लॉकडाउन के बीच दफ्तर का काम घर से करने और फिर दिन-ब-दिन बढ़ते कोरोना संक्रमण की संख्या से दिमागी तनाव का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है. वैसे भी ताजा आंकड़े कहते हैं कि पांच में से एक व्यक्ति तनाव का शिकार है. इसकी वजह भागदौड़, आगे बढ़ने की होड़, आर्थिक अनिश्चितता, परिवारों में बढ़ती दूरियां वगैरहा, वगैरहा हैं. और अब कोरोना का कहर, उफ्फ....मेंटल हेल्थ की तो इस वायरस ने धज्जियां उड़ा दीं.
केरल में कोरोना उपचार के बीच मेंटल हेल्थ को लेकर भी सरकार सजग हुई है. जैसा कि पहले से ही रिपोर्ट आ रही थीं कि यह महामारी मेंटल हेल्थ के लिए भी खतरनाक साबित होगी. कुछ महीनों में कोरोना दौर खत्म होगा ही और फिजिकल हेल्थ की रिकवरी भी तय है. लेकिन मेंटल हेल्थ में खरोंचे बाकी रहेंगी. डर, तनाव, चिंता के निशान लंबे समय तक रहेंगे. कम से कम भारत की बात करें तो अभी हम फिजिलक हेल्थ की सेवा देने को लेकर ही जूझ रहे हैं. मेंटल हेल्थ के बारे में सोचना भी यहां तो लग्जरी है. लेकिन नीति निर्मातओं की बुद्धि की बलिहारी है कि वे हेल्थ को टुकड़ों में देखते हैं. पूर्ण स्वास्थ्य, मानसिक, शारीरिक और सामाजिक हेल्थ का गठजोड़ होता है. यह कोई पश्चिमी अवधारणा नहीं बल्कि आयुर्वेद में हेल्थ सर्किल यानी स्वास्थ्यवृत्त की अवधारणा के पीछे पूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना ही है.
पर देश की सरकारें या तो सीधे धार्मिक हो जाती हैं या फिर सीधा पश्चिम की पद्धति को ही वैज्ञानिक मानती हैं. गीता हावर्ड में पढ़ाई जाए तो वैज्ञानिक लेकिन श्री अरविंदो आश्रम में पढ़ाई जाए तो महज आस्था. गायत्रीकुंज में गीता में निहित में काउंसलिंग के तरीकों पर रिसर्च हो तो आस्था और ऑक्सफोर्ड में हो तो नजरिया आधुनिक. खैर छोड़िए, लेकिन बात बस इतनी है कि इस महामारी से पूरी तरह उबरने के लिए मेंटल हेल्थ पर ध्यान देना बेहद जरूरी है. अगर ऐसा नहीं किया गया तो डर, चिंता, तनाव वर्क परफार्मेंस का ग्राफ रफ्तार से गिराएगा, रचनात्मकता तो खंडहर बन जाएगी. मेंटल हेल्थ और वर्क परफार्मेंस पर हजारों रिसर्च हो चुकी हैं. क्रिएटिविटी और मेंटल हेल्थ पर न जाने कितने शोध हुए हैं. इसलिए यहां इसके उदाहरण देने की जरूरत नहीं है.
तो करें क्या, संक्रमण से बचें या मेंटल हेल्थ की फ्रिक्र करें?
खीझने की जरूरत नहीं. फिक्र करने की भी नहीं. बस करना इतना है कि सरकारें ऑनलाइन काउंसलिंग की मुफ्त सुविधा मुहैया करवाएं, कुछ काउंसिलर्स, मनोवैज्ञानिकों से परामर्श लेकर छोटे-छोटे उपचार सुझाएं...जैसे कोरोना से बचने के लिए हाथ धोने और मास्क लगाने को प्रचारित किया गया वैसे ही मेंटल हेल्थ के लिए कुछ थिरैपी प्रचारित की जाएं.
कमाल है यार, लॉकडाउन के बीच क्या थिरैपी इस्तेमाल करेंगे?
कूल डाउन, क्यों न घरों में कैद लोगों के लिए थिरैपी उनके घर तक ले जाएं. चलिए कुछ रिसर्चेस का जिक्र करें.
1-ब्रिटने की यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सटर (University of Exeter)के मनोवैज्ञानिक डॉ, डेनियल ने एक शोध किया जिसमें चड़ियों क को देखान और चहचाहट को सुनना मानसिक स्वास्थ्य के लिए संजीवनी के समान है. इन दिनों जब प्रदूषण का स्तर न्यूनतम हो गया है. ऐसे में कभी छज्जे में खड़े होकर सुबह-सुबह या रात को सुनें चिड़ियां दिखती तो नहीं लेकिन उनकी चहचाहट साफ सुनाई देती है. तो प्रॉब्लम सॉल्व-यह थिरैपी जरा कुछ दिन लेकर तो देखें...फिर असर खुद ही बताएं
2-प्रकृति को निहारें, अब शहरों में प्रकृति कहां मिलेगी? मिलेगी भी मिलेगी. थोड़ा भरोसा तो करें. साइकोलोजी में एक पद्धति है, डिसेंसटाइजेशन या योग में योग निद्रा में भी कुछ-कुछ ऐसा होता है. थिरैपिस्ट पेशेंट को कल्पना कराता है कि वह कितने खूबसूरत माहौल में है. शुद्ध वायु, जंगल, चिड़ियों की चहचाहाट उसके कानों में पड़ रही है. प्राणायाम में भी शुद्ध वायु को लेने और काली और दूषित वायु को छोड़ने की कल्पना ही की जाती है. पर्वत, पहाड़, जंगलों के बीच से गुजारते हुए आपका ध्यान तनाव, चिंता से हटाकर इस मनोरम दृथ्य में लगाया जाता है. कल्पना बड़े काम की चीज है. इस पर खोजेंगे तो हजारों शोध हो चुके हैं. डेनियल टी. सी. कॉक्स और डेनियल एफ. सहानाहन (DANIEL T. C. COX, DANIELLE F. SHANAHAN)और उनके साथियों ने प्रकृति और मेंटल हेल्थ को लेकर रिसर्च की. नतीजे शानदार थे.
3-एनवायरमेंट मैनीपुलेशन (यानी ऐसे वातावरण जहां आपकी चिंता बढ़ती हो, तनाव बढ़ता हो उसे छोड़कर किसी और जगह कुछ दिनों के लिए शिफ्ट कर जाएं.)
क्या, अजीब मजाक है, लॉकडाउन की वजह से दूध लेने तो जा नहीं पा रहे, आप कह रहे कहीं और चले जाएं? थोड़ा शांति से सुनिए तो...क्या मानसिक तौर पर कुछ देर के लिए हम दूसरी जगह नहीं जा सकते. फिर वही कल्पना की थिरैपी. ध्यान कर सकते हैं. शायद ध्यान कुछ आध्यात्मिक और धार्मिक लगे. तो छोड़िए, आप जिंदगी में जिन-जिन खूबसूरत जगहों पर गए हैं. उनकी तस्वीरें देखिए, उस अनुभव को रिवाइस कीजिए. सोचिए क्या खूबसूरत दिन थे वह. कुछ देर के लिए फिर वहीं चले जाइये. काउंसलिर्स और साइकोलोजिस्ट के लिए यह एनवारयनमेंट मैनीपुलेशन बेहद धारदार हथियार मतलब तनाव दूर करने का रामबाण है.
तलाशिए खुद भी आपको कुछ उपाय मिलेंगे जो डर, तनाव और चिंता से आपको दूर ले जाएंगे....
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