राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी केंद्र (एनसीटीसी) पर गृह मंत्री पी. चिदंबरम के रवैए ने तीन नाराज मुख्यमंत्रियों को यूपीए पर जबरदस्त हमले का माकूल मौका दे दिया है. बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडीसा को मिलाकर बनी पूर्वी क्षेत्रीय परिषद अब एक ताकतवर खेमा बनने जा रही है. 6 मार्च को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजे आने वाले हैं. उससे ठीक पहले इस खेमे के तीखे हमले ने यूपीए को तिलमिलाने के लिए मजबूर कर दिया है.
एनसीटीसी बनने से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में सरकार केंद्र का दखल खासा बढ़ने का अंदेशा है, इस तर्क के साथ इसका विरोध करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखने से महज हफ्ते भर पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूर्वी परिषद के गठन का समर्थन किया था. उन्होंने 13 फरवरी को कहा था कि ‘यह बहुत बढ़िया विचार है. मैं चाहता हूं कि इस तरह की संस्था बने. लेकिन इसे अभी औपचारिक आकार लेना है. अगर ऐसा होता है तो यह एक अर्थपूर्ण कदम होगा.’
जिस दिन नीतीश ने विरोध दर्ज कराया, ठीक उसी दिन ओडीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर एनसीटीसी पर अपनी आपत्तियों से अवगत कराया. उन्होंने कहा कि एनसीटीसी के कामकाज और उसके अधिकारों के मामले में केंद्र के निरंकुश रवैए को राज्य कतई बरदाश्त नहीं करेंगे. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी 14 फरवरी को प्रधानमंत्री को लिखा कि आतंकवादी संगठनों के बारे में खुफिया जानकारी इकट्ठा करने और उन पर नजर रखने के लिए बनाई गई एनसीटीसी की ‘समीक्षा की जाए और उसके प्रस्ताव को वापस लिया जाए.’ उनका कहना था कि ‘इसके नियम-कायदे सरकार के संघीय ढांचे का उल्लंघन करते हैं. इसके अधिकारियों के पास असीमित अधिकार हैं, जो राज्य सरकारों से किसी तरह का सलाह-मशविरा किए बिना ही गिरफ्तारी और तलाशी आदि का अधिकार प्रदान करते हैं.’
केंद्र सरकार को तीनों क्षत्रपों से साफ तौर पर मिलने वाला सियासी संदेश समझने में देर नहीं लगी. लोकसभा में इन तीनों की कुल 53 सीटें हैं. इनमें जनता दल (यूनाइटेड) की 20, तृणमूल कांग्रेस की 19 और बीजू जनता दल की 14 सीटें हैं. दरअसल, एनडीए के नेताओं के एक तबके का मानना है कि इन तीनों मुख्यमंत्रियों के बीच पहले से ही एक राजनैतिक सहमति है. नीतीश ने माना है कि वे प. बंगाल की मुख्यमंत्री से अकसर विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करते हैं. उन्हीं के शब्दों में, ‘लेकिन हम किसी सियासी गठजोड़ पर बात नहीं करते.’ मीडिया से विचार-विमर्श के दौरान उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्हें नहीं लगता, बनर्जी यूपीए छोड़कर एनडीए के पाले में लौटेंगी.
उधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता पूर्वी परिषद का दायरा बढ़ाकर उसे दक्षिण तक लाना चाहती हैं. लोकसभा में उनकी नौ सीटें हैं. प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में उन्होंने भी एनसीटीसी के तहत राज्यों के अधिकारों में कटौती पर एतराज जताया. जयललिता ने 19 फरवरी को ऐलान किया कि वे चाहती हैं, पार्टी कार्यकर्ता 2014 के लोकसभा चुनावों में सभी 40 सीटें जीतने के लिए अभी से काम में जुट जाएं.
अम्मा के इरादे साफ हैं-वे राष्ट्रीय राजनीति में जोर आजमाना चाहती हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं चाहती हूं कि अन्नाद्रमुक ऐसी स्थिति में आ जाए कि वह प्रधानमंत्री का चुनाव कर सके.’ भाजपा लगातार इस कोशिश में लगी हुई है कि जयललिता उसके पाले में आ जाएं. कांग्रेस की वे लगातार आलोचना करती आई हैं. सो, कांग्रेस के साथ किसी तरह के गठजोड़ की संभावना फिलहाल दिखती नहीं. पहले से ही डांवाडोल यूपीए इस आक्रामक मोर्चे के उभरने से डरा हुआ है.
हालांकि बनर्जी और पटनायक बहुत पहले भाजपा का साथ छोड़ चुके हैं, लेकिन बिहार के कुछ जद (यू) नेताओं का मानना है कि एनडीए के भीतर एक खास किस्म का खेमा बन सकता है. गठबंधन वाली राष्ट्रीय राजनीति की बढ़ती हुई दो-ध्रुवीय दुनिया में बनर्जी और पटनायक एनडीए के साथ उन शर्तों पर काम कर सकते हैं जिन शर्तों पर नीतीश बिहार में भाजपा के साथ कर रहे हैं. राजनैतिक टीकाकार चो रामास्वामी का मानना है कि उभरता हुआ राजनैतिक मोर्चा तभी कारगर हो सकता है जब वह कांग्रेस या भाजपा के साथ गठबंधन करे. ‘मैं इतना ही कहूंगा कि तीसरा मोर्चा चुनाव में तीसरे नंबर पर ही आता है. भाजपा या कांग्रेस से हाथ मिलाए बिना कोई सरकार नहीं बन सकती.’
