अर्पित अग्रवाल आइआइटी-जेईई 2012 के टॉपर हैं. फरीदाबाद के इस छात्र ने अपनी कामयाबी में एमवीएन स्कूल के साथ ही कोचिंग संस्थान फिटजी के योगदान को भी अहम माना है जहां वे हफ्ते में दो दिन पढ़ने के लिए जाते थे. अर्पित कहते हैं, ''मैं किसी ऐसी जगह की तलाश में था जो मुझे अच्छे परिणाम का आश्वासन दे सके.''
उनके पिता ओ. पी. अग्रवाल भी मानते हैं कि सफलता के लिए उनके बेटे की प्राइवेट कोचिंग जरूरी थी क्योंकि सीबीएसई और आइआइटी-जेईई की परीक्षाओं के पैटर्न अलग-अलग हैं. वे कहते हैं, ''कोचिंग से बच्चे को दिशा मिल जाती है और वह नियमित पढ़ाई करता है. कॉम्पिटिशन इतना ज्यादा है कि उचित मार्गदर्शन की खातिर बच्चों के लिए कोचिंग जरूरी हो जाती है.'' अर्पित को सीबीएसई परीक्षा में 96.5 फीसदी और पीसीएम ग्रुप में 98 फीसदी मार्क्स मिले. इसी तरह आइआइटी-जेईई में दूसरे स्थान पर रहे बिजॉय कोचर ने भी चंडीगढ़ में कोचिंग की मदद से सफलता हासिल की है.
इसी साल बिहार में भोजपुर जिले के बखोरापुर गांव के सत्यम कुमार ने मात्र 12 वर्ष की आयु में आइआइटी की परीक्षा पास कर ली. गांव में अच्छे स्कूल के अभाव में घर पर ही शिक्षा हासिल करने वाले सत्यम की प्रतिभा को उनके अभिभावकों के अलावा कोटा के कोचिंग संस्थान रेजोनेंस के सीईओ आर.के. वर्मा ने भी पहचाना और उनकी पढ़ाई का सारा खर्च उठाया. साफ है कि इंजीनियरिंग ही नहीं, मेडिकल, मैनेजमेंट, यूपीएससी और बैंकिंग सहित कई तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं में भी कोचिंग की बदौलत सफलता के ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे.
लेकिन सफलता की और मिसालें भी हैं. मणिपुर की राजधानी इंफाल से 39 किमी दूर लिलोंग के रहने वाले मोहम्मद इस्मत ने सीबीएसई की 12वीं कक्षा में 99 फीसदी अंक हासिल किए और देश भर में अव्वल रहे. उन्होंने खुद पर विश्वास रखा और अनुशासन के साथ मेहनत की. कहा जाता है कि उन्होंने बगैर कोचिंग के यह सफलता हासिल की. इस्मत के पिता एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापक हैं, उनके वेतन से आठ लोगों का परिवार चलता है.
मध्य प्रदेश में माध्यमिक शिक्षा मंडल की हायर सेकंडरी परीक्षा का रिजल्ट नीमच जिले के जावद के खेतिहर मजदूर के बेटे गोपाल धाकड़ के नाम रहा. वे गणित समूह में 97.4 फीसदी अंकों के साथ सभी संकायों की मेरिट में पहले स्थान पर रहे. गोपाल के पिता नंदलाल और मां शांतिबाई खुद की खेती के अलावा दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं. गोपाल के पिता इतने साक्षर हैं कि अपना नाम ही लिख सकते हैं.
इन ताजा मिसालों को देखने के बाद सवाल उठता है कि कोचिंग जरूरी है या नहीं. इस बारे में आइआइटी ग्रेजुएट और कोचिंग कारोबार में देश का पहला सफल आइपीओ लाने वाले कोटा के 18 साल पुराने कोचिंग संस्थान करियर पॉइंट के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक प्रमोद माहेश्वरी कहते हैं, ''कोचिंग मददगार है लेकिन, सच कहा जाए तो प्रतिभाशाली छात्रों के लिए कोचिंग जरूरी नहीं है. इसकी जरूरत औसत और इससे कुछ बेहतर छात्रों को ज्यादा रहती है.''
