राजेंद्र शर्मा
वाराणसी में हनुमान जयंती के अवसर पर हर वर्ष आयोजित होने वाले संकट मोचक संगीत समारोह का संगीत प्रेमियों को महीनों से इंतजार रहता है . इस समारोह में देश भर के ऐसे बड़े कलाकारों को साक्षात रूप से सुनने का, उनकी कला को समझने का मौका आम लोगों को भी बिना किसी शुल्क के सहज रूप से मिलता है परन्तु कोरोना संकमण के कारण चौदह अप्रैल तक लॉकडाउन की घोषणा हो जाने की स्थिति में संगीतप्रेमी निराश हो गये थे.
यह बात भी हवा में रही कि कोरोना संकमण के चलते इस समारोह को तकरीबन दो महीने बाद कराया जाएगा. लेकिन मंदिर के महंत प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्र चिंतित थे कि क्या पुरखों की संजोई हुई इस 96 साल की परम्परा को कोरोना के कारण ध्वस्त होने दिया जाए?
उधर देश भर के कलाकार भी दुखी. पंडित जसराज अक्सर कहा करते हैं कि यह महज उत्सव नहीं सांगीतिक यज्ञ है. हम यहां पारिश्रमिक और मान के लिए नहीं, असीम "ऊर्जा" से अपनी साधना को अनुपान देने आते हैं. दरअसल, किसी और सांगीतिक आयोजन से अलग संकटमोचन संगीत समारोह की यह रूहानी रंगत ही इसकी खासियत है.
गहन चिंतन और देश भर के कलाकारों से किये गये विचार मंथन के उपरांत मंदिर के महंत प्रोफेसर विश्वंभर नाथ मिश्र ने निर्णय लिया कि जब यह संगीत समारोह अपने सौवें वर्ष की ओर बढ़ रहा है, तब हम इसका प्रवाह टूटने कैसे दे सकते हैं? परंपरा का प्रवाह जारी रहेगा. संगीत की गंगा बहती रहेगी.
उन्होंने कहा कि हनुमानजी बल, विद्या और बुद्धि को देने वाले देवता हैं. सिर्फ बल से हर संकट या चुनौती का उपाय नहीं ढूंढा जा सकता. बल और बुद्धि का तालमेल ही विवेक है. अब तकनीक के साथ परंपरा का प्रवाह हो, यही आज के समय की जरूरत है.
प्रोफेसर मिश्र ने लोगों से अपने घर के अंदर रहते हुए ही संकट की इस घड़ी में लोग हनुमानजी से प्रार्थना करें. संकट से वही उबारेंगे.अपने इस निर्णय से संगीत प्रेमियों को अवगत कराते हुए महंत प्रोफेसर विश्वंभर नाथ मिश्र ने घोषणा की कि लाक डाउन के कारण 12अप्रैल से 17 अप्रैल तक कुल छह दिनों तक चलने वाले वार्षिक संगीत समारोह में इस बार डिजिटल तरीके से कलाकार अपनी प्रस्तुति देगें जिसका लाईव प्रसारण फेसबुक के जरिए होगा.
ल\कडाउन के कारण पहली बार डिजिटल आयोजन के लिए हालांकि, 12 अप्रैल से 17 अप्रैल तक की घोषणा की गयी थी परन्तु 17 अप्रैल आते आते सभी कलाकारों की हाजिरी लगाने के आग्रह को देखते हुए एक दिन का समय और बढाया गया . कुल सात दिन तक हर रोज शाम को डिजिटल तकनीक से संकट मोचन संगीत समारोह का आयोजन कर महंत प्रोफेसर विश्वंभर नाथ मिश्र ने साबित कर दिया कि इस समारोह की 96 साल की गौरवशाली परम्परा को करोना भी अवरुद्व नही कर पाया .
96 सालों से हनुमान जयन्ती के अवसर पर संकट मोचन सगीत समारोह के आयोजन का अपना एक इतिहास है.
वाराणसी में दुर्गाकुंड क्षेत्र में काशी हिंदू विश्ववविद्यालय के निकट स्थित संकट मोचन मंदिर एक ऐतिहासिक मंदिर है और इसमें रखी भगवान हनुमान की मूर्ति को बाबा संकटमोचन कहा जाता है और मंदिर को संकटमोचन मंदिर .मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि इसे कवि गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं अपने हाथों से गढ़ा था और तब एक छोटा-सा मंदिर बाद में विस्तृत होता गया.
ऐसी भी मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में तुलसीदास ने पवित्र हिंदू ग्रंथ रामचरितमानस् का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा वहीं रहकर लिखा था . 60 के दशक तक प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला संकट मोचक संगीत समारोह काशी के स्थानीय कलाकारों पर ही निर्भर था. संकट मोचन मंदिर के तत्कालीन मंहत पंडित अमरनाथ मिश्र जो स्वयं पखावज के सिद्व कलाकार थे, सरोद वादक पंडित ज्योतिन भटटाचार्य, तबला वादक पंडित किशन महाराज एवं पंडित आशुतोष भटटाचार्य की मंडली संकटमोचन मंदिर में होने वाले इस आयोजन की रुपरेखा तैयार करती परन्तु 1966-67 के दौरान तत्कालीन महंत प्रोफेसर वीरभद्र जी ने इस समारोह को स्थानीयता की परिधि से बाहर लाते हुए इसे राष्ट्रीय स्वरुप प्रदान करने की मंशा से पंडित मणिलाल जी (पंडित जसराज जी के बड़े भाई) को आमंत्रित किया.
