रक्षा मंत्रालय के अफसर द्वारा गुमा दी गई भारतीय वायुसेना की एक गोपनीय फाइल में 126 लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए 12 अरब डॉलर (60,000 करोड़ रु.) का करार हासिल करने के लिए स्पर्धा कर रहीं छह कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी थी.
ये कंपनियां हैं- एमआइजी, डेसॉल्ट, लॉकहीड मार्टिन, बोइंग आइडीएस, यूरोपियन एयरोनॉटिक्स एंड डिफेंस कंपनी (ईएडीएस) और साब. यह फाइल रक्षा मंत्रालय में निदेशक संदीप वर्मा के दिल्ली के एशियाड विलेज में स्थित घर के सामने सड़क पर पड़ी मिली. यह क्लासीफाइड फाइल है, जो 'गोपनीय' से एक दर्जा ऊपर होता है और इसमें ऑफसेट प्रस्तावों और एयरोस्पेस कंपनियों द्वारा भारतीय फर्मों से गठजोड़ पर विचार किया गया है.
ये दस्तावेज भारतीय वायुसेना की प्लान्स ब्रांच के हैं, जिसके मुखिया उप वायुसेनाध्यक्ष हैं और इन्हें वायुसेना मुख्यालय में तैयार किया गया, जिसे पिछले साल यह पेशकश मिली थी. यह फाइल एक सजग नागरिक को मिली, जिसने इसे वायुसेना को लौटा दिया.
ऑफसेट्स दरअसल सरकार और हथियारों की आपूर्ति करने वाले विदेशी फर्मों के बीच हुआ एक समझौता है, जिसका उद्देश्य है कि करार का कुछ लाभ देश को भी मिले. मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) के करार में, जो इस समय दुनिया का सबसे बड़ा खुला टेंडर है, कहा गया है कि निविदा हासिल करने वाली फर्म करार की आधी राशि का निवेश भारत में करेगी, ताकि जरूरी कल-पुर्जे उपलब्ध होते रहें.{mospagebreak}
फाइल में इसका जिक्र है कि कौन-सी फर्में 5 अरब डॉलर (25,000 करोड़ रु.) के ऑफसेट प्रस्ताव हासिल करने के लिए आपस में गठजोड़ कर रही हैं. वर्मा ऑफसेट्स के लिए बनी वायुसेना-रक्षा मंत्रालय की उस 9 सदस्यीय तकनीकी मूल्यांकन समिति के एक सदस्य थे, जिसके मुखिया रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पाद के अतिरिक्त सचिव वी. सोमसुंदरम थे. समिति ने पिछले साल 23 नवंबर को रक्षा मंत्रालय में एक लंबी बैठक भी की थी.
उस बैठक में छह कंपनियों द्वारा भरी गई निविदाओं पर विचार-विमर्श हुआ था. कॉमर्शियल ऑफसेट लॉ के विशेषज्ञ वर्मा ने बैठक में एक विस्तृत प्रेजेंटेशन भी दिया था.
21 दिसंबर की रात को नीले रंग की यह प्लास्टिक फाइल एक सुरक्षा गार्ड को 586, एशियन गेम्स विलेज में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड नाम के एक गेस्ट हाउस के पास बीच सड़क पर मिली, जो वर्मा का अस्थायी आवास है. यह फाइल हाउसिंग सोसाइटी के सचिव कैप्टन सतीश शर्मा को सौंप दी गई.
पूर्व एयरलाइन पायलट शर्मा ने अपने आसपास रहने वाले रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को इस बारे में अवगत कराया. सोसाइटी में 853 फ्लैट हैं जिनमें से 80 फीसदी फ्लैट में वरिष्ठ सरकारी कर्मचारी रहते हैं.