छात्रों की प्रतिभा के अलावा कई सरकारी और निजी स्कूलों की पढ़ाई प्रतियोगी परीक्षाओं या प्रवेश परीक्षाओं में सफलता को पक्का नहीं करती. ऐसे में कोई भी अभिभावक जोखिम नहीं उठाना चाहता. सितंबर, 2011 में देशभर में फैले कोचिंग संस्थानों पर उद्योग संगठन एसोचैम की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 70 फीसदी मां-बाप अपने बच्चों को कोचिंग दिलाना चाहते हैं.
एसोचैम ने दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बंगलुरू समेत आठ शहरों में 800 परिवारों का सर्वे किया. सर्वे के मुताबिक, कोचिंग उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और अब इसका कारोबार करीब 16,500 करोड़ रु. तक हो गया है. फिटजी के निदेशक आर.एल. त्रिखा के मुताबिक, ''यदि स्कूल अपना काम अच्छी तरह करेंगे तो कोचिंग सेंटरों की जरूरत ही नहीं होगी. छात्र खुद अपने जज हैं और वे ही अपनी जरूरत के मुताबिक कोचिंग सेंटर के चयन का फैसला करते हैं.''
दरअसल, स्कूली शिक्षा के साथ-साथ कोचिंग लेने का चलन बढ़ा है. आज की भागमभाग वाली जिंदगी में प्रवेश परीक्षाओं में कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच कोचिंग की अहमियत बढ़ रही है. अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल के अलावा प्राइवेट ट्यूशन या कोचिंग संस्थानों पर निर्भर हैं, जहां बच्चे स्कूल के होमवर्क से लेकर कंसेप्ट क्लियर करने और लगातार अभ्यास के लिए कोचिंग का सहारा लेते हैं.
लेकिन कोचिंग कारोबार का बड़ा हिस्सा बेतरतीब ढंग से बढ़ा है और इस पर सवालिया निशान भी लगे हैं. पिछले हफ्ते ही केंद्र सरकार द्वारा संचालित देश के आला इंजीनियरिंग संस्थानों की प्रवेश प्रक्रिया में बदलावों की घोषणा की गई है. हुएक राष्ट्र एक टेस्ट' की अवधारणा लागू करने के इरादे से केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने नए नियमों की घोषणा की है ताकि ''छात्रों को मनोवैज्ञानिक और आर्थिक दबाव से निजात मिल सके.''
इसके अलावा यह भी उद्देश्य है कि कोचिंग संस्थानों की जगह 12वीं कक्षा की स्कूली पढ़ाई को तरजीह मिले. नए पैटर्न से ली जाने वाली परीक्षा में तीन भाग होंगे-एक 12वीं की बोर्ड परीक्षा, दूसरा मेन टेस्ट और तीसरा एडवांस्ड टेस्ट. अंतिम दोनों टेस्ट के एक-एक प्रश्न पत्र होंगे, जिनकी परीक्षा एक ही दिन ली जाएगी. आइआइटी-जेईई और एआइईईई की जगह वर्ष 2013 से यह संयुक्त परीक्षा जेईई के नाम से होगी.
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आइआइटी) को छोड़कर केंद्रीय वित्तीय सहायता प्राप्त दूसरे संस्थान जैसे ट्रिपल आइटी और एनआइटी में छात्रों को प्रवेश देने के लिए 12वीं बोर्ड के परिणाम को 40 फीसदी, जेईई मेन टेस्ट के परिणाम को 30 फीसदी और जेईई एडवांस्ड टेस्ट के परिणाम को 30 फीसदी अहमियत दी जाएगी.
