नए साल के मौके पर हम दिल खोल कर शुभकामनाएं बांटते हैं क्योंकि उसके बाद 364 दिनों तक इसके दर्शन की उम्मीद कम ही रहती है. लेकिन हमारी जिंदगी से एक और साल बीत जाने के इस मौके पर मोबाइल और दूसरी तरह की शुभकामनाओं की बाढ़ को निराशावादी नजरिए से देखना मन खराब कर लेने जैसा होगा. शुभकामनाओं की अपने हिस्से की नन्ही-सी पोटली हथिया लेने के बाद मैंने यह दर्ज कर लेना मुनासिब समझा कि 2012 की मेरी पांच सर्वोपरि इच्छाएं क्या हैं.
पहली इच्छाः संसद के बजट सत्र में लोकपाल बिल का नाम बदलकर धोखापाल बिल करने के लिए सर्वदलीय प्रस्ताव लाया जाना चाहिए. फर्क तो आप समझ ही गए होंगे. आपको वे तेवर और जुमलेबाजियां तो याद ही होंगी, जिसमें लपेट-लपेटकर सियासी दलों ने सार्वजनिक जीवन में शुचिता लाने की लंबी-लंबी डींगें हांकी थीं.
सभी पार्टियों ने तो नहीं पर हां, लालू यादव और उनके सांसदों ने ईमानदारी के साथ यह तर्क दिया था कि भारतीय लोकतंत्र में दही के लिए जामन की तरह थोड़ी-सी बेईमानी जरूरी है. लेकिन कांग्रेस और भाजपा तो पूरे तैशो-तेवर के साथ यही जताने-बताने में उलझी रहीं कि दोनों में से ज्यादा सफेद कमीज किसकी है.
उसके बाद किसी गुंडे के आयकर रिटर्न सरीखे सीधे-सपाट चेहरे के साथ दोनों पार्टियों ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी.
राजनीति में शुचिता के लिए काम कर रहे एनजीओ नेशनल इलेक्शन वाच के मुताबिक, कांग्रेस ने आपराधिक रिकॉर्ड वाले 26, समाजवादी पार्टी ने 24 और भाजपा ने ऐसे 20 प्रत्याशियों को टिकट दिए हैं. अभी तो आगाज हुआ है. समझएि कि यह संख्या तिगुनी तक तो पहुंचेगी ही.
मायावती भी इसमें बढ़-चढ़कर योगदान देंगी. पूरे पांच साल तक मंत्री बनाए रखने के बाद अंत में जाकर उन्हें इलहाम हुआ कि अरे, वे तो सब दंदफंदी और छलिया हैं. विशेषज्ञ उत्तर प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा का अनुमान कर रहे हैं. मेरे पास एक हल है, जिस पर राज्यपाल को जरूर सोचना चाहिए. उन्हें सभी दलों से चुने गए अपराधियों को निर्देश देना चाहिए कि वे एक मंच पर आकर सीपीए (चोप्रग) यानी चोर प्रगतिशील गठबंधन बना लें.
उनकी संख्या बहुमत के लिए जरूरी 201 से ऊपर तो हो ही जाएगी और वे लखनऊ में एक स्थिर सरकार बना सकेंगे. 2018 तक लूटपाट के चक्कर में वे एक-दूसरे को ठिकाने लगा डालेंगे. यह जनता के लिए एक बोनस की तरह होगा.
दूसरी इच्छाः संविधान में एक संशोधन के जरिए सियासी शब्दावली में 'गठबंधन' शब्द पर पाबंदी लगा देनी चाहिए. एकता के लिए जरूरी तत्व जब प्रतिबद्धता की बजाए सुविधा हो जाए तो उस दशा में एलायंस (गठबंधन) की बजाए डलायंस (मौज-मस्ती) ज्यादा उपयुक्त शब्द होता है. कांग्रेस ने बंगाल से वामपंथियों को उखाड़ फेंकने के लिए ममता बनर्जी की तृणमूल के साथ एलायंस नहीं, डलायंस किया.
