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आलोचना: केंद्र में नारी की स्‍वाधीनता

नारी अधिकार रक्षा की लड़ाई का चित्रण नागार्जुन ने अपने उपन्यासों में खूब किया है. स्त्री समस्या, उसका विद्रोह और स्वाधीनता का संघर्ष उनके उपन्यासों के केंद्र में रहा है.

अपडेटेड 10 जनवरी , 2012

स्त्री स्वाधीनता का प्रश्न और नागार्जुन के उपन्यास
श्रीधरम
अंतिका प्रकाशन
शालीमार गार्डन
गाजियाबाद-5,
कीमतः 395 रु.

नारी अधिकार रक्षा की लड़ाई का चित्रण नागार्जुन ने अपने उपन्यासों में खूब किया है. स्त्री समस्या, उसका विद्रोह और स्वाधीनता का संघर्ष उनके उपन्यासों के केंद्र में रहा है.

स्त्री स्वाधीनता का प्रश्न आज भी समकालीन है. इसी की पड़ताल युवा कथाकार-समालोचक श्रीधरम ने स्त्री स्वाधीनता का प्रश्न और नागार्जुन के उपन्यास में करने की कोशिश की है. वे उन परिस्थितियों की भी पड़ताल करते हैं, जिन्होंने नागार्जुन को अपने उपन्यासों के पात्र गढ़ने को प्रेरित किया. मिथिला के सामंती समाज, ब्राह्मणों का वर्चस्व, बिकौआ प्रथा को समझे बिना नागार्जुन के उपन्यासों के मर्म को समझ्ना संभव नहीं है. लेखक ने नागार्जुन के उपन्यासों के जरिए असल में स्त्री पराधीनता के व्यापक आयाम तलाशे हैं.

नागार्जुन का मानना था कि उपन्यासों की कथा की प्रक्रिया को सामाजिक प्रक्रिया के रुख से मिलता-जुलता होना चाहिए. नारी शोषण को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा और महसूस किया था. इसलिए यह महज संयोग नहीं कि नागार्जुन ने हिंदी और मैथिली दोनों भाषाओं में अपने लेखन का विषय स्त्री समस्या को बनाया है. न तो नागार्जुन ने कभी कलम से समझैता किया, न उनके उपन्यासों के स्त्री पात्रों ने. जो विद्रोह नागार्जुन और उनके पात्रों में नजर आता है, वही विद्रोही प्रवृत्ति श्रीधरम के विश्लेषण में भी है.

नागार्जुन अपने साहित्य में बार-बार विवाह संस्था पर प्रश्नचिक्क खड़ा करते हैं. अपने उपन्यासों में वे इस संस्था की अप्रासंगिकता को सिद्ध कर सह-जीवन और स्त्री-पुरुष के सह-अस्तित्व पर जोर देते हैं. उनके उपन्यासों में स्वाधीनता की आकांक्षी स्त्रियां समाज निर्मित वर्जनाओं को लांघती हैं, रूढ़ मान्यताओं से टकराती हैं और अंततः अपना स्वतंत्र अस्तित्व पाने की कोशिश करती हैं. श्रीधरम ने उसी संवेदनशीलता से उसे पाठकों के सामने रखा है.

नागार्जुन के हिंदी में ग्यारह और मैथिली में दो उपन्यासों पर पहली बार स्त्री स्वाधीनता के संदर्भ में गहन विचार विवेचन किया गया है. इस पुस्तक के माध्यम से नागार्जुन की स्त्री संवेदना को भली-भांति समझा जा सकता है. उनके जन्म शताब्दी वर्ष में इसका प्रकाशन एक उपलब्धि है. उनके उपन्यासों में स्त्री-स्वाधीनता के प्रश्न को समझ्ने के लिए यह एक महत्वपूर्ण ही नहीं, जरूरी पुस्तक है.

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