ट्रिपल आइटी और एनआइटी का अनुभव ठीक नजर आने पर 40+30+30 का यह फॉर्मूला आइआइटी 2015 से अपनाने के लिए सहमत हुए हैं. लेकिन सिब्बल की घोषणा के बाद कोचिंग उद्योग और शिक्षा जगत में मिश्रित प्रतिक्रिया हुई है. माहेश्वरी का कहना है कि सरकार की मंशा अच्छी है, लेकिन असल उद्देश्यों को पाने का तरीका कारगर नहीं है. व्यावहारिक रूप में देखा जाए तो छात्र तनावमुक्त होने की जगह और ज्यादा तनावग्रस्त हो जाएंगे.
बोर्ड परीक्षा भी कड़ी प्रतिस्पर्धा के दायरे में आ गई है. अभिभावकों का खर्च भी कम नहीं होगा. आइआइटी ग्रेजुएट और गुप्ता ट्यूटोरियल्स, इंदौर के सीईओ संदीप गुप्ता का कहना है, ''इससे कोचिंग को गोरखधंधा बना चुके संस्थानों पर लगाम लगेगी. दूसरी ओर स्कूलों को भी अब अपनी काबिलियत साबित करनी होगी. आगे चल कर ऐसा प्रयोग मेडिकल और मैनेजमेंट जैसे दूसरे क्षेत्रों में भी हो सकता है.''
नई व्यवस्था को लेकर कई तरह की आशंकाएं हैं. इससे केवल छात्रों पर दबाव ही बढ़ेगा. जेईई मेन और जेईई एडवांस्ड के दोनों पेपर एक दिन में होने का छात्रों पर मनोवैज्ञानिक दबाव रहेगा. उधर, 12वीं के अंकों को जोड़ना उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई जगहों के छात्रों के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि सीबीएसई और आइसीएसई बोर्ड की तुलना में राज्य बोर्डों के छात्रों के अंकों में भारी अंतर होता है. अलग-अलग बोर्ड के नंबर देने के अपने नियम हैं.
हालांकि 12वीं के अंकों को किस तरह अहमियत दी जाएगी, इसका तरीका फिलहाल स्पष्ट नहीं है. यह भी कहा जा रहा है कि यदि नई प्रणाली 2014 से लागू की जाती तो छात्रों को इस बदलाव के मद्देनजर तैयारी का पर्याप्त समय मिलता.
हालांकि जेआरएस ट्यूटोरियल्स, वाराणसी के निदेशक ए.के. झा का कहना है, ''छात्रों को नए पैटर्न से घबराने की जरूरत नहीं है. बोर्ड के वेटेज को देखते हुए उन्हें अंग्रेजी और वैकल्पिक विषयों की शुरू से तैयारी करनी होगी.''
त्रिखा मानते हैं कि नए पैटर्न के छात्रों के लिए फायदे और नुकसान, दोनों हैं. उनके मुताबिक, 12वीं की परीक्षा बुनियादी किला है और यह मजूबत होना ही चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि सभी अलग-अलग परीक्षाओं का एक परीक्षा के अंतर्गत वर्गीकरण कैसे हो सकता है? छात्रों की क्षमता का आकलन पूरी तरह कैसे होगा और अलग-अलग कोर्सेज के लिए इंजीनियरिंग परीक्षा का स्टैंडर्ड भिन्न और ऊंचा कैसे होगा?
दरअसल, मेधावी छात्रों के लिए किसी प्रकार की परेशानी से सामना मुश्किल नहीं है, लेकिन इनके अलावा दूसरे छात्रों को अपने माता-पिता की उम्मीदें पूरी करने या अपने सपने साकार करने के लिए व्यवस्थित मार्गदर्शन की दरकार होगी. अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए वे एक सही ठिकाने की तलाश में होंगे जहां एक ही छत के नीचे सारे समाधान मिल सकें. ज्यादातर सरकारी और प्राइवेट स्कूल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता पाने में छात्रों की ज्यादा मदद नहीं कर पाते. इसी वजह से जगह-जगह प्राइवेट ट्यूशन या कोचिंग संस्थान खुल गए हैं.
