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तेल की धार पर रपट गए उपभोक्ता

संसद में केंद्रीय बजट पेश करने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मीडिया से मुखातिब होते हुए कहा था कि सरकार सब्सिडी के विष का घूंट मौका आने पर पी लेगी. मनमोहन को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि वह समय इतनी जल्दी यानी यूपीए-2 सरकार के तीन साल पूरे होने पर 23 मई को ही आ जाएगा और उनकी सरकार को पेट्रोल की कीमत में एक समय में अब तक की सबसे ज्‍यादा बढ़ोतरी करनी पड़ेगी.

अपडेटेड 27 मई , 2012

बात 16 मार्च की है. संसद में केंद्रीय बजट पेश करने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मीडिया से मुखातिब होते हुए कहा था कि सरकार सब्सिडी के विष का घूंट मौका आने पर पी लेगी. मनमोहन को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि वह समय इतनी जल्दी यानी यूपीए-2 सरकार के तीन साल पूरे होने पर 23 मई को ही आ जाएगा और उनकी सरकार को पेट्रोल की कीमत में एक समय में अब तक की सबसे ज्‍यादा बढ़ोतरी करनी पड़ेगी. और इस तरह पेट्रोल की कीमतों में 7.50 रु. का इजाफा कर दिया गया है.

आखिरकार तेल की आसमान छूती वैश्विक कीमतों ने सरकार को पेट्रोल की कीमतों को युक्तिसंगत बनाने के लिए मजबूर नहीं किया. कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें इस समय 92 डॉलर (5,060 रु.) प्रति बैरल के आस-पास है जो सरकार के खतरे के निशान 115 डॉलर (6,325 रु.) से काफी कम है. इसकी बजाए यह सरकार का आर्थिक कुप्रबंधन है जो पिछले नौ महीनों में रुपए की कीमत में तेजी से हुई 20 प्रतिशत की गिरावट के रूप में सामने आया है, जिसकी वजह से तेल के आयात की लागत काफी बढ़ गई है.अजीब नीति

सरकार ने 2011-12 में तेल की सब्सिडी पर 83,000 करोड़ रु. खर्च किए जो 2.16 लाख करोड़ रु. के कुल सब्सिडी बिल का लगभग 40 फीसदी होता है. 2012-13 के लिए यूपीए का वित्तीय गणित तभी काम कर सकता है जब तेल संबंधी सब्सिडी को 40,000 करोड़ रु. तक सीमित रखा जाए. पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी इस लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में पहला कदम है. यह उस विष का बस छोटा-सा घूंट है जिसे सरकार को निगलने की जरूरत है.

डीजल पर तकरीबन 13 रु. प्रति लीटर की सब्सिडी दी जाती है. इस सब्सिडी का ज्‍यादातर फायदा ऐसे लोग उठाते हैं जिन्हें उसकी जरूरत ही नहीं है-उदाहरण के लिए तेल पीने वाली महंगी एसयूवी कारें चलाने वालों को.

सब्सिडी का काफी बोझ ओएनजीसी और गेल जैसे तेल के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर पड़ता है जिन्हें अपनी शोधन और अन्वेषण गतिविधियों की कीमत पर इंडियन ऑयल सरीखी तेल वितरण कंपनियों को रियायती मूल्य पर तेल देना पड़ता है. पेट्रोलियम क्षेत्र की विकृतियों को समाप्त करने के लिए डीजल की कीमतों का विनियमन अब सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर होना चाहिए.

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