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छत्तीसगढ़: नक्‍सली निशाने पर सड़क

सड़क रोककर, सरकार को किसी भी रूप में अपने इलाके में दाखिल न होने देने की माओवादी रणनीति की काट छत्तीसगढ़ सरकार अब तक नहीं ढूंढ़ पाई है.

अपडेटेड 15 अगस्त , 2011

सड़क रोककर, सरकार को किसी भी रूप में अपने इलाके में दाखिल न होने देने की माओवादी रणनीति की काट छत्तीसगढ़ सरकार अब तक नहीं ढूंढ़ पाई है.

विकास कार्यों में लगी एजेंसियों के कर्मचारियों को फुलप्रूफ सुरक्षा मुहैया कराने के सरकारी दावों की जमीनी सचाई यह है कि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (पीएमजीएसवाइ) के तहत प्रदेश के 10 जिलों में 92 सड़कों के निर्माण लिए पिछले तीन साल में एक अदद ठेकेदार तक नहीं मिला. इसके अलावा राज्य पीडब्ल्यूडी की 44 सड़कों का निर्माण कार्य लंबे समय से अधर में है.

नक्सल क्षेत्र में योजनाएं


कुल स्वीकृत सड़कें 5,320
लंबाई 25,500.6 किमी
स्वीकृत पुल-पुलिया 36,583
पूर्ण सड़कों की संख्या 4,151
पूर्ण सड़कों की लंबाई 18,906 किमी
पूर्ण पुल-पुलिया 21,355
निर्माणाधीन सड़कें 786
सड़कों के लिए ठेके नहीं हो सके 92
भारत सरकार से अब तक
स्वीकृत रकम 6,479.86 करोड़
कुल प्राप्त रकम 4,857.49 करोड़
कुल व्ययः 4,663.82 करोड़

स्रोत: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और राज्‍य सरकार

माओवादियों की सड़क न बनने देने की रणनीति का यह असर है कि दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर और कांके जिले के दर्जन भर थानों में तैनात पुलिसकर्मियों तक को हेलिकॉप्टर से राशन भेजना पड़ रहा है. जहां पुलिस की सुरक्षा का यह हाल है, वहीं शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी परियोजनाओं का तो पूरी तरह बेड़ा गर्क है.

पीएमजीएसवाइ के आंकड़े देखें तो ठेकेदार न मिल सकने वाली सड़कों की लंबाई 689 किलोमीटर है. जिन सड़कों के लिए ठेकेदार नहीं मिल रहे उनमें बस्तर में 3, दंतेवाड़ा में 37, कांकेर में 25, राजनांदगांव में 5, नारायणपुर में 3 और बीजापुर में 19 सड़कें शामिल हैं.

ये 10 जिले वे हैं, जिन्हें केंद्र सरकार ने नक्सल जिला नोटिफाइ किया है. यही नहीं, राज्य की राजधानी रायपुर के मैनपुर इलाके की तीन सड़कें भी नक्सलियों की वजह से रुकी हुई हैं. प्रभावित 10 में से पांच जिले तो बस्तर संभाग के ही हैं. इनमें  दंतेवाड़ा के लिए पिछले पांच साल से 37 सड़कें स्वीकृत हैं.

विभाग 10 बार टेंडर बुला चुका है, लेकिन कोई ठेकेदार काम करने के लिए तैयार नहीं हो रहा. इसी तरह कांकव्र की 25 सड़कें हैं. कांकव्र के पखांजुर इलाके में एक ठेकेदार ने पिछले महीने सड़क निर्माण शुरू किया तो नक्सलियों ने उसकी दर्जन भर मशीनों को आग के हवाले कर दिया.

गौरतलब है कि यह हाल तब है जब मुख्यमंत्री रमन सिंह ने पिछले साल जून में 170 करोड़ रु. की लागत से नई सड़कें बनाने और इस काम में लगी एजेंसियों के कर्मचारियों को पूरी सुरक्षा मुहैया कराने की बात कही थी. लेकिन खुद मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव एवं जनसंपर्क आयुक्त एन. बैजेंद्र कुमार मानते हैं कि नक्सली दहशत की वजह से बस्तर में सड़क बनाना मुश्किल हो गया है.

