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कॉलेज में दाखिला: 95% फिर भी दरवाजे बंद

अठ्ठारह वर्षीया अनुष्का डे ने वे सारे काम किए जो करने चाहिए थे. उसने टेलीविजन नहीं देखा, दोस्तों के साथ घर से बाहर मौज-मस्ती करने पर वक्त जाया नहीं किया, हर रोज चार घंटे तक पढ़ाई की और 12वीं क्लास की सीबीएसई (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एक्जामिनेशन) की परीक्षा में 95 फीसदी अंक हासिल किए.

अपडेटेड 29 जून , 2011

अठ्ठारह वर्षीया अनुष्का डे ने वे सारे काम किए जो करने चाहिए थे. उसने टेलीविजन नहीं देखा, दोस्तों के साथ घर से बाहर मौज-मस्ती करने पर वक्त जाया नहीं किया, हर रोज चार घंटे तक पढ़ाई की और 12वीं क्लास की सीबीएसई (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एक्जामिनेशन) की परीक्षा में 95 फीसदी अंक हासिल किए.

कोलकाता में रहने वाली अनुष्का को उम्मीद थी कि उसके शानदार अंकों की वजह से उसे दिल्ली विश्वविद्यालय के टॉप कॉलेजों में से किसी एक में दाखिला मिल जाएगा. लेकिन श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) ने जब अपनी पहली कट-ऑफ लिस्ट जारी की और 96.75 फीसदी अंक की बेहद ऊंची सीमा बांध दी तो वह परेशान हो गई. अनुष्का अब मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में दाखिला लेगी ताकि अपने पसंदीदा विषय इकोनॉमिक्स की पढ़ाई कर सके.

इस तरह हताश होने वाली वह कोई इकलौती विद्यार्थी नहीं है. दिल्ली के टॉपरों-उर्मी उप्पल और विशाल दीवान, दोनों ने 97.6 फीसदी अंक हासिल किए लेकिन उन्हें अपनी पसंद के कोर्स और कॉलेज नहीं मिल पाए.

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने असंभव कटऑफ सूचियों को बेतुका करार दिया और प्रमुख राष्ट्रीय परीक्षा संस्था सीबीएसई के अध्यक्ष विनीत जोशी ने स्वीकार किया कि 12वीं के अंक उच्च शिक्षा के वास्ते चुने जाने के लिए उचित कसौटी नहीं हैं.

एक ओर जहां परीक्षा के मानक आसान बना दिए गए हैं, वहीं अंक बढ़ा दिए गए हैं. अगर आपकी उम्र 17 साल है और आप वी वर लेट ऐंड इट इज गेटिंग डार्क, या नाऊ वी बोथ वाज रनिंग, या संकेतों और यहां तक कि दिए गए उदाहरण के बूते कोई काल्पनिक संवाद लिख देते हैं, तो आप शायद सीबीएसई की 12वीं की अंग्रेजी की परीक्षा में अच्छे अंक पा सकते हैं.

इतिहास के पर्चे में स्त्रोत आधारित प्रश्नों के वर्ग में आप 25 अंक हासिल कर सकते हैं. इस वर्ग में प्रश्नों के जवाब छोटे-छोटे उद्धरणों में ही मौजूद रहते हैं. ऐसे में ताज्‍जुब नहीं कि सीबीएसई में 90 फीसदी से ज्‍यादा अंक पाने वालों की संख्या 2008 में 16,563 से बढ़कर 2011 में 21,665 हो गई है. यह 162.5 फीसदी का इजाफा है. और इसी अवधि के दौरान 95 फीसदी से ज्‍यादा अंक पाने वाले छात्रों की संख्या 1,202 से बढ़कर 2,097 हो गई, जो उससे भी ज्‍यादा चौंकाने वाली बात है.

दूसरे राज्‍यों के बोर्डों ने भी अंक देने के मामले में उदार रवैया अपना लिया है. दिल्ली विश्वविद्यालय के  एसआरसीसी की एक-तिहाई सीटों पर तमिलनाडु बोर्ड के छात्रों ने कब्जा जमा लिया है. इस साल तमिलनाडु में पास होने वाले छात्रों का प्रतिशत 85.9 है, जो पिछले दस वर्षों में सबसे ज्‍यादा है.

