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दुनिया की 80 फीसदी आबादी लपेटे में आ सकती है कोविड-19 के

आइआइएम अहमदाबाद ने अपने वर्किंग पेपर में 1 अप्रैल तक के बीमारों और मृतकों की संख्या के आधार पर कोविड-19 के प्रकोप का गणितीय अनुमान जाहिर किया है. जो देश 60 दिनों से ज्यादा कोरोनावायरस के प्रकोप का सामना कर चुके हैं वहां के मरीजों और मृतकों की 1 अप्रैल तक की संख्या के आधार पर जारी सांख्यिकीय अनुमानों में अधिकतम 2.27 लाख मौतों की आशंका जाहिर की गई है.

कोरोना संकट
कोरोना संकट
अपडेटेड 12 अप्रैल , 2020

कोविड-19 पर मौतों और दुनिया को हो रहे आर्थिक नुकसान का अनुमान वैसे तो नहीं लगाया जा सकता लेकिन आइआइएम अहमदाबाद और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने इसकी विभीषिका को अनुमानों और सांख्यिकीय गणना के आधार पर नापने की कोशिश की है. लेकिन इन नैराश्य में डुबो देने वाले अनुमानों से पहले ताइवान की कोरोना को लगभग हरा देने की छोटी सी दिलचस्प कहानी जानना जरूरी है.

आस्ट्रेलिया और ताइवान की आबादी करीब एक समान (2.4 करोड़) है लेकिन दोनों देशों में कोरोनावायरस के प्रकोप का नतीजा देखकर पता चलता है कि प्रयास किए जाएं तो कोरोना को भी काबू किया जा सकता है. इन दोनों देशों के रिस्पांस में फर्क इतना था कि ताइवान ने सॉर्स की विभीषिका 2003 में झेली थी और उसके पास वायरस से जूझने का एक तजुर्बा था जो आस्ट्रेलिया के पास शायद नहीं था.

ताइवान में 11 अप्रैल तक कोविड-19 के 385 मरीज थे और 6 मौतें हुईं जबकि आस्ट्रेलिया में 6 हजार से ज्यादा मरीज थे और 56 मौतें हो चुकी थीं. ताइवान का मॉडल इस समय दुनिया में सबसे कामयाब माना जा रहा है. यह छोटा सा देश 31 दिसंबर को वुहान से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग करने लगा था. 2003 में सॉर्स वायरस के हमले के दौरान ताइवान सबसे बुरी तरह प्रभावित देशों में था और उस दौरान स्थापित नेशनल हेल्थ कमांड सेंटर के अफसर ने कोरोना की सूचना मिलते ही सक्रिय हो गए. ताइवान ने चीन के कई हिस्सों से यात्रा पर पाबंदी लगाई, क्रूज शिप को अपने तट में आने नहीं दिया और होम क्वारंटीन का उल्लंघन करने पर सख्त सजा का प्रावधान किया. लेकिन शायद बाकी दुनिया ताइवान से सीख लेने में चूक गई. और उसके परिणाम भी सामने हैं.

आइआइएम अहमदाबाद ने अपने वर्किंग पेपर में 1 अप्रैल तक के बीमारों और मृतकों की संख्या के आधार पर कोविड-19 के प्रकोप का गणितीय अनुमान जाहिर किया है. जो देश 60 दिनों से ज्यादा कोरोनावायरस के प्रकोप का सामना कर चुके हैं वहां के मरीजों और मृतकों की 1 अप्रैल तक की संख्या के आधार पर जारी सांख्यिकीय अनुमानों में अधिकतम 2.27 लाख मौतों की आशंका जाहिर की गई है. साथ ही मरीजों की संख्या 34 लाख होने की आशंका जाहिर की गई है. ये गणना कोरिया, चीन, जर्मनी, इटली, स्पेन, ईरान और ब्रिटेन के मामलों के आधार पर जाहिर की गई है. आइआइएम की रिपोर्ट में कहा गया है कि देशों के हालात, स्वास्थ्य सुविधाओं और जेनेटिक्स के अनुसार कोविड-19 का देशों की आबादी पर असर हो रहा है.

ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय की रिसर्च कहती है कि इस विषाणु के प्रकोप का का दायरा और कालखंड अभी तक नापा नहीं जा सका है. अनेक गणितीय अनुमान भी लगाए गए हैं जिनके मुताबिक कोरोनावायरस दुनिया की 20 फीसदी से लेकर80 फीसदी आबादी को अपनी चपेट में ले सकता है. अमेरिका में 66 लाख ने मार्च में ही सरकार के पास बेरोजगारी खर्च-भत्तों के लिए आवेदन दे दिया था. ब्रिटेन के 32 फीसदी उद्योगों ने कर्मचारियों की छंटनी अप्रैल की शुरुआत में ही कर दी थी. कोविड-19 की असली कीमत इसके इलाज से कहीं ज्यादा है जो देशों को चुकानी होगी. कोरोनावायरस का गर्मी और नमी में रुख क्या होगा इसका भी अंदाजा शायद अभी नहीं लगाया गया है. विशेषज्ञ कह रहे हैं कि कोरोना का दूसरा दौर भी मौसम बदलने के साथ आ सकता है जैसा कि 1918 के स्पेनिश फ्लू के मामले में देखा गया था. सिंगापुर में तो अचानक नए केस सामने आने लगे जिससे वहां दूसरे दौर के लॉकडाउन का दौर आ गया है.

रिपोर्ट कहती है कि चीन के जिस हुबेई प्रांत को वायरस के चलते बंद किया गया दरअसल वह चीन की अर्थव्यवस्था का बड़ा केंद्र है. वहां हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग और परंपरागत मैन्युफैक्चरिंग दोनों हैं. वहां वाहन निर्माण, फूड प्रोसेसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, टेक्साइल्स, पेट्रोकेमिकल्स और स्टील प्रोडक्शन इकाइयों की भरमार है और वहां पर तालाबंदी का पूरी दुनिया पर असर पड़ा जैसे कि निसान और हुंडई ने चीन के बाहर अपनी फैक्टरियों को इसलिए बंद किया क्योंकि उन्हें वहां से पार्ट्स की सप्लाई नहीं हो रही थी.

सप्लाई चैन के बाधित होने से चीनी कच्चे माल पर आधारित दुनिया के दूसरे देशों की की लाखों मझोली इकाइयां बंदी की मार झेल रही हैं. बेहद महत्वपूर्ण पेंसिलिन, हेपारिन और सर्जरी में काम आने वाली दवाओं का दुनिया में मूल स्रोत चीन ही है. दुनिया में एंटीबायोटिक्स बनाने में काम आने वाले मुख्य रसायन का 80 फीसदी उत्पादन चीन में ही होता है. इसी वजह से अमेरिका को दवाओं की कमी का डर सता रहा है. भारत के लॉकडाउन का भी असर दुनिया औऱ अमेरिका पर हो रहा है. भारत शरीर में सीधे प्रवेश कराई जाने वाली दवाओं (स्टेराइल इंजेक्टिबल ड्रग्स) का दुनिया का प्रमुख उत्पादक है और दुनिया में करीब आधी जेनरिक ड्रग्स का सप्लायर भी है. अमेरिका के एफडीए ने 27 फरवरी को ही एक बयान जारी कर दवाओं की कमी के प्रति आगाह कर दिया था.

रिपोर्ट कहती है कि कोरोनावायरस की वजह से सप्लाई चेन बाधित होने का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जितना गहरा असर होने जा रहा है उसका अनुमान भी सरकारों ने नहीं लगाया है. ऐसे में उन कंपनियों को ही मुनाफा होगा जिनके पास सप्लाई दुरुस्त रखने की क्षमता होगी और अच्छी नगदी होगी.

सार्स के प्रकोप के वक्त दुनिया की अर्थव्यवस्था को 40 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था जो कि वैश्विक जीडीपी का 0.1 फीसदी था लेकिन कोरोना से होने वाले दुष्प्रभाव कहीं ज्यादा होगा. विशेषज्ञों ने एक अनुमान जाहिर किया है कि अगर वैश्विक जीडीपी में आधा फीसदी से पौने दो फीसदी की गिरावट आती है तो दुनिया को 2.7 ट्रिलियन (2700 अरब) डॉलर का नुकसान होगा. आर्थिक के साथ सामाजिक नुकसान भी झेलना होगा.

दुनिया के 188 देशों में शिक्षण संस्थान बंद होने का सामाजिक और बौद्धिक नुकसान पैसों में नहीं नापा जा सकता. रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व के 89 फीसदी विद्यार्थी या संख्या में कहें तो करीब 1.5 अरब विद्यार्थियों की पढ़ाई कोरोना की वजह से ठप हो गई है. ऑनलाइन पढ़ाई का विकल्प सभी के पास नहीं है. इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और साधनहीन विद्यार्थियों पर पड़ेगा. फिलहाल तो दुनिया भर की दिग्गज दवा कंपनियां इसका इलाज खोजने में जुटी हुई हैं, प्रारंभिक परीक्षण हो रहे हैं लेकिन अभी नतीजे आने बाकी हैं. जब तक इस मर्ज का इलाज नहीं आता दुनिया की बेचैनी बनी रहेगी.

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