आदि में ज्‍यादा समय न देकर निजी प्रैक्टिस पर ध्यान देना मुनासिब समझा. वह भी ड्यूटी के घंटों में. अमूमन होता यह है कि सरकारी सेवा से रिटायर होने पर डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस भी काफी घट जाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि उनमें से कई स्वतंत्र रूप से प्रतिष्ठित डॉक्टर के रूप में खुद को नहीं जमा पाते और उनके ज्‍यादातर मरीज भी उन अस्पतालों से भेजे गए लोग होते हैं जहां वे तैनात होते हैं.

28 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

हालात बदलने शुरू हुए थे. युवा डॉक्टरों की बढ़ती संख्या से हालात ऐसे मुकाम तक पहुंच गए, जहां निजी प्रैक्टिस की कमाई भी घटने लगी. सरकार के पास सुनहरा मौका था. वह निजी प्रैक्टिस छोड़ने वाले डॉक्टरों को ऊंची तनख्वाह की पेशकश करके उन्हें शोध के लिए समय देने को प्रोत्साहित कर सकती थी. हालांकि इस तरह के किसी भी सुझाव का उन वरिष्ठ डॉक्टरों की ओर से जोरदार विरोध होता है जो निजी प्रैक्टिस से ज्‍यादा कमाते हैं. सरकार के पास गहलोत की ढर्रे वाली उस पुरानी राय से अलग कोई दृष्टि भी नहीं.

28 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

यही कारण है कि उनके पद संभालने के बाद से डॉक्टर कई बार हड़ताल कर चुके हैं. जाहिर है, इसका चिकित्सा सेवाओं पर बुरा असर होता है. मसलन, जोधपुर में प्रसूताओं की मौतें हुईं. इससे खराब चिकित्सा सुविधा के साथ-साथ बेहतर क्वालिटी की ग्लूकोज की बोतलों की सप्लाई की नाकामी भी उजागर हुई. ऐसी ही घटनाओं की कड़ी में बच्चों को संक्रामक खून चढ़ा दिया गया. स्वाइन फ्लू फैला तो प्रशासन सो रहा था. कई घटनाएं 'ईं जब मरीजों के तीमारदारों ने डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए उनकी धुनाई कर दी. यह सच है राज्‍य में डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत बड़ा दबाव है.

14 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

डॉक्टरों को काम का सुरक्षित माहौल मुहैया कराने या उनसे बातचीत करने की बजाए गहलोत ने कुछ इस तरह के बयान दिए ''निजी डॉक्टर पैसा बनाने के लिए मुर्दों को भी वेंटीलेटर पर रखते हैं. डॉक्टर कमीशन से कमाई करते हैं और जब हमने मरीजों को मुफ्त दवा उपलब्ध कराई तो उन्होंने हड़ताल कर दी. वे काम पर न लौटे तो जनता उन्हें सबक सिखाएगी.'' इन बयानों से जाहिर है कि गहलोत ने शुरू से ही डॉक्टरों के पेशे के खिलाफ खुंदक पाल रखी है. तभी तो गिरफ्तार डॉक्टरों से बातचीत के लिए सरकार ने उन्हें किसी गेस्टहाउस में रखने की बजाय जेलों में डाल दिया.

डॉक्टरों के खिलाफ गहलोत के इस अनर्गल बयान की पहले भी तीखी आलोचना हुई है. भाजपा और कुछ दूसरे पह्नों ने इस सब के बजाए चिकित्सा सेवाओं को सुधारने के लिए कदम उठाने को कहा है. डॉक्टरों के खिलाफ कठोर कार्रवाई दिखाकर गहलोत एक तरह से शुद्ध राजनीति कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि लोग अपने कष्टों के लिए डॉक्टरों पर ही नाराज होंगे. स्वास्थ्य राज्‍यमंत्री राजकुमार शर्मा कहते हैं कि डॉक्टरों की मांग पर खुद गहलोत ही नजर रख रहे हैं. गहलोत यह दिखाना चाहते हैं कि स्वास्थ्य मंत्री दुर्रू मियां की मातहती में स्वास्थ्य और चिकित्सा विभाग ठीक से काम नहीं कर रहा. सो डॉक्टरों की मांग पर फैसले में देरी होती गई. अब खुद गहलोत पर ही आरोप हैं कि वे बहुत ही सुस्ती से काम करते हैं जो नाकामियां छिपाने की खास शैली है.

07 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

प्रदेश में मरीजों का हाल बेहाल है. निजी क्षेत्र से मदद लेने की गहलोत की कोशिशें भी कामयाब नहीं हो पाईं. डॉक्टरों ने ठीक ही कहा है कि उन पर ऑपरेशन करने के लिए दबाव नहीं डाला जा सकता. सरकार ने उन पर आयकर और भ्रष्टाचार निरोधक छापों की धमकी दी है. आवश्यक सेवा बनाए रखने का कानून लागू करने के बाद वह डॉक्टरों को बर्खास्त कर रही है. मौजूदा हड़ताल गहलोत की नाकामी की एक और मिसाल है.

साथ में विजय महर्षि

Advertisement
Advertisement