हाड़ौती के किसानों के लिए धान की फसल पिछले दो दशक से वरदान बनी हुई थी. उनके साथ-साथ व्यापारी भी वारे-न्यारे करते रहे. उसी धान ने इस बरस धरती-पुत्रों को धुनकर रख दिया. पीक सीजन निकल जाने के बावजूद मंडियों में हर साल के मुकाबले इस बार अभी तक आधा धान भी नहीं पहुंचा है. भावों में इस दफा पांच सौ रु. क्विंटल तक की गिरावट आई है.
28 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
धान के भाव गिरने की सबसे बड़ी वजह यों तो विश्वव्यापी आर्थिक मंदी को ही माना जा रहा है लेकिन इसके मूल में कु छ दूसरे प्रमुख कारण भी हैं. कृषि महकमे के मुताबिक पिछले साल के मुकाबले इस साल हाड़ौती संभाग में धान का रकबा घटकर आधा ही रह गया. पिछले साल संभाग में 47,000 हेक्टेयर में धान की बुआई हुई थी, जिसमें 1.11 लाख मीट्रिक टन की पैदावार हुई. इस साल 22,863 हेक्टेयर में धान की बुआई हुई, जिसमें 65,000 मीट्रिक टन की पैदावार होने का अनुमान है.
21 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
इसके पीछे यह कारण माना गया कि पिछले साल हुई अनियमित वर्षा से धान खराब और साफ शब्दों में कहें तो दागी हो गया था. इससे हुआ यह कि किसानों का रुझान धान की बजाए सोयाबीन की ओर ज्यादा हो गया. इससे विपरीत पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में इस साल धान का रकबा ज्यादा रहा और 15 से 20 फीसदी पैदावार भी ज्यादा हुई. इसी के चलते गुणवत्ता वाला होने के बावजूद धान के भाव लुढ़क गए.
धान के खरीदारों का मानना है कि हाड़ौती में धान की सालाना पैदावार का 25 फीसदी स्थानीय मिलों में खपता है. 75 फीसदी धान दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़ और उत्तर प्रदेश के निर्यातक खरीदकर उसे दूरदराज के देशों तक पहुंचाते हैं. यूरोप, अमेरिका, यमन, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, ईरान और इंडोनेशिया जैसे देश भारत और पाकिस्तान के धान के प्रमुख खरीदार हैं. पाकिस्तान और भारत के निर्यातक लगातार तीन साल से धान का स्टॉक करते आ रहे हैं.
14 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
07 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
दो साल से अंतरराष्ट्रीय बाजार में मंदी होने से व्यापार बेपड़ता होने लग गया. ऐसे में भारत के निर्यातकों ने धान का निर्यात बंद कर दिया. पुराना स्टॉक खाली न होने से वे नई खरीद नहीं कर रहे हैं. दूसरी ओर पड़ोसी पाकिस्तान के निर्यातक सस्ती दर पर ही धान का निर्यात किए दे रहे हैं.
कोटा ग्रेन ऐंड सीड मर्चेंट्स एसोसिएशन के पूर्व सचिव अविनाश राठी कहते हैं, ''धान का निर्यात न होने की वजह से भावों में 400-500 रु. प्रति क्विंटल तक की गिरावट आई है.'' बूंदी में चावल के कारोबार से जुड़े पंकज सलूजा बताते हैं, ''यहां की मुख्य फसल धान की 1121 नाम की किस्म का सबसे बड़ा खरीदार ईरान है और इस साल ईरान के भारत से आयात बंद करने के कारण भावों में मंदी आई है.''
30 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
श्री चावल उद्योग संघ के सचिव राजेश तापड़िया हाड़ौती में चावल व्यापार चौपट होने और किसानों की हताशा का सबसे बड़ा कारण केंद्र सरकार की नीतियों को मानते हैं. तापड़िया के ही शब्दों में, ''केंद्र की नीति अनिश्चिता भरी है. 2008 से गैर बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जो 19 सितंबर को ही हटाया गया है. इसके लिए भी 20 लाख टन का कोटा तय किया गया है. कोटा पूरा होते ही निर्यात बंद. ऐसे में भाव बढ़ने और किसानों को लाभ मिलने की उम्मीद बहुत कम है.'' तापड़िया को उम्मीद है कि जनवरी के अंत तक भावों में मामूली इजाफा हो सकता है.
23 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे16 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
दिसंबर बीत ही रहा है. एशिया की सबसे बड़ी मंडियों में शुमार कोटा भामाशाह मंडी में 40,000 मीट्रिक टन की आवक हुई है. बासमती के लिए मशहूर बूंदी मंडी में भी 13,000-14,000 बोरी धान ही पहुंचा है. यानी संभाग में संभावित उपज का पचास फीसदी धान ही मंडियों में पहुंचा है. मायूस धरती-पुत्र इस आस में उपज को रोके बैठे हैं कि भाव बढ़ेगा. ऐसे में नाउम्मीदी किसानों के मनोबल को तोड़ सकती है.
भावों में भारी फर्क| प्रजाति | भाव (पिछले साल) | भाव (इस साल) |
| पूसा वन | 1,500-1,800 रु | 1,200-1,400 रु. |
| सुगंधा | 1,400-1,700 रु. | 1,000-1,300 रु. |
| पूसा फोर | 1,900-2,121 रु. | 1,200-1,600 रु. |
| बासमती | 2,100-2,250 रु. | 1,400-1,700 रु. |