पहली बार स्थानीय के परे किसी कलाकार के रुप में पंडित मणिलाल ने आलाप भरा था.
एक लम्बे वक़्त तक संकट मोचन संगीत समारोह में मुस्लिम और महिला कलाकारों का आना-जाना नहीं था लेकिन तत्कालीन मंहत वीरभद्र मिश्र ने पहले इसे महिलाओं के लिए, फिर 2007 में मुस्लिम कलाकारों के लिए खोल दिया . मुस्लिम कलाकारों में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान ने अपनी शहनाई बजाकर अपनी हाजिरी लगायी थी. उस समय तमाम अंदेशों को दरकिनार करते हुए संगीत प्रेमियों ने प्रेम के साथ उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान की शहनाई को सुना .मुस्लिम कलाकार की मंदिर में हाजिरी को लेकर कोई प्रतिरोध नहीं, कोई ग़ुस्सा नही,सभी को संगीत से मतलब है . उसके बाद तो यह सिलसिला चल निकला .
वर्तमान में समारोह की ज़िम्मेदारी सम्हाल रहे मंहत विश्वंभर नाथ मिश्र ने राष्ट्र की परिधि से भी बाहर निकालते हुए इस समारोह को शास्त्रीय, जैज़, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के लिए भी खोल दिया .इस कडी की शुरुआत पाकिस्तान के गजल गायक गुलाम अली ने की थी.
हालांकि उस समय शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि मंदिर में एक पाकिस्तानी को नहीं घुसने देना चाहिए परन्तु पंडित छन्नूलाल मिश्र की किसी ने नही सुनी और इसके उलट छन्नूलाल मिश्र की ही खूब आलोचना हुई थी.
अपनी इस पहल के बारे में महंत विश्वंभर नाथ मिश्र कहते है कि संकट मोचन संगीत समारोह का प्रारूप संगीत और संस्कृति की पूरी अवधारणा को धार्मिक होने से बचाता है. संगीत समारोह और गंगा में एकरूपता है. जैसे गंगा सभी के लिए हैं, वैसे ही संकट मोचन का मंच भी सभी के लिए है. ये सभी के लिए जीवन के अविकल और निर्विवाद आधार हैं. गंगा जमुनी तहजीब और सौहार्द के लिए ख्यात संकट मोचन सगीत समारोह की मंशा को स्पष्ट करते हुए महंत विश्वंभर नाथ मिश्र गोस्वामी तुलसीदास को उद्वरित करते हुए कहते है कि गोस्वामी जी ने कहा है कि " मांग के खइबो मसीद में सोइबो, लेइबो को एक न देइबो को दो" (मांग के खा लेंगे और मस्जिद में सो लेंगे, न किसी से कुछ लेना है और न किसी को कुछ देना ही). महंत मिश्र आगे कहते है कि मुग़ल काल में रहने वाला हिंदी का इतना बड़ा कवि यह कह गया है, तो हमारी क्या मजाल कि हम उस समरूपता के साथ खिलवाड़ करें या किसी और को भी करने दें .
इस संगीत समारोह में संगीत के रसिक कितनी गंभीरता से संगीत सुनने जाते है,इसे चवालीस साल पहले का एक वाक्या पूरी तरह बयां करता है . वर्ष 1977 में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी. उस समय इंदिरा गांधी कमलापति त्रिपाठी से क़रीबी होने के चलते अक्सर ही बनारस आती रहती थी.
उसी साल संकट मोचन संगीत समारोह में इंदिरा गांधी बिना किसी सूचना के अचानक पंहुच गयी .चूंकि उस समय वे प्रधानमंत्री थीं नहीं, तो लाव-लश्कर भी उतना मौजूद नहीं था. उस समय मंच पर कंकना बनर्जी का गायन चल रहा था . पंडाल में मौजूद सभी श्रोता कंकना बनर्जी के सुरों में पूरी तरह लीन. कोई टस से मस तक नही हुआ. ऐसी हालत में तत्कालीन महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र की यह दुविधा कि इंदिरा गांधी को किस स्थान पर बैठाया जाए. लिहाजा, महंत जी ने इंदिरा गांधी को मंच पर ही बिठा दिया. इंदिरा गांधी के मंच पर बैठने के बाद भी कोई श्रोता अपनी जगह से न खड़ा हुआ, न हिला और कंकना बनर्जी ने अपना गायन पूरा किया .
