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बॉलीवुड में बाढ़ आ गई है डर्टी-नॉटी डायलॉग्‍स की

हिंदी फिल्मों की भाषा नटखट हो गई है. यहां तक कि 'यू' और 'यूए' सर्टिफिकेट वाली फिल्मों में सेक्स से जुड़े डायलॉग और गालियों का खूब इस्तेमाल हो रहा है.

अपडेटेड 11 मार्च , 2012

‘हैलो.’

‘हैलो मीरू!’

‘हां, मैं अभी-अभी मॉल से आई हूं. नया सलवार कमीज लेकर आई हूं चुन्नी वाला, हाय! मैं तो चाहती हूं जैसे ही मैं वहां पहुंचूं न बिट्टू मेरी ले ले! बेशक चलती में ले ले!’

‘हां, मैं भी लाल रंग की साड़ी लेकर आई हूं. वो मेरी साड़ी में लेगा क्या?’

सब की लेगा बिट्टू बॉस. 13 अप्रैल को रिलीज हो रही फिल्म 'बिट्टू बॉस' का प्रोमो ऐसा ही है. फिल्म के प्रोमो और डायलॉग डबल मीनिंग होने के कारण सुर्खियों में हैं. आखिर बिट्टू बॉस है कौन? फिल्म के निर्देशक सुपवित्र बाबुल कहते हैं, ‘बिट्टू एक फोटोग्राफर है. और यह बरसों पुराना डायलॉग है कि शादी में फोटोग्राफर से हर कोई यही कहता है कि मेरी ले न. जिनके पास अच्छा सेंस ऑफ ह्यूमर है, उन्हें ये डायलॉग गलत नहीं लगेंगे.’

गलत और सही के बीच का फर्क अब सूत भर का रह गया है. बॉलीवुड का कहना है कि लोग ऐसे ही बात करते हैं. बात-बात पर गाली देना कोई फिल्मों ने नहीं सिखाया है. पिछले दो साल में ऐसी दर्जन से ज्‍यादा पॉपुलर फिल्में आई हैं जिनमें गालियों का धुआंधार इस्तेमाल किया गया है. 'द डर्टी पिक्चर', 'देलही बेली' और 'इश्किया' जैसी फिल्मों से भाषा ने अपने कपड़े उतार दिए हैं. लगता नहीं कि इससे किसी को शिकायत है.

'द डर्टी पिक्चर' के डायलॉग राइटर रजत अरोड़ा कहते हैं, ‘फिल्मों की लैंग्वेज कहानी और किरदारों के इर्द-गिर्द बुनी जाती है. 'द डर्टी पिक्चर' एक बोल्ड अभिनेत्री की कहानी है जो सबका ध्यान अपनी ओर खींचना चाहती है, और जिसके लिए वह बोल्ड बातों का सहारा लेती है.’

बदलते दौर के साथ बॉलीवुड की भाषा भी बदली है. हालांकि इसकी घोषणा 'देहली बेली' की रिलीज के मौके पर फिल्म के निर्माता आमिर खान ने कुछ यूं की थी, ‘देहली बेली (2011) में कोई सेक्स सीन नहीं है. पर मुझे लगता है कि इसने फिल्म इंडस्ट्री में बोल्ड फिल्मों की परिभाषा ही बदल दी.’

आमिर की भविष्यवाणी सच हुई. इसका विस्तार 'द डर्टी पिक्चर' (2011) में देखने को मिला. इसकी सफलता ने भाषा के नए जायके को सबके सामने बखूबी पेश किया. फिल्म में विद्या बालन के बोल्ड अंदाज और लच्छेदार भाषा ने कमाई के नए रिकॉर्ड कायम किए. विद्या उर्फ सिल्क फिल्म में यह कहती हैं, ‘मुझे जो चाहिए, उसका मजा सिर्फ रात को ही आता है.’ हॉल में जमकर तालियां बजीं.

इस तरह कभी आर्ट फिल्मों तक सीमित रहने वाले शब्दों ने मुख्यधारा की फिल्मों में बड़ी बेबाकी से अपनी जगह बना ली है. फिल्मों में अश्लील शब्दों और गालियों के बढ़ते चलन के बारे में लेखक और गीतकार जयदीप साहनी कहते हैं, ‘असल में समाज बहुत तेजी से बदल रहा है. फिल्मों में एक नया एक्सप्रेशन उभर रहा है, जो अभी पूरी तरह से पका नहीं है. इसमें अभी हमारे ट्रेडिशनल एक्सप्रेशन जितनी परिपक्वता और रिचनेस नहीं आई है. जब तक यह भाषा समृद्ध नहीं होगी, इस तरह के प्रयोग होते रहेंगे.’

