कहां तो यह समझा जा रहा था कि यह पार्टी मध्य प्रदेश विधानसभा उपचुनाव की ज्यादातर सीटें जीत जाएगी—चाहे वह प्रदेश की सत्ता में दोबारा वापसी न भी कर पाए—लेकिन कांग्रेस ने अंत में औसत दर्जे का प्रदर्शन किया और 28 सीटों के लिए हुए उपचुनाव में 9 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी. जिस राज्य में पार्टी 15 साल बाद 2018 में सत्ता में वापस आई थी, वहां इस तरह के उत्साहहीन प्रदर्शन से पार्टी के भविष्य और नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं. क्या कांग्रेस इस झटके से उबर सकेगी और 2023 की जंग के लिए तैयार हो सकेगी?
लेकिन इसका जवाब खोजने से पहले यह देखना होगा कि 2020 का उपचुनाव कांग्रेस ने किस तरह लड़ा. वर्षों से दो कमजोरियां कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ रही हैं—एक गुटबाजी और दूसरा सोशल मीडिया पर लचर मौजूदगी—लेकिन उपचुनाव के दौरान इन्हें दूर किया गया. ज्योतिरादित्य सिंधिया के मार्च में कांग्रेस छोड़ने के बाद कमलनाथ राज्य में पार्टी के निर्विवाद नेता के तौर पर उभरे और उन्हें दिग्विजय सिंह गुट का भी सहयोग हासिल था. पार्टी की सोशल मीडिया सामग्री भी सार्वकालिक उच्च स्तर पर थी जिसे लोगों ने देखा भी था. इन कमियों को दूर करने के बावजूद कांग्रेस का निराशाजनक प्रदर्शन बताता है कि दरअसल समस्या कहीं और है.
कांग्रेस के पास जनता में कोई लोकप्रिय प्रचारक नहीं है—जो अपनी भाषण कला के दम पर भीड़ जुटा ले और प्रचार में अच्छा खासा वक्त भी लगाए. पार्टी का प्रचार कार्य दूसरी पायदान के नेताओं के हवाले है जिनका लोगों से सीधा संपर्क नहीं है. भाजपा के शिवराज सिंह चौहान और सिंधिया, जिन्होंने प्रचार में अच्छा खासा जनता के बीच बिताया, के मुकाबले कांग्रेस कभी भी जनता में वह अपील पैदा नहीं कर सकी.
दूसरी समस्या कांग्रेस में संगठन का अभाव है. उपचुनाव के दौरान खाली पदों को उन नेताओं के मनोनीत लोगों से भरा गया जो चुनाव लड़ रहे थे और इनमें भी वे लोग थे जो सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद बच गए थे. इसका मतलब यह है कि पद कार्यकर्ता की सक्रियता के आधार पर नहीं बांटे गए बल्कि जरूरत की वजह से दिए गए. भाजपा के विपरीत कांग्रेस के पास विचारधारा के कारण जुड़े कार्यकर्ताओं की संख्या बहुत कम है. सच तो यह है कि इसके नेता विचारधारा से बंधे ही नहीं है. मतदान से कुछ हफ्ते पहले दमोह से कांग्रेस विधायक राहुल लोधी दल बदल कर भाजपा में चले गए.
भाजपा आने वाले दिनों में कांग्रेस को कमजोर करने के लिए हरसंभव प्रयास करती दिखेगी. इसके लिए रणनीति का प्रमुख हथियार अधिक से अधिक कांग्रेस विधायकों का दलबदल कराना होगा. भाजपा को महसूस हो रहा है कि दलबदल का फार्मूला मतदाताओं ने खारिज नहीं किया है, खासकर ग्वालियर और चंबल के बाहर के इलाकों में जहां भाजपा के वोट आसानी से कांग्रेस से आए विधायकों को ट्रांसफर हो गए.
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर दीपक तिवारी कहते हैं, “कांग्रेस को यह स्वीकार करना चाहिए कि शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश की राजनीति का व्याकरण बदल दिया है और कांग्रेस इसे समझने में नाकाम रही है. साल 2018 में कांग्रेस की जीत शिवराज सिंह चौहान को खारिज करना नहीं था, बल्कि भाजपा उम्मीदवारों को खारिज करना था. अगर कांग्रेस 2023 में वापसी करना चाहती है तो उसे चौहान से मुकाबला करने में सक्षम नेता ढूंढने की जरूरत है.”
2023 से पहले प्रदेश में कुछ और उपचुनाव और शहरी और ग्रामीण निकायों के चुनाव होंगे. इनके नतीजे इस बात का फैसला नहीं करेंगे कि कांग्रेस कहां खड़ी है क्योंकि ये सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में हो सकते हैं. हां इन चुनावों से कांग्रेस की तैयारियों का संकेत जरूर मिल सकता है.
कांग्रेस को इस मोड़ पर पूरी तरह खारिज करना अनुचित होगा. पार्टी 2018 के चुनाव में वोट शेयर के मामले में लगभग बराबर ही रही और 2020 में ज्यादा वोट शेयर नहीं गंवाया है. अब भी इसे 40 प्रतिशत वोट मिले हैं. अगर पार्टी आने वाले तीन साल में विचारधारा के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं का संगठन खड़ा कर ले, उपचुनाव की तरह ही संगठित तरीके से चुनाव लड़े और जनता के बीच लोकप्रिय युवा प्रचारकों को तैयार करे तो यह दौड़ में बनी रह सकती है. अगर कांग्रेस, पार्टी को मजबूत करने के लिए किसी सलाहकार को नियुक्त करना चाहती है तो इस काम के लिए सबसे बेहतर नेता इस वक्त भाजपा में हैं—ज्योतिरादित्य सिंधिया. वे अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस में क्या काम नहीं कर रहा है.
वोट शेयर—2018 विधानसभा चुनाव
कांग्रेस: 41.35 प्रतिशत
भाजपा : 41.33 प्रतिशत
बसपा: 5.11 प्रतिशत
वोट शेयर—2020 विधानसभा उपचुनाव
भाजपा : 49.46 प्रतिशत
कांग्रेस: 40.50 प्रतिशत
बसपा: 5.75 प्रतिशत
अनुवादः मनीष दीक्षित
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