मध्य प्रदेश (एमपी) में कोविड के मामलों का भारी विस्फोट हुआ है और पिछले चार सप्ताह में मरीजों की संख्या 65,000 से बढ़कर 1,22,000 हो गई है, लेकिन राज्य सरकार टस से मस नहीं हो रही है. इसी अवधि में पॉजिटिविटी रेट 7.3 प्रतिशत से 14.3 प्रतिशत हो चुका है. भोपाल और इंदौर से एक से बढ़कर एक डरावनी कहानियां सामने आ रही हैं कि मरीज कोविड अस्पतालों से दूर जा रहे हैं क्योंकि वहां बिस्तरों की किल्लत है, कोविड मरीजों के शव कई दिनों तक वहीं रखे रहते हैं और ऑक्सीजन सिलेंडरों की कमी हालात को नारकीय बना रही है. राज्य सरकार के पास लॉकडाउन के अलावा कोई विकल्प बचा नहीं है लेकिन फिर भी वह इससे पीछे हट रही है जो कि समझ से परे है. इससे सवाल यह भी उठने लगे हैं कि क्या इस आपराधिक उदासीनता की वजह कहीं उपचुनाव तो नहीं हैं.
एमपी सरकार चिकित्सा ढांचे में कमी से वाकिफ है, फिर भी अब तक यह इसने उन गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई है जिनसे भीड़ इकट्ठी होती है. सितंबर में किए गए स्वास्थ्य विभाग के एक अनुमान के मुताबिक, 31 अक्तूबर तक प्रदेश में करीब 2,60,000 कोरोना मरीज होंगे जिनमें 55,000 सक्रिय मरीजों की संख्या होगी. इसके मुकाबले स्वास्थ्य ढांचे पर काफी दबाव है जो कि इस तथ्य से समझा जा सकता है कि सिर्फ कोविड के इलाज की सुविधाओं वाले इंदौर के अरबिंदो अस्पताल और भोपाल के चिरायु अस्पताल में क्रमश: 22 और 19 जिलों के मरीजों का इलाज हो रहा है.
और ऐसा नहीं है कि सरकार आंकड़ों को देख नहीं रही है. 8 सितंबर के आसपास सरकार ने टेस्टिंग घटाने का फैसला लिया. उस दिन 22,597 टेस्ट हुए थे लेकिन 22 सितंबर आते आते टेस्ट की संख्या 17,698 हो गई. विचार यही रहा होगा कि टेस्ट कम होंगे तो रिपोर्ट में भी आंकड़े कम आएंगे. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद आधिकारिक रूप से कह चुके हैं कि राज्य में टेस्ट करने की कुल क्षमता 29,780 प्रति दिन है. फिर भी यह स्पष्ट नहीं हो सका कि टेस्ट संख्या क्यों घटाई गई. इंदौर में किए गए सीरो सर्वे से पता चला कि शहर की 7 प्रतिशत से ज्यादा आबादी संक्रमित है जिससे यह संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में लोगों पर खतरा है और हर्ड इम्युनिटी अभी दूर-दूर तक नहीं दिखती.
इंदौर, भोपाल और ग्वालियर अब भी राज्य के सबसे ज्यादा कोरोना प्रभावित जिले हैं और इनमें ही 40 प्रतिशत केस हैं. इंदौर में भी उपचुनाव हैं जबकि मुरैना में भी कुछ सीटें हैं. जिन 28 सीटों में विधानसभा उपचुनाव होने हैं उनमें से ज्यादातर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में हैं जहां कोविड का कोहराम मचा हुआ है. हजारों की संख्या में लोगों की मौजूदगी वाली रैलियां यहां आम हो चुकी हैं जिनमें मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग को तिलांजलि दे दी गई है. भाजपा के चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया (दोनों को कोविड हो चुका है) बाहर मास्क पहनते हैं पर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मास्क पहनने से इनकार कर दिया है और वे रोडशो में भी मास्क नहीं पहनते.
कोई भी कल्पना कर सकता है कि इससे खुद का नुकसान है और इससे नजारा बदल सकता है. ब्यावरा के विधायक गोवर्धन डांगी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा के पिता का निधन हो चुका है, इसके बावजूद राजनेताओं के लिए कुछ नहीं बदला है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि सार्वजनिक स्थानों पर मास्क न पहनने पर 500 रुपए का जुर्माना है लेकिन शायद यह राजनीतिक कार्यक्रमों पर लागू नहीं होता है. लॉकडाउन लगाने से राजनीतिक प्रचार अभियान में अड़ंगा लगेगा और राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनाव जीतने की खातिर यह बहुत जरूरी है. राजनीतिक रैलियों में बेकाबू भीड़ और उसे रोक पाने में प्रशासन की नाकामी का मसला न्यायपालिका तक पहुंच चुका है. हाइकोर्ट की ग्वालियर बेंच में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है जिसमें कोविड फैलने के आशंका को देखते हुए चुनाव प्रचार पर पाबंदी लगाने की मांग की गई है. खंडपीठ ने अंतरिम आदेश में प्रशासन से कोविड गाइडलाइंस का पालन राजनीतिक कार्यक्रमों में सुनिश्चित करने को कहा है.
अपने बचाव में सरकार 80 प्रतिशत रिकवरी रेट का राग आलाप कर सब कुछ नियंत्रण में होने का दावा कर रही है. इस बीच अपनी सुविधा के हिसाब से रुख बदल लिया गया. अगस्त में पूरा जोर संस्थागत क्वारंटीन पर था लेकिन इसके लिए बहुत कम जगह होने के कारण अब फिर जोर होम क्वारंटीन पर हो गया है (अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ने की समस्या से बचने की रणनीति). 21 सितंबर को चौहान ने एक बयान में कहा, “मध्य प्रदेश में कुल 22,000 सक्रिय केस हैं जो कि कुल केसों का 20 प्रतिशत है. एमपी देश में 16वें नंबर पर है. हमने टेस्टिंग क्षमता बढ़ाने, अस्पताल बिस्तर और ऑक्सीजन की उपलब्धता के क्षेत्र में बढिया काम किया है.”
पड़ोसी छत्तीसगढ़ ने भी पिछले एक महीने में मरीजों की संख्या में भारी उछाल देखा और 21 सितंबर से प्रदेश के 28 में से 15 जिलों में लॉकडाउन लागू करने का फैसला लिया. लेकिन लॉकडाउन कितने प्रभावी हैं? इसका फैसला आंकड़ों से किया जा सकता है. भोपाल में लॉकडाउन से पहले और बाद में केसों में गिरावट दिखी थी. पिछला लॉकडाउन भोपाल में 25 जुलाई से 3 अगस्त तक था. 24 अगस्त को भोपाल में 177 केस थे जबकि लॉकडाउन खत्म होने के एक हफ्ते बाद 11 अगस्त को कुल केस 100 थे. मुख्य सचिव आर परशुराम कहते हैं, “कोविड फैल रहा है, आजीविका बचना भी एक असली मुद्दा है. इस लिहाज से लॉकडाउन कोई विकल्प नहीं है बल्कि एक सीमित उपाय है. साथ ही यह सरकार के लिए एक कठिन विकल्प है.”
अनुवादः मनीष दीक्षित
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