काम में अड़ंगा डालने के लिए नक्सली ठेकेदारों की गाड़ियां जला डालते हैं. ठेकेदारों को डराया-धमकाया जाता है. माओवादियों के आतंक के कारण निर्माण कंपनियां बस्तर में काम करने से पीछे हट रही हैं. बैजेंद्र कुमार ने कहा, ''बस्तर में काम करना आसान नहीं है. फिर भी सुरक्षा कवर देकर सड़कें बनाने की कोशिश की जा रही है.''

सड़कें न बनने देने की नक्सलवादियों की रणनीति का असर व्यापक है. दंतेवाड़ा, बीजापुर और नारायणपुर, तीन ऐसे जिले हैं, जहां जिला मुख्यालयों तक ही सरकार का कानून चलता है. इसके बाहर नक्सलियों की समांतर सरकार चलती है. पिछले साल बीजापुर जिला मुख्यालय से आठ किमी दूर बारूदी सुरंग विस्फोट कर नक्सलियों ने सीआरपीएफ के आठ जवानों को मार डाला था.

सड़कें न होने की वजह से बस्तर के 300 से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां पिछले दस साल में कोई सरकारी नुमाइंदा नहीं पहुंचा है. दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर और कांकव्र जिले के दर्जन भर थाने ऐसे हैं, जहां हेलिकॉप्टर से राशन की सप्लाई करनी पड़ती है. जवानों को छुट्टी में अगर घर जाना हो तो उन्हें हेलिकॉप्टर से जिला मुख्यालय तक भेजा जाता है.

सड़कें या तो है नहीं और हैं तो नक्सलियों ने उन्हें खोद डाला है. चुनाव में मतदान दल भी हेलिकॉप्टर से भेजे जाते हैं. पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान उड़ान भर रहे एक हेलिकॉप्टर पर नक्सलियों ने अंधाधुंध गोलीबारी कर दी थी, जिसमें एयरफोर्स के फ्लाइट इंजीनियर मुस्तफा की मौत हो गई थी.

प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत गरीबों को स्मार्ट कार्ड मुहैया कराए हैं. बाकी जिलों में जहां 50,000 से लेकर 1.5 लाख तक स्मार्ट कार्ड बने हैं, वहीं, बीजापुर में एक भी कार्ड नहीं बन सका. दंतेवाड़ा में भी मात्र 9,631 कार्ड बने हैं. नक्सल प्रभावित इलाके में उप स्वास्थ्य केंद्र तो स्वीकृत हैं, मगर भवन नहीं बन पा रहे हैं.

बस्तर में ही 599 उप स्वास्थ्य केंद्रों के पास न तो अपनी इमारत है और न ही इमारतों के निर्माण की दिशा में कोई पहल दिखार्ई दे रही है. जहां अस्पताल हैं वहां डॉक्टर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. मसलन, दंतेवाड़ा में विशेषज्ञ चिकित्सकों के 36 पद स्वीकृत हैं, इनमें महज दो ही डॉक्टर तैनात हैं. ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर के छह के छह पद खाली पड़े हैं. इसी तरह चिकित्सा अधिकारी के 79 पद में से 56 खाली हैं.

बस्तर जिले में डॉक्टरों के 149 पद स्वीकृत हैं लेकिन महज 49 डॉक्टर ही यहां काम कर रहे हैं. दंतेवाड़ा में डॉक्टरों के 141 पद हैं, जबकि तैनाती महज 24 डॉक्टरों की है.  बीजापुर में 65 पद हैं, लेकिन महज 14 डॉक्टर तैनात हैं.

यही हाल शिक्षा विभाग का है. बस्तर जिले में 77 छात्रावास और स्कूल भवन बनने हैं. इनमें से 57 भवनों की परियोजनाएं मंजूर भी हैं. नारायणपुर और बीजापुर जिलों में भी 100 से ज्यादा स्कूल और छात्रावास भवनों का निर्माण अटका पड़ा है. विभाग तय स्थानों पर स्कूल नहीं बना पा रहा है, इसलिए अब ऐसे सुरक्षित स्थानों पर स्कूल बनाने का फैसला किया गया है, जहां तक सड़क जाती है.

क्या यह सिर्फमाओवादियों की दहशत है या सरकार भी दोषी है? इस सवाल पर विपक्षी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल ने कहा, ''सरकार की उपेक्षा की वजह से बस्तर में विकास कार्य ठप हैं. आदिवासियों को न्यूनतम सुविधाएं नहीं मिल रही. स्कूल और अस्पताल बंद रहते हैं.