भाजपा भी एनसीटीसी का विरोध कर रही है. राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली कहते हैं कि यूं ही एक आदेश के जरिए एनसीटीसी के गठन का सरकार का फैसला संघीय ढांचे का उल्लंघन है. उन्होंने मांग की कि जब तक इस मामले में राज्यों के साथ सहमति नहीं हो जाती, इस फैसले को मुल्तवी रखा जाना चाहिए. 21 फरवरी को उन्होंने कहा, ‘यह उन मामलों में से एक है जिनसे साबित होता है कि यूपीए सरकार शासनकला और नेतृत्व के तौर-तरीके भूल चुकी है. हम राज्यों के संघ नहीं हैं. सरकार अगर इस पर सवाल उठाती है तो राज्यों को इसका विरोध करने का पूरा हक है. आतंकवाद से लड़ने के लिए आप संघवाद की बलि तो नहीं चढ़ा देंगे.’
यूपीए के एक अन्य घटक दल नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी एनसीटीसी पर एतराज जताया है. भाजपाशासित राज्यों-गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश-ने भी इस संस्था के खिलाफ आस्तीनें चढ़ा ली हैं. भाजपा नेता एम. वेंकैया नायडु की अध्यक्षता वाली गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने भी 20 फरवरी को सिफारिश की कि एनसीटीसी के गठन के प्रस्ताव को फिलहाल रोक दिया जाए.
उधर, प्रधानमंत्री राज्यों को भरोसा दे रहे हैं कि एनसीटीसी पर उनसे सलाह ली जाएगी और उनके अधिकारों में कोई कटौती नहीं की जाएगी. उन्होंने गृह मंत्री को इस मसले पर राज्यों से बातचीत करने के लिए कहा है. लेकिन 22 फरवरी को प्रधानमंत्री से मिलने गईं बनर्जी को उनके आश्वासनों पर यकीन नहीं. नवंबर, 2008 के मुंबई हमलों के बाद के परिदृश्य को देखते हुए चिदंबरम ने आतंकवाद विरोधी विभिन्न उपायों को मजबूत बनाने के लिए एनसीटीसी बनाने का विचार रखा था. सभी खुफिया और जांच एजेंसियों को इस बड़ी संस्था के मातहत रखा जाना है. लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त और रक्षा मंत्रालयों के विरोध के चलते योजना खटाई में पड़ गई. इन तीनों की अपनी ताकतवर खुफिया एजेंसियां हैं और उन्हें अपने नियंत्रण से जाने देना उन्हें गवारा न था.
सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने 12 जनवरी को एनसीटीसी के अधिकारों में कटौती कर उसे इंटेलिजेंस ब्यूरो के मातहत कर दिया जिसका मुखिया अतिरिक्त निदेशक स्तर के अधिकारी को बनना था. चिदंबरम ने तब इस पर हार मानने से इनकार कर दिया था. उनका कहना था कि यह तो शुरुआत है. कैसी शुरुआत? एनसीटीसी के अंत की?
यहां है विवाद की जड़
एनसीटीसी अधिसूचना, 2012 के विवादास्पद हिस्से...
नियम 3.2: गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम 1967 की धारा 43 ए के तहत एनसीटीसी के ऑपरेशनल डिवीजन के अधिकारियों को गिरफ्तार करने और तलाशी लेने का अधिकार होगा.
नियम 3.5: एनसीटीसी को अपना काम करने के लिए दस्तावेज, रिपोर्ट, ट्रांस्क्रिप्ट, साइबर सूचनाओं सहित हर तरह की सूचना मांगने का अधिकार होगा, चाहे वह किसी भी रूप में हो. इस तरह की सूचना मुहैया कराने वाली या इस तरह की सूचना मुहैया कराने के लिए बाध्य एजेंसी मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए गोपनीय या अन्य तरीके से सूचना देगी.
नीतीश कुमार जनता दल (यू) एनसीटीसी खामियों से भरा है. हैरत की बात है कि इसे आइबी के तहत बनना है, जो एक गुप्त खुफिया संगठन है और जिसकी संसद के प्रति कोई जवाबदेही नहीं.लोकसभा में सीटें: 20
ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस इसके नियम-कायदे सरकार के संघीय ढांचे की अवमानना करते हैं. राज्य सरकारों की सहमति के बिना ही वे किसी के भी काम में टांग अड़ा सकते हैं.’लोकसभा में सीटें: 19
नवीन पटनायक बीजू जनता दल ‘प्रधानमंत्री ने कहा है कि गृह मंत्री हम लोगों के संपर्क में रहेंगे. देखते हैं, केंद्र का अगला कदम क्या होता है और गृह मंत्री की क्या प्रतिक्रिया रहती है.’लोकसभा में सीटें: 14
जे. जयललिता अन्नाद्रमुक ‘एनसीटीसी के तहत अंतरराज्यीय खुफिया टीमों का गठन राज्य सरकारों के कानूनी अधिकारों में सीधे-सीधे सेंधमारी जैसा है.’लोकसभा में सीटें: 9
-साथ में संदीप उन्नीथन और लक्ष्मी कुमारस्वामी

