माकपा नेताओं के बीच आजकल बयानबाजी की होड़ लगी हुई है. पार्टी के नेता वी.एस. अच्युतानंदन ने संकेत दिए हैं कि 4 मई को पार्टी के असंतुष्ट नेता टी.पी. चंद्रशेखरन की हत्या के पीछे राज्य सचिव पिनराई विजयन के नेतृत्व वाले उनके विरोधी धड़े का हाथ हो सकता है. एक अन्य नेता, विजयन के वफादार एम.एम. मोनी ने सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किया है कि अस्सी के दशक में पार्टी ने कम-से-कम चार कांग्रेसियों की हत्या की थी.
1985 से माकपा के इडुक्की जिला सचिव मोनी ने 24 मई को थोडुपुझ में एक सभा में यह बात कही. अजीब बात यह है कि चंद्रशेखरन की हत्या में खुद को निर्दोष साबित करने के क्रम में वे ये बातें कह गए. पूर्व चाय बागान कर्मी, 67 वर्षीय मोनी ने इडुक्की में 1982 से 1984 के बीच हुई तीन हत्याओं का ब्यौरा भी दिया. उन्होंने कहा, 'हुएक को गोली मारी गई, एक को छुरी से और तीसरे को पीट-पीट कर मार डाला गया. हमारी 13 लोगों की हिट लिस्ट में ये तीनों सबसे ऊपर थे.'' मोनी ने बताया कि माकपा अपने काडरों के हत्यारों से कैसे निबटती थी.
जो कांग्रेसी मारे गए थे, वे थे 1982 में बेबी अंचेरी, 1983 में मुलंचिरा मथाई और मुतुक्कड ननप्पन तथा 1984 में एम. बालू. इन सभी की हत्या माकपा काडरों की हत्या करने के संदेह में हुई. मोनी ने कहा, ''यदि हमने कुछ किया था तो उसे स्वीकार करने में क्या हर्ज. चंद्रशेखरन की हत्या में हमारी कोई भूमिका नहीं.''
स्थानीय चैनलों पर मोनी का यह बयान प्रसारित होने के बाद यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की सरकार ने तेजी दिखाई और पुलिस ने मोनी के खिलाफ हत्या और आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज कर लिया. सरकार ने कहा कि इन सारे मामलों की दोबारा जांच होगी. उस दौरान हुई कुछ अन्य हत्याओं की भी दोबारा जांच होगी. मोनी ने जिन तीन हत्याओं का जिक्र किया था, उनमें से सिर्फ एक में सजा हुई थी, जबकि बाकी मामलों को सबूतों के अभाव में बंद कर दिया गया था.
माकपा की केंद्रीय और राज्य इकाई ने कहा है कि मोनी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. विजयन ने कहा, ''उन्होंने जो कहा, वह पार्टी की नीति के अनुकूल नहीं है. हम राजनैतिक हिंसा को सही नहीं ठहराते.'' अच्युतानंदन ने कहा, ''उन्होंने हमारी पार्टी को बदनाम किया है.'' माकपा महासचिव प्रकाश करात और पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा है कि मोनी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी.
मोनी के बयान का इससे बुरा वक्त माकपा के लिए नहीं हो सकता था. चंद्रशेखरन की हत्या के मामले में पहले ही मीडिया और जनता के सामने अपनी विश्वसनीयता बचाने के लिए पार्टी संघर्ष कर रही है. इस मामले की जांच कर रही एसआइटी ने जिन 16 संदिग्धों को धरा है, उनमें छह स्थानीय माकपा नेता हैं. गिरफ्तार किए गए लोगों में एनजीओ यूनियन के पूर्व राज्य सचिव सी.एच. अशोकन और माकपा कार्यकर्ता भी हैं. इन्हें दो अन्य हत्याओं के मामलों में भी गिरफ्तार किया गया है.
पार्टी की छवि को इस घटनाक्रम से गहरा धक्का लगा है और 2 जून को होने वाले नेयाट्टिनकारा विधानसभा उपचुनाव में उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है, जो काफी निर्णायक होगा. यह चुनाव यूडीएफ के लिए भी अहम है क्योंकि वह सिर्फ चार सीटों से ही बहुमत में हैं, लेकिन माकपा के लिए यह कहीं ज्यादा अहम होगा क्योंकि अपनी सीट उसे वापस हासिल करनी है.
माकपा के राज्य नेतृत्व ने चंद्रशेखरन की हत्या की जांच को ''पार्टी को अलग-थलग और नष्ट करने की साजिश'' करार देकर चीजों को और मुश्किल कर लिया है. इसके अलावा राज्य नेतृत्व के खिलाफ अच्युतानंदन की बगावत भी एक ऐसा मसला है, जिसने पार्टी अनुशासन को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. आगामी 8 जून को पोलितब्यूरो की बैठक है, जहां ये सारी बातें खुलकर सामने आएंगी. फिलहाल ऐसा लगता है कि केरल के कॉमरेडों से निबटने का पार्टी को कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है.

