2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत और मुख्यमंत्री बनने के बाद जब आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल की सरकार की राह में आए दिन केंद्र की मोदी सरकार के प्रतिनिधि यानी तत्कालीन उप राज्यपाल अड़ंगे लगाने लगे तो मीडिया से बातचीत में केजरीवाल ने कहा था, “मोदी को ये समझ लेना चाहिए कि मैं राहुल गांधी नहीं हूं." केजरीवाल की जून, 2015 में कही ये बात साढ़े चार साल बाद आज भी एक मायने रखती है और पहले से कहीं ज्यादा मायने रखती है. केजरीवाल ने इन शब्दों को जमीन पर उतार दिया है.
2020 के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल ने 2015 के आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन को लगभग दोहरा दिया है तो इसकी ठोस वजहें, बड़े मायने हैं. साथ ही भविष्य की राजनीति के कुछ संकेत भी पकड़े जा सकते हैं. ये वैकल्पिक राजनीति का वास्ता देकर राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल और उनकी प्रयोग की राजनीति की सफलता का दस्तावेज हैं.
आखिरी दौर में चुनाव प्रचार जिस तरह की गलाकाट स्थिति में पहुंच गया था और भारतीय जनता पार्टी ने शाहीन बाग में हो रहे प्रदर्शन के आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण का प्रयास किया. इससे एकबार तो चुनावी मुकाबले में भाजपा, आम आदमी पार्टी को कड़ी टक्कर देती हुई नजर आई लेकिन वो कभी भी आप से आगे निकलती नहीं दिखाई दी.
कांग्रेस पिछले चुनाव के प्रदर्शन से ही पस्त पड़ी हुई थी और इस बार भी वह बेदम ही नजर आ रही थी. चुनाव से कुछ महीनों पहले सुभाष चोपड़ा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए लेकिन इससे भी कोई जमीनी फर्क नहीं पड़ा. राहुल-प्रियंका की कुछेक रैलियां हुईं लेकिन उसमें राहुल की पीएम को डंडे मारने वाली बात के अलावा कुछ चर्चा लायक भी नहीं रहा.
राजनीतिक मोर्चे पर आम आदमी पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद ही विधानसभा चुनाव की तैयारियों को धार देनी शुरू कर दी थी.
इस बीच उसने मेट्रो और डीटीसी बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त सफर की घोषणा कर दी. डीटीसी बसों में सफर मुफ्त करना उसके हाथ में था जो कि उसने 2019 में दीपावली के बाद भाईदूज के दिन से लागू कर दिया लेकिन मेट्रो में केंद्र सरकार ने उसके हाथ बांध दिए. इसके जवाब में भारतीय जनता पार्टी अवैध कालोनियों के नियमितीकरण की घोषणा ले आई.
दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार मुफ्त एक सीमा तक मुफ्त बिजली देने का काम अपने कार्यकाल के शुरुआत में ही कर दिया था. इसके बाद मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने से लेकर कार्यकाल के आखिरी साल में महिलाओं को बसों में मुफ्त सफर की सौगात देकर दिल्ली के उस निम्न और निम्न मध्यम वर्ग को आर्थिक राहत दी जो कम कमाता है, किफायत से खर्च करता है और पाई-पाई जोड़कर जिंदगी का हिसाब लगाता है.
मोहल्ला क्लीनिक ने इस तबके की मामूली बीमारियों के इलाज का ठोस इंतजाम किया. इन सब कामों की बहुत सराहना हुई और केजरीवाल तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं तो ये उनके इन्हीं कामों का फल है. महाराष्ट्र में हाल ही में बनी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक अपने प्रदेश में खोलने का ऐलान किया है. इसी तरह कुछ दिनों पहले ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी तीन महीने में 75 यूनिट बिजली मुफ्त देने की घोषणा की है.
ऐसा नहीं है कि मुफ्त की घोषणाएं करने अकेले से ही पार्टियां जीत जाती हैं. इसमें लोगों तक उस योजना का पहुंचना सबसे ज्यादा मायने रखता है और इस मामले में केजरीवाल सरकार का ट्रैक रिकॉर्ड कहीं बेहतर है.
भ्रष्टाचार का कोई आरोप दिल्ली सरकार पर नहीं लगा. शायद यही वजह रही कि केजरीवाल के खिलाफ कोई एंटी इनकंबैंसी जैसी बात नहीं थी और इसलिए आम आदमी पार्टी आराम से जीत गई.
भारतीय जनता पार्टी ने गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में आखिरी दौर में जोरदार प्रचार करते हुए मुकाबले को कांटे का बनाने का प्रयास किया. लेकिन चुनाव 20-20 मैच नहीं बल्कि टेस्ट मैच होते हैं, ये समझने में भाजपा नेतृत्व शायद चूक कर गया. दिल्ली का चुनाव पार्ट टाइम प्रचार और कुशल नेता के बगैर भाजपा-कांग्रेस तो नहीं जीतती दिखती हैं. केजरीवाल के मुकाबले का कोई नेता भाजपा और कांग्रेस इस चुनाव में पेश नहीं कर सकीं या ऐसा नेता उनके पास था ही नहीं.
भाजपा मोदी के करिश्मे पर निर्भर थी लेकिन माहौल देखकर उसने अपने ब्रांड मोदी को बचाना ही उचित समझा और गृहमंत्री ने कमान संभाल ली. अरविंद केजरीवाल ने इस चुनाव में बड़ी चतुराई से न तो मोदी पर हमला बोला और न ही शाहीन बाग में सीएए विरोधी प्रदर्शन का हिस्सा बने.
केजरीवाल शाहीनबाग नहीं गए. इससे भाजपा को उन पर हमला करने का मौका नहीं मिल सका. इसके विपरीत केजरीवाल को आतंकवादी बताकर भाजपा फंस गई जिसे केजरीवाल ने एक विक्टिम कार्ड के तौर पर इस्तेमाल किया. खैर, ये बातें तो राजनीतिक हैं लेकिन आम आदमी पार्टी के चुनाव जीतने की असली वजह उसका काम है.
पिछले चुनाव में 95 फीसदी सीटें जीतने वाली आप इस बार भी 85 फीसदी से ज्यादा सीटें जीत रही है और दो तिहाई बहुमत से भी आगे का जनादेश हासिल करने जा रही है. ऐसा ऐतिहासिक प्रदर्शन करने के लिए ऐसा ही ऐतिहासिक काम भी दूसरी पार्टियों को करना होगा.
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली को जनता से जुड़े मुद्दों की राजनीति का सफल प्रयोग बना दिया है.
लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा की सरकार का किसानों को सम्मान निधि सीधे खाते में देना और दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी के मुफ्त बिजली-पानी, बसों का सफर सफर जैसे कदम चुनावी सफलता की गारंटी बने हैं. इसकी नकल भी आगे देखने को मिलेगी लेकिन जब तक अमल की ईमानदारी नहीं होगी कामयाबी नहीं होगी. इसकी मिसाल कांग्रेस है जो कि 2015 के विधानसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराती दिख रही है. कांग्रेस ने जन कल्याणकारी योजनाएं तो ढेर सारी चलाईं लेकिन वे प्रतीकात्मक ज्यादा रही हैं. लोगों को सीधा फायदा देने वाली योजनाएं चुनावी नतीजे देती हैं, ये सही है या गलत लेकिन प्रयोग सफल है- आम आदमी पार्टी की सफलता को देखकर तो यही लगता है.
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