जेईई में सफलता पाने के लिए स्कूल अगर अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह से पूरी नहीं कर सके या छात्रों का विश्वास नहीं जीत सके तो कोचिंग पर ज्यादा निर्भरता कम होने की जगह निश्चित ही बढ़ जाएगी क्योंकि पहले तो उन्हें 12वीं में अच्छे नंबर लाने होंगे. फिर जेईई मेन और जेईई एडवांस्ड की तैयारी करनी होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां स्कूली शिक्षा बेहतर नहीं होती, वहां के बच्चों के लिए चुनौतियां बढ़ जाएंगी.
दरअसल, नए परीक्षा पैटर्न से संबंधित ये नियम केंद्रीय इंजीनियरिंग संस्थानों में दाखिले के लिए ट्यूशन मुहैया कराने वाले कोचिंग संस्थानों के लिए नए कारोबारी अवसर के तौर पर सामने आए हैं. कोचिंग संस्थान इसका फायदा उठाने की तैयारी में जुट गए हैं. कोचिंग उद्योग के अनुभवी संचालक मानते हैं कि संगठित क्षेत्र के कई इंस्टीट्यूट पहले से ही 12वीं की बोर्ड परीक्षा को भी ध्यान में रखकर छात्रों को तैयारी करवाते थे.
हालांकि पढ़ाने का पैटर्न जरूर बदलना होगा, स्टडी मटीरियल में भी बदलाव होगा और फैकल्टी के चयन पर भी बदली जरूरतों के मुताबिक फोकस होगा, लेकिन यह अच्छे इंस्टीट्यूट के लिए कोई बड़ा मसला नहीं है. दरअसल, कोचिंग संस्थान न केवल नए पैटर्न से निबटने को तैयार हैं बल्कि कुछ संस्थानों ने तो अतिरिक्त सामग्री की जरूरत को देखते हुए अपनी-अपनी फीस बढ़ा दी है.
देखा यह गया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम आते ही कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों की भरमार लग जाती है. लेकिन सही कोचिंग संस्थान का चयन अभिभावकों के लिए टेढ़ी खीर है. विज्ञापनों में ढेरों सफल छात्रों की तस्वीरें छापकर यह जताने की कोशिश की जाती है कि सफलता का नुस्खा इन कोचिंग संस्थाओं के पास ही है. गुप्ता कहते हैं, ''महज एकाध साल पहले खुले कोचिंग संस्थान अपने 70 से लेकर 100 छात्रों की आला रैंकिंग का दावा कैसे कर लेते हैं?''
दरअसल, प्रतियोगी परीक्षाओं में कामयाबी के लिए कोचिंग का भारी-भरकम उद्योग खड़ा हो चुका है, जिसमें संगठित और असंगठित क्षेत्र के संस्थान हैं. माहेश्वरी का का कहना है, ''उपभोक्ता की तरह छात्रों को कोचिंग संस्थान का चुनाव करना चाहिए. फीस दे रहे हैं तो यह भी देखें कि उनकी समस्याओं का समाधान हो रहा है या नहीं. यदि नहीं तो उस कोचिंग को छोड़ दें.''माहेश्वरी के मुताबिक, शिक्षक और छात्र का संबंध व्यावसायिक हो गया है. यह वैल्यू सिस्टम में आया बदलाव है.
संगठित क्षेत्र के कोचिंग संस्थानों में सेवा का स्तर बेहतर होना सकारात्मक बदलाव है. छात्र उस कोचिंग संस्थान को चुनें जहां उन्हें पर्सनल केयर मिले. अपनी समस्याओं को दूर करवाने के लिए उन्हें बोलने की आजादी मिलनी चाहिए. यह देखना चाहिए कि वे आसानी से संस्थान के मैनेजमेंट से मिल पाते हैं या नहीं.