इसके अलावा, 6,450 छात्रों ने विभिन्न विषयों में 100 फीसदी अंक हासिल किए, जबकि पिछले साल ऐसे छात्रों की संख्या 3,700 थी. इसी तरह, पहली बार केरल राज्‍य बोर्ड की एक छात्रा एम.एस. श्रीलक्ष्मी को सभी विषयों में 100 फीसदी अंक मिले. यहां तक कि आंध्र प्रदेश बोर्ड ने पहली बार सबसे ज्‍यादा 99.3 फीसदी अंक दिए.

एक मंत्रालय के अधिकारी का कहना है कि कुछ बोर्ड अपने छात्रों को राजनैतिक दबाव के कारण या कॉलेज में दाखिला दिलाने के लिए जान-बूझ्कर ज्‍यादा अंक देते हैं. उनके मुताबिक, जरूरी नहीं कि छात्र इतने ज्‍यादा मेधावी हो गए हैं कि इतने अधिक अंक ला रहे हैं. हां, वे यह समझा गए हैं कि किस जवाब या महत्वपूर्ण शब्द (या की वर्ड) के कारण उन्हें अच्छे अंक मिलेंगे.

नई दिल्ली में आंबेडकर विश्वविद्यालय के उपकुलपति श्याम मेनन का कहना है, ''अब लोग 100 फीसदी अंक हासिल करने पर सवाल उठाने लगे हैं. हमें पहले ही चौकन्ना हो जाना चाहिए था. यहां तक कि 98 फीसदी का कटऑफ भी चौंकाने वाला है.'' दिल्ली सरकार ने 2008 में स्तरीय फैकल्टी और अनुसंधान के उद्देश्य से 300 सीटों वाले आंबेडकर विश्वविद्यालय को विशेष सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित किया था.

लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी कुलीनवादी शिक्षा व्यवस्था, जिसमें हर कोई (54,000 सीटों वाले) 84 में से 10 प्रमुख कॉलेजों में दाखिले के लिए होड़ लगाता है, भारत की उस चुनिंदा व्यवस्था को बनाए रखती है जिसमें उत्कृष्टता के केंद्र, मॉडल स्कूल और अभिनव प्रयोग के केंद्र गिने-चुने हुए ही हैं.

कुछ विशेषज्ञ परीक्षा पद्धति को दोषी ठहराते हैं कि वह छात्रों को ऐसी व्यवस्था के अनुकूल खुद को ढालने के लिए मजबूर करती है, जो स्पष्ट रूप से दोषपूर्ण है. इस व्यवस्था के तहत उच्च शिक्षा के इकलौते मानक (12वीं की परीक्षा) पर खरा उतरना छात्रों के लिए करो या मरो की स्थिति पैदा कर देता है.

स्कूलों के विषम स्तर और 41 राज्‍यों के बोर्डों की वजह ने सबके लिए एक समान स्कूली शिक्षा हासिल करना असंभव बना दिया है. पूर्व उपकुलपतियों से लेकर अभिभावक और सीबीएसई अधिकारी तक, सभी इससे चिंतित हैं. मिसाल के तौर पर प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी.एन. आर. राव को लें, जिन्होंने इस साल अप्रैल में मनमोहन सिंह को लिखा कि मौजूदा व्यवस्था की जगह समान राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा प्रणाली लागू की जाए. यह ऐसा विचार है जो पहले से ज्‍यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है क्योंकि सभी बोर्डों ने सीखने की जगह अंक बटोरने पर ध्यान देना शुरू कर दिया है.

राव का कहना है, ''यह रणभूमि की तरह है. ऐसा लगता है कि जब छात्र कोई परीक्षा देने के लिए दरवाजे से दाखिल होते हैं तब हम उन्हें तनावग्रस्त और चिंतित बना देते हैं, और कुछ तो आत्महत्या तक कर लेते हैं. यह राष्ट्रीय शर्म की बात है.'' पूर्व छात्रों ने भी यह कहकर विरोध किया है कि अगर आज के कट-ऑफ से दाखिला मिलता तो वे अपने पूर्व कॉलेजों में पढ़ नहीं पाते.

जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया, ''मैं अपने बेटों के बारे में सोच कर डरा हुआ हूं क्योंकि अगले पांच बरसों में जब .जमीर (उमर का बेटा) कॉलेज में दाखिला लेने जाएगा तब कट-ऑफ इससे भी ज्‍यादा बेतुका हो चुका होगा.'' दूसरी ओर, माकपा नेता सीताराम येचुरी ने कहा, ''अगर शेक्सपियर भी आ जाते और आज अंग्रेजी की परीक्षा देते तो उन्हें 100 फीसदी अंक नहीं मिलते.'' काउंसेलरों ने उन युवाओं में आत्मविश्वास के संकट की ओर संकेत किया है, जो इस तनाव को बर्दाश्त नहीं कर सकते. कुछ बच्चे निरंतर दबाव की वजह से आत्महत्या तक कर लेते हैं.

यह टिक्‌-टिक्‌ करता टाइम बम है. हर साल स्कूलों से 1.3 करोड़ बच्चे अंडरग्रेजुएट कोर्स करने के लिए निकलते हैं. 2025 तक उनकी संख्या बढ़कर 3 करोड़ हो जाने की संभावना है. हालांकि निजी, गैर-सहायता प्राप्त शिक्षा संस्थाओं की संख्या 2001 में 42.6 फीसदी से बढ़कर 2006 में 63.21 फीसदी हो गई लेकिन उनके स्तर को लेकर चिंता बनी हुई है.

नेशनल असेसमेंट ऐंड एक्रीडिटेशन काउंसिल के मुताबिक, संबद्धता (या एक्रीडिटेशन) प्रक्रिया में शामिल 3,500 कॉलेजों में से केवल 9 फीसदी ही बेहतरीन स्तर वाली ए श्रेणी में आते हैं. भारत में केवल 355 (राज्‍य या केंद्रीय) विश्वविद्यालय हैं और अगर उसे 2015 तक ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (सकल प्रवेश अनुपात-जीईआर) को मौजूदा 13 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी करना है तो 1,500 विश्वविद्यालयों की जरूरत होगी. गौरतलब है कि चीन ने मात्र तीन साल के दौरान 1,250 विश्वविद्यालयों की स्थापना की.

यह सब भारत में ऐसे समय में हो रहा है जब बहुत कम लोग कॉलेज में पहुंच पाते हैं. भारत के 11-13 फीसदी जीईआर की तुलना दुनिया के औसत जीईआर 23 फीसदी से कीजिए, विकसित देशों में यह औसतन 45 फीसदी है और विकासशील देशों में 36.5 फीसदी है.

सिब्बल ने ऐलान किया है कि सरकार ने 2020 तक जीईआर 30 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य बनाया है. इसके लिए चमत्कार करना होगा क्योंकि भारत को अपना जीईआर 1 फीसदी से 10 फीसदी तक पहुंचाने में 55 साल लग गए.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का नियमन और परीक्षाओं का मानकीकरण करने जैसे महत्वपूर्ण बदलावों को लागू करने में भी नाकाम रहा है. 2005 के नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (या राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे) का उद्देश्य आकलन की व्यवस्था को उसकी एकआयामी प्रकृति से परे निरंतर आकलन की ओर ले जाना था, जिसमें छात्रों का विभिन्न क्षेत्रों में नियमित अंतराल पर आकलन किया जाता है. सीबीएसई ने 10वीं में बोर्ड परीक्षा की जगह निरंतर और व्यापक आकलन करके ग्रेड देना शुरू कर दिया है. लेकिन 12वीं की परीक्षा में अब भी अंक दिए जा रहे हैं.

एक तरह से शिक्षकों ने भी सार्वजनिक परीक्षा के चलते आकलन की अपनी जिम्मेदारी छोड़ दी है, जिसकी वजह से शिक्षक और छात्र के बीच भरोसा कम हो गया है. यहां तक कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी अपनी व्यवस्था दुरुस्त नहीं कर पा रहा है.