लैंग्वेज में आई इस बेबाकी की कुछ महक हाल ही में रिलीज फिल्म 'लंदन पेरिस न्यूयॉर्क' के एक दृश्य पर नजर डालने से मिल जाती है. अली जफर और अदिति राव हैदरी बातें करते हैं, अलीः ‘तुम एक नंबर की टीस हो’. अदितिः ‘मेरी गलती है कि तुम एक नंबर के ठरकी हो.’ एक मैं और एक तू में करीना कपूर इमरान खान से उनकी पुरानी गर्ल फ्रेंड के साथ डेट के बारे में कहती हैं, ‘उसने तुम्हारी सही बजा दी होगी.’

इन फिल्मों में अश्लील शब्द कॉमन हो गए हैं. बम्म, फट्टू, लगा दी, व्हाट द फ*, अबे चू****, ठरकी, फट गई क्या और इस तरह की कई अन्य वर्जित मानी जाने वाली बातों का इस्तेमाल हर दूसरी फिल्म में दिख रहा है. रजत कहते हैं, ‘फिल्मों में कंटेंपररी लैंग्वेज इस्तेमाल हो रही है और हम इस तरह ही बोलते हैं.’

एक समय था, जब सिर्फ आर्ट फिल्मों में ही ऐसी भाषा का इस्तेमाल होता था. 50-60 की उम्र वाले दर्शकों को याद होगा कि '84-'85 के दौर में मशहूर अभिनेता दादा कोंडके की हास्य फिल्में जैसे 'अंधेरी रात में दिया तेरे हाथ में' अपने द्विअर्थी संवादों, गीतों और कोंडके की अश्लील मुद्राओं के कारण सुपर हिट रही थीं. सिचुएशन इनमें गढ़ी जाती थीं और हास्य के नाम पर खुले हाथ सोसाइटी के बंद दरवाजों पर दस्तक दी गई. हां, इन फिल्मों में गालियां नहीं हैं, पर भारत के रूढ़िग्रस्त समाज में उस वक्त यह आगे का दौर तो था ही जो अपना उदाहरण खुद ही था.

लेकिन 'बैंडिट क्वीन' (1994) में फूलन देवी के किरदार में सीमा बिस्वास ने जब मां-बहन की गालियों से अपना गुस्सा निकाला तो फिल्म को सेंसर बोर्ड के काफी कट से गुजरना पड़ा. मेनस्ट्रीम सिनेमा में गालियों का दौर 'सत्या' (1998) के साथ शुरू माना जा सकता है, जिसमें चू**** शब्द का इस्तेमाल हुआ.

इसके बाद जैसे फिल्मों में इस तरह के शब्दों का दौर ही शुरू हो गया. सत्या के लेखक सौरभ शुक्ला कहते हैं, ‘हमने जो भी शब्द प्रयोग किए वे कैरेक्टर के मुताबिक थे. कुछ समय पहले तक फिल्मों में बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल नहीं हुआ करता था. वह सिर्फ गढ़ी हुई होती थी. अब ऐसा नहीं है.’ बेशक 'कांटे' (2002) और अनुराग कश्यप की 'ब्लैक फ्राइडे' (2004) सरीखी कई फिल्में आईं. इससे पहले एक ऐसा दौर था जब फिल्मों में इश्क और एनआरआइ विषय काफी हावी थे. और इन फिल्मों की भाषा भी उसी तरह की गढ़ी हुई थी.

जयदीप कहते हैं, ‘सत्या और 'ब्लैक फ्राइडे' में डायलॉग के जरिए माहौल को दिखाने का बेहतरीन उदाहरण है. अब आप सोचिए, ये पात्र लोकल लैंग्वेज न बोलकर परिष्कृत भाषा बोलते तो क्या होता.’

एक समय विलेन और बाद में कुछ इक्का-दुक्का हीरो की जुबान से बोल्ड डायलॉग निकलते थे लेकिन हाल के दौर में शीर्ष अभिनेत्रियां भी गालियां देने में किसी से पीछे नहीं हैं. बोल्ड संवादों की दौड़ देखें तो इसमें करीना कपूर, विद्या बालन, रानी मुखर्जी और कंगना रनौत अपने साथी कलाकारों से आगे नजर आती हैं.

'चमेली', 'गोलमाल-3', 'जब वी मेट' और 'रा.वन' में करीना कपूर ने ऐसे घुमा-फिरा कर गालियां दागी हैं कि अच्छे-अच्छों की छुट्टी कर दी. 'रा.वन' का यह संवाद, ‘तेरे बाप का भोचड़, तेरे ताऊ का पोड़ा...’ काफी कुछ कह जाता है. 'नो वन किल्ड जेसिका' (2011) में बोल्ड पत्रकार बनीं रानी ने ऐसी-ऐसी बातें कहीं कि सबकी बोलती बंद कर दी. आइ एम बिच तो उनका तकिया कलाम था. फिल्म 'बिच्छू' (2000) में चू**** शब्द एक झटके में बोल गई थीं.

