scorecardresearch

कमिश्नर प्रणाली: आपस में भिड़े बाबू

एक के बाद एक हो रही सामूहिक बलात्कार की घटनाओं से थर्राए प्रदेश में कानून-व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए अब कमिश्नरी प्रणाली का सहारा लिया जाएगा. बेटमा और इंदौर के देवास नाके में हाल ही में इस तरह की शर्मनाक घटनाएं हुई हैं जिनके हफ्ते भर बाद ही सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इंदौर और भोपाल में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने की घोषणा कर दी.

अपडेटेड 11 मार्च , 2012

एक के बाद एक हो रही सामूहिक बलात्कार की घटनाओं से थर्राए प्रदेश में कानून-व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए अब कमिश्नरी प्रणाली का सहारा लिया जाएगा. बेटमा और इंदौर के देवास नाके में हाल ही में इस तरह की शर्मनाक घटनाएं हुई हैं जिनके हफ्ते भर बाद ही सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इंदौर और भोपाल में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने की घोषणा कर दी. इस घोषणा ने प्रदेश की आइएएस और आइपीएस लॉबी को आमने-सामने ला दिया है.

राज्य के इन दो महानगरों में यह सिस्टम लागू हो जाता है तो यह प्रदेश के आइएएस अधिकारियों के लिए झटका होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि आइएएस अधिकारियों की शक्तियां कम हो जाएंगी. आइएएस और आइपीएस लॉबी के लिए यह मामला सीधा-सीधा उनके अफसरी के जलवे का है. वर्तमान व्यवस्था के तहत यहां कलेक्टर, जो एक आइएएस अधिकारी होता है, की खासी अहमियत है. कलेक्टर के पास डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की शक्तियां हैं, पुलिस को दिशा-निर्देश वही देता है.

रासुका लगाने, जिलाबदर करने, संवेदनशील हालातों में फायरिंग की इजाजत जैसे अधिकार जिला कलेक्टर के पास हैं. लेकिन कमिश्नरी लागू होने के बाद ये तमाम शक्तियां पुलिस कमिश्नर को हस्तांतरित हो जाएगी और कलेक्टर की भूमिका महज राजस्व अधिकारी की रह जाएगी. लेकिन मौजूं सवाल यह है कि क्या चौहान इस प्रणाली को लागू करने का साहस कर पाएंगे. पूर्व के अनुभव इसी ओर इशारा करते हैं. पिछले 25 साल में हर मुख्यमंत्री ने इस प्रणाली को लागू करने की बात मौके-बेमौके दोहराई लेकिन कोई भी आइएएस लॉबी के प्रभाव कम करने का साहस नहीं जुटा पाया.

लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट में भोपाल-इंदौर को बढ़ते अपराध वाले शहरों में शुमार किए जाने का जिक्र करते हुए प्रदेश के पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक सुरजीत सिंह कहते हैं, ‘रिपोर्ट को गंभीरता से लेकर सरकार को सिस्टम में सुधार लाना ही होगा.’ दरअसल प्रदेश का पुलिस तंत्र अंग्रेजों के बनाए 1861 के पुलिस एक्ट से ही संचालित हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कई राज्‍यों ने इस एक्ट में संशोधन कर कमिश्नरी सिस्टम को लागू किया है. प्रदेश में भी मंत्री समूह और आइपीएस अधिकारियों की टीम ने ड्राफ्ट तैयार किया था, जो कागजों तक ही सिमटा हुआ है.

हालांकि कमिश्नरी के मुद्दे पर आइएएस और आइपीएस अब खुलकर सामने आ गए हैं. प्रदेश के पूर्व गृह सचिव तथा आइएएस अधिकारी भागीरथ प्रसाद कहते हैं, ‘इंदौर और भोपाल इतने बड़े शहर नहीं हैं जहां कमिश्नरी की जरूरत हो. यहां कलेक्टर के अधीन व्यवस्था ही ठीक है.’ अपनी दलील को पुख्ता करने के लिए वे दिल्ली के रामलीला मैदान की हालिया घटना का जिक्र करते हैं, जहां महिलाओं, बच्चों और सोते लोगों पर लाठियां बरसाई गईं. लेकिन हाल ही में प्रदेश के डीजीपी पद से रिटायर एस.के. राउत इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते. वे कहते हैं, ‘जिला कलेक्टरों पर बहुत जिम्मेदारी होती है. हर सरकारी योजना उन्हीं के जरिए संचालित होती है. ऐसे में कानून-व्यवस्था से जुड़े मामले पुलिस के अधिकार क्षेत्र में ही होने चाहिए.’ इंदौर-भोपाल का आइजी रह चुके आइपीएस अधिकारी शैलेंद्र श्रीवास्तव भी कमिश्नरी प्रणाली को वक्त की जरूरत मानते हैं. उनके मुताबिक, इस प्रणाली से कम-से-कम दस से ज्‍यादा वरिष्ठ आइपीएस जिले में तैनात होंगे जिसका फायदा शहर को मिलेगा. ट्रैफिक पुलिस और खुफिया विभाग भी कमिश्नरी प्रणाली के आधुनिक तंत्र की मदद से बेहतर प्रदर्शन कर पाएगा.

मुख्यमंत्री की विधानसभा में इस बाबत घोषणा से आइएएस लॉबी सार्वजनिक टिप्पणी से परहेज कर रहा है. लेकिन उनकी दलील है कि इंदौर और भोपाल जैसे शहरों के लिए नई प्रणाली मुफीद नहीं होगी. सरकार को भी पुलिस से जुड़े मानवाधिकार के मामलों पर जवाब देना भारी पड़ेगा. हालांकि इंदौर की आइजी अनुराधा शंकर कहती हैं, ‘यह मुद्दा आइएएस या आइपीएस लॉबी के जलवे का नहीं बल्कि आधुनिक और विकासशील पुलिस प्रणाली का है.’

बहरहाल नई व्यवस्था बनने तक अपराधियों के मन में खौफ पैदा करने के लिए पुलिस समय-समय पर मार्च निकाल रही है.

Advertisement
Advertisement