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किताबें/राजनीति: पड़ोसी की पैनी पड़ताल

भारतीय उपमहाद्वीप के  हजार साल के इतिहास को खंगालते हुए उन परिस्थितियों और घटनाओं का विश्लेषण जिनकी वजह से पाकिस्तान का जन्म हुआ.

एम.जे. अकबर
एम.जे. अकबर
अपडेटेड 4 जून , 2012

चिंगारीः पाकिस्तान का अतीत और भविष्य
एम.जे. अकबर
हार्पर कॉलिंस,
नई दिल्ली
कीमतः 299 रु.
contact@harpercollinsindia.com

इस किताब की शुरुआत एक दिलचस्प सवाल से होती हैः एक हजार बरस से ज्‍यादा के अपने इतिहास के किस मुकाम पर हिंदुस्तानी मुसलमान अल्पसंख्यक बन गए? यह खास एम.जे. अकबर की शैली है, जो उनकी दूसरी किताबों और लेखों के इंट्रो में ही दिख जाती है. इस तरह वे पाठकों में जिज्ञासा पैदा करते हैं और उसे बरकरार रखते हैं. इतिहास ऐसे बताते हैं जैसे कोई मजेदार किस्सा सुना रहे हों.
इसमें 15 अध्याय हैं: पराजय का युग; सोमनाथ में शमशीर; फासले का सिद्धांत; अंग्रेज चातुरी; सलेटी भेड़िया; गांधी के मौलाना; अहिंसात्मक जिहाद; गांधी से मुस्लिम अलगाव; आखिरी तिनका; आस्था में आस्था; पाकिस्तान के धर्मपिता; अल्लाह का सिपहसालार; लम्बा जिहाद; पाकिस्तानः अंदर की घेरेबंदी और चांद का अंधेरा पहलू. इन सभी की शुरुआती चंद लाइनें पूरा अध्याय एक झटके में पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं.

अकबर भारत में मुसलमानों के एक हजार साल के इतिहास पर सरसरी नजर डालते हैं और साथ ही दुनियाभर की उन घटनाओं का भी जिक्र करते हैं जिन्होंने भारतीय मुस्लिम समुदाय को प्रभावित किया. इस क्रम में वे लुटेरों, तानाशाहों, धार्मिक विचारकों, फौजी जनरलों, अवसरवादियों, धर्म सुधारकों की हरकतों का जायजा लेते हैं. इस्लामी पहचान कायम करने के लिए फासले का सिद्धांत मानने वाले शाह वलीउल्लाह देहलवी, सैयद अहमद बरेलवी, सिख से मुसलमान बने मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी और मौलाना अबुल आला मौदूदी तक हर शख्स के विचारों को परखते हैं.

वे बताते हैं कि देश में अंग्रेजी हूकूमत आने के  बाद अतीत में जीने वाला समुदाय अपने भविष्य के बारे में चिंतित था और उसकी चिंताओं को अलगाववादी नेता और विचारक कैसे हवा दे रहे थे. ऐसे में हिंदू-मुसलमानों की सांप्रदायिक भावनाएं परवान चढ़ती गईं और हालात इस कदर बदल गए कि सबने तर्क को मानो तिलांजलि दे दी.

इन सबके बीच महात्मा गांधी और मौलाना अबुल कलाम आजाद, मोहम्मद हुसैन मदनी और सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे लोगों ने बंटवारे का विरोध किया पर अपने ही लोगों ने उन्हें खारिज कर दिया. गांधी खुद को दोनों समुदायों का नेता मानते थे, लेकिन दोनों के कट्टरपंथी राष्ट्रपिता को अपना नेता मानने से इनकार करते थे. उन्होंने बंटवारे के साथ मिली आजादी पर खुशी मनाने से इनकार कर दिया.

गांधी विभाजित भारत के पिता होने की बजाए संयुक्त भारत के सेवक होना पसंद करते. वे उस समय कलकत्ता में थे और शहर के हिंदू-मुसलमानों को दंगों से रोकने की कोशिश कर रहे थे. उन्होंने गृह युद्ध में लाखों लोगों को मरने से बचा लिया.

मजहबी आधार पर मुल्क के बंटवारे की सख्त मुखालिफत करने वाले मौलाना आजाद ने पाकिस्तान के दो हिस्सों में बंटने की पेशनगोई कर दी थी. अप्रैल 1946 में लाहौर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका चट्टान के संपादक सोरिश कश्मीरी से बातचीत में उन्होंने पाकिस्तान के आठ बीमारियों से ग्रस्त होने का अंदेशा जताया था और सारी बातें सही निकलीं. लेकिन मौलाना आजाद से खार खाने वाले, टीबी के मरीज मोहम्मद अली जिन्ना ने उनकी एक न सुनी.

मजेदार बात यह है कि जब जिन्ना ने पाकिस्तान का राग अलापा तब दिल्ली में मौजूद मौदूदी ने उसे 'नापाकिस्तान' करार देकर उसकी आलोचना की लेकिन बंटवारे के बाद उस मुल्क के धर्मपिता बन बैठे. उन्होंने देश में धर्मनिरपेक्षता की नई पौध जलाकर कट्टरपंथ का बीज बो दिया.

अकबर लिखते हैं, ''जो लोग अखंड भारत चाहते थे, उनके लिए जिन्ना की मौत बहुत देर से आई, जो लोग धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान की तलाश कर रहे थे, उनके लिए जिन्ना की मौत बहुत जल्द हो गई.''

मौलाना मौदूदी की अहमदी प्रॉब्लम ने इतना बड़ा बखेड़ा किया कि अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुना दी. हालांकि यह सजा उन्हें नहीं मिल पाई लेकिन 1953 में जस्टिस मुनीर और जस्टिस एम.आर. कियानी की 'मुनीर रिपोर्ट' ने मानो आने वाले समय में पाकिस्तान की हालत पेशनगोई कर दी. उन्होंने साफ कर दिया कि अगर देवबंदियों की हुकूमत होगी तो सारे बरेलवी काफिर हो जाएंगे. फिरके के मुताबिक, मुसलमान की परिभाषा बदल जाएगी.

उन्होंने चेताया कि अगर पाकिस्तान की हूकूमत ऐसी ओछी हरकतों में मुलव्विस हुई तो अनर्थ होगा. लेकिन पाकिस्तान के हुक्मरानों ने इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया. सेकुलर समझे जाने वाले जुल्फिकार अली भुट्टो ने सत्ता की खातिर घुटने टेके और मुल्लाओं की बन आई. जनरल जियाउल हक ने चिनगारी को अंगारा बनाया और अब शोले भड़क रहे हैं.

ठोस दलीलों और ऐतिहासिक आधार पर तैयार की गई इस किताब के आखिर में अंदाजा हो जाएगा कि पाकिस्तान स्थिर और आधुनिक राष्ट्र बन सकता है, बशर्ते वह मौदूदी के वैचारिक वारिसों को परास्त कर जिन्ना के रास्ते पर चल पड़े. यह मूलतः अंग्रेजी में लिखी गई टिंडरबॉक्सः पास्ट ऐंड फ्यूचर ऑफ पाकिस्तान का उम्दा अनुवाद है.

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