'इश्किया' का चूतियम सल्फेट और 'द डर्टी पिक्चर' का एंटरटेनमेंट विद्या के लिए सुर्खियों के साथ हिट का फॉर्मूला बन गया. कंगना रनौत ने 'तनु वेड्स मनु' में कुछ इस तरह माधवन को डांटा, ‘अबे चू** शादी के दिन शादी को मना करेगा क्या...’ फिल्म इसी बेबाकी के कारण हिट रही. हालांकि 'राज-2' में भी उन्होंने कुछ भयंकर गालियां बकी हैं, लेकिन उन्हें कहीं काट दिया गया और कहीं बीप कर दिया गया.

एक समय तक विलेन को ही अभद्र भाषा के लिए जाना जाता था. लेकिन 'देहली बेली' में इमरान खान और उनके साथियों ने जमकर अपनी जुबान चलाई. 'कांटे' में सुनील शेट्टी, 'आइ हेट लव स्टोरी' में इमरान खान व्हाट द फ* कहते हैं, '3 इडियट्स' की 'ब्लात्कार स्पीच' तो शायद ही कोई भुला पाए, गोलमाल-1,2 और 3 में तुषार कपूर का गूंगेपन में कई शब्दों का उच्चारण अच्छे से समझ आ जाता है और 'मर्डर-2' में इमरान हाशमी के मुंह से मा***** गाली सुनी जा सकती है.

'बैंड बाजा बारात' के डायलॉग राइटर हबीब फैसल कहते हैं, ‘माहौल और किरदार के मुताबिक डायलॉग रचे जाते हैं. लेकिन लफ्ज स्वाभाविक होने चाहिए, ठूंसे हुए नहीं.’ जयदीप उनकी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं, ‘यह भेड़चाल दुनिया की हर फिल्म इंडस्ट्री में हमेशा से रही है और हमेशा रहेगी क्योंकि फिल्मों में पैसा लगाने वालों को किसी सचमुच नई चीज के बजाय हाल ही में चली हुई चीज में पैसा लगाना ज्‍यादा आसान और कम जोखिम वाला लगता है.’

इस चलन से फिल्म के कंटेंट को लेकर निर्माताओं के दबाव और मार्केटिंग का हस्तक्षेप कुछ-कुछ साफ हो जाता है. एक लेखक नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘किसी फिल्म के हिट हो जाने पर निर्माता उसी तरह के डायलॉग की मांग करने लगता है. ऐसे में उसका दखल कहानी में बढ़ जाता है. यही नहीं, अगर फिल्म में कोई हटकर सीन या डायलॉग है तो वह उसे भी प्रमोट करने पर आमादा हो जाते हैं.’ कई मामलों में तो लेखकों को पता ही नहीं होता कि उन्होंने क्या डायलॉग लिखा था और उसका किस सीन में प्रयोग किया गया.

बेशक फिल्म इंडस्ट्री में रियलिस्टिक सिनेमा के नाम पर गालियों और द्विअर्थी शब्दों का प्रयोग किया जा रहा हो, लेकिन ऐसे भी लेखक और लोग हैं जो मानते हैं कि इस पर कुछ काबू होना चाहिए. सौ करोड़ रु. की कमाई करने वाली 'अग्निपथ' के लेखक पीयूष मिश्र कहते हैं, ‘बेशक मेट्रोपोलिटन शहरों और सिनेमाघरों में कुछ तालियां बज जाएं, लेकिन जबरदस्ती इस तरह के प्रयोगों को बहुत अच्छा नहीं माना जा सकता.’

कुछ समय से सेंसर का रवैया भी कुछ नरम पड़ा है. सेंसर बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन की सीईओ पंकजा ठाकुर इस बारे में कहती हैं, ‘हम बोर्ड की भूमिका को सेंसर की बजाए फिल्म सर्टिफिकेशन तक सीमित रखना चाहते हैं. क्या देखना है, क्या नहीं, यह लोगों के विवेक पर है.’

इस तरह के कंटेंट के दर्शकों पर असर के बारे में दिल्ली के मैक्स हेल्थकेयर के साइकियाट्रिस्ट समीर पारिख कहते हैं, ‘बेशक रियलिस्टिक सिनेमा दिखाएं. लेकिन सब कुछ नेगेटिव भी तो नहीं है. फिल्म निर्माताओं को पॉजिटिव चीजें भी देखनी चाहिए. फिर जिसमें कुछ अश्लील या कुछ खराब बातें हैं, उन्हें ए सर्टिफिकेट देने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए.’

सवाल यह है कि फिल्मों में किस तरह के शब्दों का प्रयोग हो और किन शब्दों का नहीं. लेकिन रजत अरोड़ा इसे कुछ यूं बयान करते हैं, ‘देहली बेली' की बदौलत अब किसी के लिए कोई बड़ी गाली की बजाए सिर्फ डीके बोस कह देना भर ही काफी हो गया है. ‘

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