छात्रों को उन संस्थानों से बचना चाहिए जिनकी बुनियाद प्रतियोगी परीक्षाओं के असफल परीक्षार्थी रखते हैं और जो अपनी बेरोजगारी से निजात पाने के लिए कोचिंग इंस्टीट्यूट खोल लेते हैं. कोचिंग संस्थान चुनते समय छात्र और उनके अभिभावक अकसर अपने परिचितों या रिश्तेदारों के परामर्श को तरजीह देते हैं लेकिन कोचिंग संस्थान चुनते समय उसका ट्रैक रिकॉर्ड, छात्रों की सफलता का प्रतिशत, फैकल्टी का स्तर आदि के बारे में जानकारी जुटा लेनी चाहिए.
किसी कोचिंग संस्थान में दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता का अर्थ है कि जो वादा वह कोचिंग करती है, उसे कितना निभा रही है, क्योंकि यही वह फैक्टर है, जो आपके लिए भी लाभदायी साबित होगा. इन सबको समझने के लिए कोचिंग संस्थान में पढ़ाया जाने वाला मटीरियल क्या है, पढ़ाने का तरीका कितना प्रभावी है, फैकल्टी कैसी है आदि महत्वपूर्ण बातों के बारे में जानना चाहिए.
कोचिंग संस्थानों की वेबसाइट के दावों की पुष्टि के लिए सफल छात्रों से उनकी असलियत जान लेना फायदेमंद है. उस संस्थान को चुनने में ही समझ्दारी है जो छात्रों को स्कूल के साथ समय के मामले में तालमेल बैठाने में मदद करने को तैयार रहते हैं. कोचिंग संस्थान की ओर से दी जाने वाली पढ़ाई की सामग्री, ह्ढैक्टिस पेपर्स और ऑनलाइन सुविधाएं बहुत ज्यादा मायने रखती है.
इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट की किसी भी प्रवेश परीक्षा की तैयारी 10वीं की परीक्षा के बाद ही शुरू हो जाती है. लेकिन झ का कहना है कि कक्षा 9वीं और 10वीं की पढ़ाई बुनियाद मजबूत बनाने के लिहाज से अहम है. छात्रों को इन दोनों कक्षाओं में हर विषय के अध्याय की एक-एक लाइन को ध्यान से पढ़ना चाहिए, इसके बाद अध्याय के पीछे के सभी प्रश्न खुद हल करने की पूरी कोशिश करें.
छात्रों को ट्यूशन के भरोसे नहीं रहना चाहिए. छात्र अगर खुद मेहनत करके सीखता है तो उसके फंडामेंटल्स क्लियर हो जाते हैं. यदि छात्र किसी कारणवश ट्यूशन या कोचिंग के लिए जाते भी हैं तो टीचर का पढ़ाने का तरीका कुछ ऐसा होना चाहिए कि वे ज्यादातर काम छात्र से करवाएं. महज सूचनाएं या रेडिमेड जानकारियां देकर छात्रों का काम आसान बनाना टीचर का काम नहीं है. छात्रों के बेसिक कंसेप्ट्स अच्छी तरह दुरुस्त होने जरूरी हैं.
माहेश्वरी मानते हैं कि छात्र की सफलता में कोचिंग क्लास के साथ ही माता-पिता का भी योगदान रहता है. अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चे की किसी के साथ तुलना नहीं करें. साथ ही बच्चे पर दबाव डालने की जगह उसे रिलैक्स्ड रखें और बच्चे का उत्साह बढ़ाते रहें. आप अपने बच्चों का यह कह कर आत्मविश्वास बढ़ाएं कि यदि किसी प्रवेश परीक्षा में चयन नहीं भी हो सका तो कोई बात नहीं, उनके लिए दूसरे विकल्पों की भरमार है. भाभा क्लासेज, कानपुर के निदेशक महेश सिंह चौहान मानते हैं कि असाधारण प्रतिभा के धनी कुछ ही बच्चे होते हैं बाकी ज्यादातर कोचिंग के जरिए अपना लक्ष्य पाना चाहते हैं. वक्त के साथ तेजी से बदल रहे कोचिंग संस्थान इसी तरह छात्रों के सपने पूरे करते रहेंगे.