नक्सलियों की आड़ में सरकार ने आदिवासियों को अपने हाल पर छोड़ दिया है.'' पटेल का कहना है कि केंद्र सरकार जब तक बस्तर को अशांत क्षेत्र घोषित कर नियंत्रण को अपने हाथ में नहीं लेगी, तब तक कुछ नहीं होने वाला. जल्द ही कांग्रेस के विधायक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिलने वाले हैं. 

इन सड़कों को बनाने के लिए प्रदेश सरकार के पास अब तक कोई ठोस रणनीति नहीं है. इसकी तस्दीक पीएमजीएसवाइ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीइओ) पी.सी. पांडेय के इस बेबस बयान से होती है. पांडेय ने कहा, ''कोशिश जारी है, किसी तरह काम शुरू हो.'' लेकिन इस कोशिश में नया क्या होगा, यह वे नहीं बता सके.

गौरतलब है, इन सड़कों लिए भारत सरकार 213 करोड़ रु. मंजूर कर चुकी है. उधर विभाग के कुछ जानकारों का कहना है कि  नक्सल समस्या तो है ही, अधिकारियों में इच्छाशक्ति की कमी भी सड़क न बनने का एक बड़ा कारण है. नक्सल प्रभावित इलाके में ठेकेदार काम नहीं कर सकते, इसलिए दो साल पहले सरकार ने खुद काम करने के लिए केंद्रीय ग्रामीण विभाग से इजाजत मांगी थी. केंद्र से इजाजत मिल गई है.

मगर इस दिशा में अभी तक कोई पहल नहीं हुई. बस्तर में स्टाफ की भी भारी कमी है. वहां जाने के लिए कोई तैयार नहीं होता. इस वजह से 50 फीसदी से अधिक पद खाली पड़े हैं. नीचे के कर्मचारियों की तो और कमी है, जो निगरानी का काम देखते हैं. पीएमजीएसवाइ में  काम कर चुके एक पूर्व सीईओ कहते हैं, ''फोर्स लगाकर पूरा अमला झेंक दिया जाए तो एक-एक कर सड़कें बनाई जा सकती हैं.''

बस्तर जिले में तो पीएमजीएसवाइ के साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण भी अधर में लटका हुआ है. इस इलाके पर नजर डालें तो यहां साल 2001 में परियोजना शुरू हुई. लेकिन परियोजना में 2008-09 के बाद कोई नया काम स्वीकृत ही नहीं हो सका है. इसका सबसे बड़ा कारण पुराने कार्यों का पूरा नहीं होना बताया जा रहा है.

नए काम के लिए डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी अब जाकर तैयार हो सकी हैं. आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले दस साल में इस योजना के तहत अकेले जगदलपुर मंडल के तहत साल 2008-09 तक 511 सड़कों के निर्माण की मंजूरी मिली थी जिसके तहत कुल 2,753 किमी सड़क का निर्माण किया जाना था. इसमें 4,400 से ज्‍यादा पुल-पुलियों का निर्माण भी होना था.

अधिकतर इलाकों के नक्सली क्षेत्रों में होने से इनमें से सिर्फ 1911 पुल-पुलिया ही बनाए जा सके हैं. 2,500 के करीब पुल-पुलियों का निर्माण अब भी अधर में ही है.

प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अधीक्षण अभियंता ओ.पी. चंदेल ने कहा, ''माओवादियों की दहशत के चलते ज्‍यादातर काम के लिए ठेकेदार ही नहीं आ रहे हैं. पुलिस की सुरक्षा के बाद भी ठेकेदार कतराते हैं क्योंकि एक बार सुरक्षा लेने के बाद वे हमेशा के लिए हिट-लिस्ट में आ जाते हैं.'' अब इसे सरकार की मजबूरी कहें या माओवादियों की मजबूती, लेकिन असल खामियाजा आदिवासियों को ही भुगतना पड़ रहा है. फिलहाल इन हालात से निजात पाने की सूरत भी नजर नहीं आ रही. 

-साथ में रायपुर से संजय दीक्षित और जगदलपुर से वीरेंद्र मिश्र

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