फौरी मकसद पूरा होते ही रिश्ते की गंभीरता खत्म; आधुनिकतावादियों के शब्दों में कहें तो यह एक 'मनमर्जी' के संबंध में तब्दील हो गई. दोनों पक्ष जब जिधर जाना चाहें, जाएं. दिल दुखने-दुखाने का सवाल नहीं, कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं, कोई बहस नहीं. नतीजाः बेबाकी. मिसालः चोर प्रोग्रेसिव एलायंस की बजाए चोर डलायंस ज्यादा सटीक रहेगा.
तीसरी इच्छाः बेबाकी की खुराक अच्छी होती है. यह हमेशा और-और की रट लगाती रहती है. इस इच्छा को भले मुंगेरीलाल का सपना कह लीजिए, पर क्या सरकार अपने इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों में और बेबाकी/स्पष्टता ला सकती है? अल्पसंख्यकों को नौकरियों में आरक्षण का वादा किया गया (पर अभी तक मिलीं नहीं) तो फिर कांग्रेस उसे सिर्फ मुसलमानों के लिए सौगात के रूप में क्यों प्रचारित कर रही है? चुनाव उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों राज्यों में होने हैं.
कोई कांग्रेस नेता सिखों को यह क्यों नहीं बता रहा कि पिछड़ी जातियों के कोटे से यह नया आरक्षण उनके बच्चों को सरकारी मुलाजिम बनने के बड़े मौके मुहैया कराएगा? जब एक बार कोई श्रेणी बन गई तो किसी नौकरी के लिए किसी अल्पसंख्यक को अर्जी देने में कोई अड़चन न होगी. और चूंकि कोई उप-कोटा नहीं है सो पात्र उम्मीदवार न मिलने पर वे पद पात्र सिख या ईसाई अल्पसंख्यकों से भरे जा सकेंगे.
चौथी इच्छाः इसका भी ताल्लुक नौकरी से ही है पर यह थोड़ी दुर्लभ किस्म की नौकरी है. ऊंचे पदों पर गलत लोगों को चुनने वालों के लिए किसी किस्म की सजा का इंतजाम किया जाए तो कैसा रहेगा? वी.के. सिंह जैसे सेनाध्यक्ष के दिमाग में साफ तौर पर झेल दिखता है जब वे सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि भारत सरकार उनके साथ पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष सरीखा व्यवहार कर रही है. कोई भी रूपक किसी के स्वभाव और विवेक का आईना है.
जनरल का दावा है कि उनकी लड़ाई प्रतिष्ठा की है. एक शख्स जिसने एक सीढ़ी चढ़ने के लिए एक जन्मतिथि का इस्तेमाल किया हो, वह ऊपर कुछेक महीने और टिके रहने के लिए दूसरी जन्मतिथि कैसे खोज ले आता है? जन्मतिथि अगर आज गलत है तो वह 20 साल पहले गलत कैसे नहीं थी, वह भी ऐसे संस्थान में जहां वरिष्ठता को गंभीरता से लिया जाता हो? मेजर जनरल सिंह के कंधों पर किसने स्टार जुड़ते जाने दिए?
आखिरी सर्वोपरि इच्छाः सचिन तेंडुलकर को भारत रत्न दिए जाने संबंधी राय पर फौरन राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध. यह हो-हल्ला शुरू होने के बाद से सचिन कोई शतक नहीं जमा सके हैं. मुझे लगा कि वे ब्रेडमैन अभिशाप के शिकार होने जा रहे हैं. डॉन ब्रेडमैन ने अपनी आखिरी पारी में चार रन बना लिए होते तो उनके करियर का औसत 100 हो गया होता, मगर वे शून्य पर आउट हो गए थे. पर यह तो 'रत्न' संक्रमण का मामला लगता है. थोड़ा शांत रहिए, सचिन सौवां शतक बना लें, उसके बाद भारतीय क्रिकेट को गर्त में जाता देखिए, जहां पहुंचकर कीनिया के खिलाफ जीत भी राष्ट्रीय छुट्टी का सबब बन जाए.