शिक्षा के अधिकार के कार्यक्रम को पारित कराने और 10वीं की सीबीएसई परीक्षा की जगह ग्रेडिंग व्यवस्था लागू कराने के बाद से सुधार थम गए हैं. विदेशी शैक्षिक संस्था विधेयक, टेक्निकल एवं मेडिकल इंस्टीट्यूशन में अनुचित तरीकों को रोकने के लिए विधेयक, इनोवेटिव विश्वविद्यालय विधेयक जैसे शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक लटके हुए हैं.

सरकार के ऊपर आए कई तरह के संकटों से जूझ रहे सिब्बल स्कूली शिक्षा को नियमित करने वाली तीन संस्थाओं के प्रमुखों में से दो-एनसीईआरटी और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई)-के चेयरमैन का चयन अभी तक नहीं कर पाए हैं. एक ओर जहां एनसीईआरटी मुख्य रूप से पाठ्यक्रम तय करने वाली संस्था है, वहीं एनसीटीई शिक्षकों के पठन-पाठन का मानकीकरण करने वाली राष्ट्रीय संस्था है.

अफसोस की बात है कि आज की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में छात्रों को सीखने का तरीका नहीं बल्कि अंक बटोरने का तरीका बताया जाता है. सीबीएसई ने 2005 में रटने और पाठ्यपुस्तक केंद्रित शिक्षा से पार पाने के लिए हायर ऑर्डर थिंकिंग स्किल्स सिस्टम या हॉट्स लागू की थी. इस नई शैली में विषय को दोहराने और रटने की जगह संश्लेषण, विश्लेषण, तर्क-वितर्क, समझ्ने, लागू करने और आकलन पर जोर दिया जाता है. हालांकि हॉट्स अच्छा विचार है पर लंबे सब्जेक्टिव सवाल की जगह छोटे और ऑब्जेक्टिव सवाल पूछे जाने के कारण अंक  बढ़ गए हैं.

एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक ए.के. शर्मा का कहना है, ''सीबीएसई के सुधारों में केवल ज्ञान परखने पर ध्यान दिया गया. उसमें 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत तय उद्देश्य को लागू करने पर ध्यान नहीं दिया गया. उस नीति का उद्देश्य छात्रों में शोधपरकता, रचनाशीलता, वस्तुनिष्ठता, सवाल पूछने का उत्साह, और सौंदर्यबोध पैदा करना है.''

छात्र अधिक अंक हासिल करने के लिए 10वीं के बाद सीबीएसई छोड़कर राज्‍य बोर्ड के स्कूलों में दाखिला ले रहे हैं. लेकिन यह बदलाव पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (डब्ल्यूबीसीएचएसई) के मामले में सही नहीं है, जो खुल कर अंक नहीं देती. कोलकाता के प्रसिद्ध साउथ प्वाइंट हाइ स्कूल ने राज्‍य बोर्ड के साथ ही सीबीएसई भी लागू कर दिया है. प्रिंसिपल रूपा सान्याल भट्टाचार्य का कहना है कि राज्‍य बोर्डों का उद्देश्य सीबीएसई की यथासंभव बराबरी करना है.

चाहे वह ग्रेडिंग हो या अंक, या एप्टीट्यूड टेस्ट या बोर्ड एक्जाम, देखा सिर्फ यही जाता है कि छात्र ने कितने अंक हासिल किए. वक्त के साथ कटऑफ अंक बढ़ते चले गए लेकिन छात्रों को इतने अंक कैसे और क्यों मिल रहे हैं?

दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में सातवीं की अंग्रेजी टीचर कहती हैं, ''मौजूदा लचर मार्किंग योजना के तहत अंग्रेजी में भी 100 फीसदी अंक पा लेना संभव है. इस साल मेरे स्कूल ने अप्रत्याशित परिणाम दिया है, 92 फीसदी बच्चों ने अंग्रेजी में 90 फीसदी से ज्‍यादा अंक हासिल किए. इतने अंक उन छात्रों ने हासिल किए हैं जो अंग्रेजी के तीन वाक्य नहीं लिख सकते. बोर्ड के पर्चे में असली शिक्षा की परीक्षा नहीं ली जाती.