वाराणसी से सांसद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हर बार इस समारोह में चाहते हुए भी सम्मिलित नहीं हो सके है . यह कसक उनके दिल में भी है . पिछले वर्ष अपरिहार्य स्थिति के कारण समारोह में उपस्थित नही हो सके थे और उपस्थित न हो पाने की कसक इतनी थी कि दो-दो मिनट के अंतराल पर प्रधानमंत्री ने पांच ट्वीट करते हुए लिखा था कि संकट मोचन संगीत समारोह संगीत प्रेमियों के लिए सौगात है. फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के मन में भी यह मलाल है कि अभी तक वह इस संगीत समारोह में नहीं जा सके हैं.
सात दिन तक डिजिटली आयोजित इस बार के संगीत समारोह में दिल्ली से पंडित राम मोहन महाराज (कथक), दिल्ली से पंडित कृष्ण मोहन महाराज (कथक),मुम्बई से पंडित रोनू मजूमदार (बासुंरी वादक ),कोलकाता से पंडित समर साहा ( तबला ) ,चैन्नई से अनंत आर कृष्णन (मृंदगम ) ,पुणे से उस्ताद साकिर खान ( सितार ) ,वाराणसी से पंडित देवाशीष डे (गायन) ,पुणे से उल्ला कासलकर (गायन) ,वाराणसी से सौरभ गौरव मिश्र (कथक),चैन्नई से दीपिका ( गायन ), सेनिया मैहर घराने के पद्मश्री देबू चौधरी(सितार),अमेरिका से पंडित जसराज( गायन), अजराडा घराने के उस्ताद अकरम खां ( तबला ) ,वाराणसी से पंडित रवीन्द्र नारायण गोस्वामी (सितार ), पुणे से पद्मश्री सुरेश तलवरकर व उनकी पुत्री सवानी तलवरकर(गायन), वाराणसी से पंडित रवि शंकर (कथक), लखनऊ से मालिनी अवस्थी( गायन),वाराणसी से राम कुमार मिश्रा ( तबला ),वाराणसी से गौरव मिश्रा (गायन),बैगलरु से दीपिका ( गायन), सेनिया मैहर घराने के पंडित तेजेन्द्र नारायण मजमूदार (सरोद), बैगलरु से पंडित विजय रंगाराव ( गायन) सहित डेढ सौ से अधिक कलाकारों ने हनुमत के चरणों में अपनी हाजिरी लगाई .
सात दिन तक निर्बाध रुप से चले इस संगीत समारोह में सेनिया मैहर घराने के पद्मश्री देबू चौधरी के साथ उनके पुत्र प्रतीक चौधरी एवं पौत्र अधिराज चौधरी द्वारा एक साथ उल्लेखनीय प्रस्तुति रही है . यह पहला मौका था जब तीन पीढियों ने एक साथ अपनी प्रस्तुति दी हो .
समारोह के तीसरे दिन पंडित जसराज की अमेरिका के न्यूजर्सी से हनुमत दरबार में लगाते हुए कहा कि एक दो बार छोडकर साल 1972 से इस संगीत समारोह में अपनी हाजिरी लगाता रहा हूं और जब तक सांस है, हनुमत के चरणों में अपनी हाजिरी लगाता रहूंगा.
पंडित जसराज ने राग बिहाग में जय राम रमा, रघुनम शरणम ---से पवनपुत्र के चरणों में अपने सुरों की श्रद्वा निवेदित की . पंडित जी ने अपना गायन करते करते कोरोना महामारी से त्रस्त समूचे विश्व की चिंता में सिसकने लगे और कोरोना से निजात पाने की गुहार बजरंग बली से करते हुए बोले कि "आप ने सुना न मेरे बाबा."
96 साल की परम्परा को विश्वव्यापी कोरोना महामारी के बावजूद डिजीटल माध्यम से बचाये रखने में सफल हुए महंत विश्वंभर नाथ मिश्र प्रफुल्लित है . मिश्र कहते है कि इस बार के संगीत समारोह की खूशबू पूरी दुनिया में फैली है . आप एक सुर ‘सा’ लगाते हैं तो वह यहां से लेकर पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान व अमरीका तक एक ही रहता है. जो बड़ा होगा, वह इस सुर को समझेगा. क्योंकि इतिहास में जितने भी बड़े नाम हुए हैं, सभी ने समाज को जोड़ने की बात की है. और जितने भी लोग वैचारिक रूप से दरिद्र हैं, उन्हें आप देख ही रहे हैं कि वे क्या कर रहे हैं?
महंत विश्वंभर नाथ मिश्र के पिता मंहत वीरभद्र मिश्र तथा बाबा मंहत पंडित अमरनाथ मिश्र द्वारा शिददत और परिश्रम से प्रारम्भ और समृद्व की गयी संकट मोचन संगीत समारोह की परम्परा को महंत विश्वंभर नाथ मिश्र ने करोना को परास्त कर उसे डिजीटल तकनीक से पूरी दुनिया के समक्ष ला खडा किया है,यह देख पंडित अमरनाथ मिश्र और मंहत वीरभद्र मिश्र गर्व के साथ मुस्कराये होंगे.
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