scorecardresearch

कविता संग्रह: छुवा-छुवौवल की थकान

एक स्त्री स्त्री बाद में है मनुष्य पहले. मनुष्य होने के नाते यकीनी तौर पर उसके जीवन में कई सारे रंग हैं. पर इन रंगों के लिए माकूल जगह उसके पास नहीं है. वह ज.ज्बाती तौर पर अपने आपको बार-बार रोकती है जबकि पुरुष प्रकृति की हर छोटी-बड़ी चीज को साधिकार ग्रहण करता है.

अपडेटेड 5 नवंबर , 2011

जब मैं स्त्री हूं
रंजना जायसवाल
नई किताब प्रकाशन, रोहिणी,
दिल्ली-89,
कीमतः 200 रु.

स्त्री नहीं
खिलौनाः रंजना जायसवाल

एक स्त्री स्त्री बाद में है मनुष्य पहले. मनुष्य होने के नाते यकीनी तौर पर उसके जीवन में कई सारे रंग हैं. पर इन रंगों के लिए माकूल जगह उसके पास नहीं है. वह ज.ज्बाती तौर पर अपने आपको बार-बार रोकती है जबकि पुरुष प्रकृति की हर छोटी-बड़ी चीज को साधिकार ग्रहण करता है.

यह अधिकार स्त्री के पास क्यों नहीं है, रंजना जायसवाल अपनी कविताओं में औरत की इसी नियति के खिलाफ विद्रोह करती न.जर आती हैं. पितृसत्तात्मक ढांचे से औरत किस प्रकार निकले, इसके सवाल उनकी प्रत्येक कविता में मिलते हैं. मर्दों का समाज औरत को जिस प्रकार से गढ़ना चाहता है, औरत उसी के अनुरूप ढलती चली जाती है. कवयित्री जीवन के छोटे-छोटे और ताजा अनुभवों के चित्र अपनी कविताओं में ईमानदारी से प्रस्तुत करती है. माया नहीं मनुष्य और चाची इसी प्रकार की कविताएं हैं. कवयित्री को स्त्री का खिलौना बनना खलता है. जिस खिलौने से पुरुष जब चाहता है, प्रेम करता है, जब चाहता है, सेवा करवाता है और जब चाहता है उसे पीटता भी है. यह छुवा-छुवौवल का खेल अनवरत जारी है, जिन्हें सहेजते-सहेजते औरत थक गई है.

प्रेम जीवन में सौगात की तरह होता है और इस प्रेम को प्राप्त करने के लिए पुरुष कई-कई बार मुक्त है जबकि औरत को अगर प्रेम न मिले तो उसे भाग्य का विधान मानकर चुप रहना चाहिए. मैं नदी हूं, मुंह जली, जूरी इत्यादि कविताएं औरत की इसी विडंबना का चित्र खींचती हैं. संग्रह में एक कविता है जलकुंभी. जलकुंभी की तरह स्त्री भी एक अनाम सम्मोहन में बंधी हुई अपने हरे आंचल से हर वक्त परिवार की रक्षा करती न.जर आती है. वह बिखरे हुए को बार-बार समेटती है पर तिनका भर भी इधर-उधर हो जाने पर सबसे पहले बेदखल कर दी जाती है. वहीं पर कुछेक कविताओं में उनका कोमल स्त्री मन प्रेम में समर्पण का स्वागत करता न.जर आता है.

परंपराएं पीछा नहीं छोड़तीं और प्रयोग कुछ नया करने की हौसलाअफ.जाई करते हैं. आधुनिक स्त्री बेशक इन चुनौतियों का भार अपने कंधों पर लेना चाहती है, प्रयोगों की सृजनात्मकता के पलों को महसूस करना चाहती है. स्त्री की पहचान कुछेक कारणों से अलग-अलग टूटे हुए कांच के टुकड़ों की मानिंद विभाजित है. इसे कवयित्री अपनी पतंगें  कविता में व्यक्त करती हैः पतंगें खुद कुछ नहीं होतीं, कहता रहा समाज, और मैं अड़ी रही स्त्री पतंग नहीं होती.

सिमोन द बउवा ने सेकेंड सेक्स में दो महत्वपूर्ण वाक्य कहे हैं: स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है; और आर्थिक स्वतंत्रता ही स्त्री की सबसे बड़ी स्वतंत्रता है. सच है, घर की एकाकी दुनिया ने स्त्री को महान गुलाम बनाया है. पूरी पुस्तक में रंजना बहुत सारे सवालों से जूझ्ती-टकराती हैं. एक सवाल यह भी है कि पुरुष तो दूसरा विवाह कर सकता है, उसका आदिम ह.क है. पर स्त्री पराए पुरुष की न.जर से भी अपवित्र हो जाती है. पुनर्विवाह का दुस्साहस करे तो पति छोड़िए, बेटा ही दीवार बन जाता है.

एक कविता है रमरतिया. पांच बच्चों की मां है वह. शराबी पति और भिनकते बच्चों को छोड़ कहीं भाग गई. उसे डाइन, कठकरेजी, औरत के नाम पर कलंक कहा गया. सबकी सहानुभूति रमरतिया के शराबी पति के साथ है. महादेवी वर्मा ने श्रृंखला की कड़ियां में लिखा है कि पतित से पतित पुरुष भी स्त्री के चरित्र की समीक्षा करने का अधिकार रखता है. वही हाल रमरतिया का है, जिसके चरित्र की समीक्षा का अधिकार पितृसत्तात्मक समाज के पास है. रमरतिया चरित्रहीन घोषित की जाती है. इस तरह औरत का मानवीय चेहरा हर वक्त मारा जाता है. यह कविता संग्रह ऐसे ही सवालों की साझेदार पहल है.

Advertisement
Advertisement