इसमें एक तय उत्तर पुस्तिका के मुताबिक जवाब देने की क्षमता की ही परीक्षा ली जाती है. सीबीएसई से मेरा सवाल यह है कि किसी सब्जेक्टिव पेपर में कोई 'आंसर की' अभिव्यक्ति की कला या ज्ञान कैसे व्यक्त करवा सकता है? उत्तर के वैल्यू प्वाइंट्स से किसी छात्र की समझ और क्षमता का पर्याप्त आकलन नहीं होता. इससे केवल नियम के अनुसरण की ही परीक्षा हो सकती है.''

सीबीएसई की मार्किंग स्कीम पहली बार 2003 में लागू की गई. इसमें महज एक शब्द का उल्लेख करने के लिए अंक दिया जाता है, भले ही उसमें व्याकरण, हिज्‍जे और अभिव्यक्ति गलत ही क्यों न हो. सवाल के साथ दिए गए उद्धरण में ही उत्तर होता है. लंबे सवालों को कई हिस्से में बांट दिया जाता है, जिससे अंक बटोरना आसान हो जाता है.

12वीं क्लास की एक अन्य टीचर का कहना है कि भले ही वे छात्रों के असली ज्ञान को परखने के लिए कुछ उत्तर पुस्तिकाओं को सख्ती से जांचें पर प्रमुख परीक्षक अंक प्रायः बढ़ा देते हैं. परीक्षकों को उत्तर पुस्तिका जांचने के लिए प्रति पेपर मात्र 16 रु., नाश्ता-पानी के लिए 20 रु. और किराया-भाड़े के लिए 100 रु. (अगर वे न्यूनतम 25 पेपर की जांच करें तभी भाड़ा मिलता है) दिया जाता है. हर रोज 50 पेपर जांचने के लिए दबाव डाला जाता है जबकि परीक्षकों का कहना है कि वे एक दिन में 25 से ज्‍यादा पेपर की जांच नहीं कर सकते.

भारत के शिक्षा क्षेत्र को इस भूलभुलैया से बाहर निकलने का रास्ता तलाशना होगा. शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए अमेरिकी 'सैट', जो उच्च शिक्षा की योग्यता का मानक है, जैसी समान प्रवेश परीक्षा तैयार करने से लेकर शिक्षा संस्थाओं की गुणवत्ता बढ़ाने, अनुसंधान के लिए रकम बढ़ाने के साथ ही निजी विश्वविद्यालयों में बेहतर सुविधाएं बढ़ाने, पाठ्यक्रमों का राष्ट्रीयकरण करने और ऐसी परीक्षाओं का मानकीकरण करने जैसे प्रयास करने होंगे जिनमें छात्रों के नियमित आकलन पर ध्यान दिया जाता है.

भारत में प्रवेश परीक्षाओं की पहले से आजमाई हुई एक व्यवस्था मौजूद है. हर साल 8.5 लाख छात्र आइआइटी प्रवेश परीक्षा में हिस्सा लेते हैं, 7.7 लाख छात्र सीबीएसई की परीक्षा देते हैं और दो लाख से ज्‍यादा छात्र ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट देते हैं. इस सवाल का किसी के पास जवाब नहीं है कि एक समान प्रवेश परीक्षा व्यवस्था क्यों नहीं तैयार की जा सकती. संकट की इस घड़ी में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश सिंह अमेरिका में हैं और उनसे सवाल पूछने की बार-बार कोशिश की गई पर कोई जवाब नहीं मिला.

उदासीनता और निष्क्रियता ने मेधावी छात्रों को मायूस कर दिया है और शायद यह स्थिति बनी रहेगी. देश से हर साल 1.5 लाख से ज्‍यादा छात्र कॉलेज की डिग्री हासिल करने के लिए विदेश जा रहे हैं. 100 फीसदी कट-ऑफ का मतलब यह है कि न केवल कॉलेजों ने अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं बल्कि 1.3 करोड़ छात्र मायूसी के इस आलम से निकलने के लिए शोर मचा रहे हैं.

-साथ में ओलिना बनर्जी, देविका जीत, दीपशिखा पुंज, लक्ष्मी सुब्रह्मण्यन और तिथि सरकार

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