जब उन कर्मचारियों ने किसी फाइल के खोने से इनकार किया, तो कैप्टन शर्मा ने वायुसेना मुख्यालय को इस बारे में सूचित किया. इस पर वर्मा कैप्टन शर्मा के पास फाइल लेने पहुंचे, लेकिन तब तक वह वायुसेना मुख्यालय के सुरक्षा अधिकारियों को सौंपी जा चुकी थी.{mospagebreak}
रक्षा मंत्रालय और वायुसेना मुख्यालय ने इस मामले की अलग-अलग जांच कराने की घोषणा की है और सोमसुंदरम और वर्मा की भूमिका की जांच की जा रही है. रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने इस मामले में रक्षा उत्पादन विभाग के अधिकारियों को फटकार लगाते हुए उन्हें गोपनीय फाइलों के प्रति सावधान रहने का निर्देश दिया है.
यह पहली बार नहीं है, जब एमएमआरसीए की फाइल इस तरह सड़क पर पाई गई है. 2009 में लॉकहीड मार्टिन ने-जिसने इस बार एफ-16 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति के लिए निविदाएं भरी हैं-अचानक भारत स्थित अपने मैनेजर को वापस बुला लिया था.
दरअसल अमेरिका के मैरीलैंड स्थित उसके कॉर्पोरेट मुख्यालय से एक कर्मचारी ने गलती से भारतीय रक्षा मंत्रालय की एक गोपनीय फाइल वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास को भेज दी. रक्षा मंत्रालय की खरीद प्रक्रिया से जुड़ी उस फाइल के बारे में माना गया कि उसे दिल्ली में अनधिकृत तरीके से हासिल किया गया.
लेकिन नई, अजीब घटना ने एयरोस्पेस की उन बड़ी फर्मों को भौंचक कर दिया है, जिन्होंने निविदाएं दाखिल की हैं. कम-से-कम दो यूरोपीय निर्माताओं को शक है कि गुमशुदा फाइल का इस्तेमाल उनके कारोबारी प्रतिद्वंद्वियों ने किया हो सकता है ताकि इस सौदे में देरी हो. भारतीय वायुसेना ने इस पूरे प्रसंग पर अपनी नाराजगी जताई है. एक वरिष्ठ वायुसेना अधिकारी आश्वस्त करते हैं, ''हम काफी सख्ती से मामले की जांच-पड़ताल करेंगे.''{mospagebreak}
12 अरब के एमएमआरसीए टेंडर को 2005 में भारतीय वायुसेना में नई जान फूंकने के लिए जारी किया गया था. भारतीय वायुसेना के पास अब 32 से भी कम लडाकू स्क्वॉड्रन रह गए हैं, जो पिछले कई दशकों के निम्नतम स्तर पर है. यह भारी-भरकम करार इन निविदाएं भरने वाली कंपनियों को भी बना-बिगाड़ सकता है, इसलिए उनका काफी कुछ दांव पर लगा है.
इस ठेके से जुड़ी छोटी-से छोटी सरकारी जानकारी भी इन कंपनियों के लिए कीमती सूचना जैसी है. सुरक्षा परिषद के पांच में से तीन स्थायी सदस्य देश-फ्रांस, रूस और अमेरिका न सिर्फ इस दौड़ में हैं, बल्कि अब निर्णायक स्थिति में पहुंचे करार को हासिल करने के लिए खुले तौर पर लॉबीइंग भी कर रहे हैं.
वायुसेना ने सभी छह लड़ाकू विमानों की फ्लाइट ट्रायल और तकनीकी मूल्यांकन पूरा कर लिया है और अपनी रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय को सौंप दी है. इस सौदे के तकनीकी ऑफसेट्स महीने के आखिर में जमा होंगे, जिसके बाद निविदाएं खोली जाएंगी और करार हासिल करने वाली कंपनी के साथ बातचीत शुरू होगी. एंटनी की हाल की सार्वजनिक टिप्पणी इस बात का संकेत है कि वे इस सौदे को अंतिम रूप देने की ''जल्दी में नहीं'' हैं. यानी यह सौदा 2012 तक भी हो सकता है. वायुसेना तब तक इंतजार कर सकती है.

