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किताबें/ भेंटवार्ताएं: कद्दावर कवि का कहन

कुंवर नारायण हिंदी काव्य परिदृश्य में निर्विवाद रूप से एक विरल उपस्थिति हैं. प्रतिबद्धताओं और राजनैतिक रूप से सही होने के अतिरिक्त दबावों के दौर में वे बिना किसी शोरगुल और आत्मप्रचार के अपना काम करते रहते हैं.

अपडेटेड 31 अगस्त , 2011

तट पर हूं पर तटस्थ नहीं
कुंवर नारायण की भेंटवार्ताएं; संपादकः विनोद भारद्वाज
राजकमल प्रकाशन,
नई दिल्ली-2,
कीमतः 250 रु.

कुंवर नारायण हिंदी काव्य परिदृश्य में निर्विवाद रूप से एक विरल उपस्थिति हैं. प्रतिबद्धताओं और राजनैतिक रूप से सही होने के अतिरिक्त दबावों के दौर में वे बिना किसी शोरगुल और आत्मप्रचार के अपना काम करते रहते हैं. कविता, समाज, जीवन, मृत्यु, राजनीति, दर्शन आदि को लेकर उनके विचार ऐसे सुलझे हुए हैं कि किसी विषय पर बात करते हुए उन्हें न तो किसी प्रकार की कोई उलझ्न होती है और न उनकी भाषा में दुविधा या दो अर्थों का कोई भय शेष रहता है.

अमेरिका के आयोवा विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित की जाने वाली काव्य कार्यशाला में हिंदी के कई वाम और अति वामपंथी कवि हो आए. कुंवर जी को जब वहां जाने का प्रस्ताव मिला तो उन्हें यह लिखित में देना था कि वे वामपंथी नहीं हैं.

कुंवर जी वाकई वामपंथी नहीं है, इसके बावजूद उन्होंने लिखकर नहीं दिया कि वे वामपंथी नहीं हैं और आयोवा जाना अस्वीकार कर दिया. एक रचनाकार से उसकी विचारधारा पूछना और रचना से ज्‍यादा विचारधारा को तरजीह देकर उस आधार पर चयन करना कुंवर जी जैसे संवेदनशील कवि-मन को गवारा न हुआ. इसलिए उनकी ही पंक्ति को उधार लेकर कहा जाए तो यह सच हैः तट पर हूं तटस्थ नहीं.

कवि और कला समीक्षक विनोद भारद्वाज के संपादन में कुंवर नारायण के साक्षात्कारों का एक संकलन प्रकाशित होकर आया हैः 'तट पर हूं पर तटस्थ नहीं.' इस संकलन में इक्कीस साक्षात्कारकर्ताओं द्वारा उनसे विभिन्न कालखंडों और विभिन्न अवसरों पर लिए गए साक्षात्कारों को संकलित किया गया है. कुंवर जी से साक्षात्कार के लिए जाने वाले प्रश्नकर्ता के पास यदि तैयारी न हो, प्रश्न उन्हें पहले से थोड़ा-बहुत अगर नहीं बताया जाए, तो वे आमतौर पर इंटरव्यू के लिए तैयार नहीं होते हैं.

साक्षात्कार लेने वाले व्यक्ति के यह थोड़ा जरूरी भी है क्योंकि पुरानी दिल्ली में न्नगालिब समारोह में मुशायरे के बाद एक बड़े हिंदी समाचार चैनल की महिला पत्रकार ने निदा फाजली से यह सवाल किया था कि फिल्मी गीतों के अलावा भी आप कुछ लिखते हैं? आप उर्दू के शायर हैं तो क्या आपको हिंदी-अंग्रेजी आती है? जाहिर है, निदा साहब के भड़कने के लिए यह काफी था. लब्बोलुआब यह कि किसी बड़ी हस्ती से साक्षात्कार लेना कोई आसान काम नहीं है.

एक सवाल के जवाब में कुंवर जी कविता को लेकर कहते हैं: ''कविता जीवन से बेहद प्यार की भाषा है. इस बेहदी का और इस प्यार का आदर करता हूं, कविता इनके अभाव से उत्पन्न उदासी की भाषा बन जाती है. लेकिन फिर भी यह एहसास बना रहता है कि मनुष्य के पास एक अथाह वैभव है. उस ढाई आखर की याद दिलाते रहने के लिए फिर-फिर कवि होना चांगा. यह सिर्फ भावुकता की नहीं, एक बहुत बड़ी बुद्धिमत्ता की बात भी है.''

कुंवर जी साहित्य के अलावा फिल्म और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गंभीर रसिक हैं. संगीत को लेकर उनकी टिप्पणी हैः ''उच्च कोटि का संगीत हमारे मन को रोज के दबावों से मुक्त करके अपने लिए एक 'जगह' बनाता है. यह 'जगह' तत्काल प्रदर्शन के बाद भी खाली नहीं हो जाती, अपनी स्मृतियों को बसा जाती है. हम उन्हें बहुत बाद तक अपने अंदर सुन सकते हैं. यह विशेषता संगीत तक सीमित नहीं है, सभी महान कलाओं का स्थायी गुण है.''

इन दिनों कवियों में आत्ममुग्धता का संक्रमण जिस तेजी से हो रहा है, वह बहुत भयानक है. एक महान (?) युवा का कुंवर जी से पूछा गया एक दिलचस्प सवाल देखिए और उस सवाल पर उनका बेहद सुलझा हुआ, शालीन, मगर दो-टूक जवाब देखिएः क्या महान लेखन के लिए रचनाकार का आत्ममुग्ध होना जरूरी है? ''नहीं, बिल्कुल नहीं. बल्कि आत्ममुक्त होना जरूरी है. अच्छे लेखन के लिए जरूरी है कि एक लेखक व्यापक स्तर पर अपने समाज से भी जुड़े. तभी निजी का साधारणीकरण और विस्तार हो पाता है.'' कुंवर नारायण के साक्षात्कारों की इस किताब को पढ़कर यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि वे क्यों बड़े कवि हैं.

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