केदारखण्ड
हेमा उनियाल
तक्षशिला प्रकाशन, दरियागंज,
नई दिल्ली-2,
कीमतः 750 रु.
हिमशिखरों की गोद में केदारनाथ
एक किताब, जो विचार, दर्शन और साहित्य के संग धरती के किसी मनोरम, शांत कोने की यात्रा का सुख देती हो, जिसे हाथों में थामे घर के सबसे मीठे, सुकूनदेह कोने में बैठे भी आप दुर्गम पहाड़ों, दर्रों, घाटियों और जंगलों के सफर पर निकल पड़ें, उससे गुजरने की अनुभूति कैसी होगी, यह हेमा उनियाल की तकरीबन 550 पृष्ठों की किताब केदारखण्ड को पढ़ते हुए महसूस होता है.
हिमालय के पांच खंडों में से एक केदारखंड वर्तमान गढ़वाल है. यह किताब इस पूरे इलाके में फैले हिमालय के शिखरों, बर्फ से ढकी चोटियों, दुर्गम पहाड़ों, उनसे होकर गुजरती नदियों, ऋषियों-मुनियों और साधकों की गुफा-कंदराओं, धर्म के शिलालेखों, मंदिर में गूंजते घंटों और इन सबके साथ गुंफित मानवीय जिंदगी, पहाड़ों की गोद में बसे लोगों की गाथा है. जो किताब हमें सफर पर ले जाती है, उसे लिखते हुए खुद लेखिका ने कम सफर नहीं किया है. उत्तराखंड के लगभग हर उस हिस्से में वह गईं जहां तक पहुंचना मुमकिन था. लेखिका कहती हैं, ''प्रकृति के सानिध्य में यह यात्राएं आनंददायक रहीं. अलकनंदा, मंदाकिनी, भगीरथी और टॉन्स अपने पूर्ण यौवन काल में मिलीं. एकांत वन प्रदेश में, बर्फ से ढके क्षेत्रों में भय भी हमें छूकर गुजरा.'' लेकिन फिर भी यह विशुद्घ यात्रा वृत्तांत नहीं है. किताब की शुरुआत ही केदारखंड की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से होती है. इतिहास को खंगालते हुए वह वेदों के युग में जाती हैं, क्योंकि वहां से निःसृत भागीरथी का जिक्र वेदों में भी मिलता है. केदारनाथ और बदरीनाथ भारतीय सनातन संस्कृति के प्रमुख केंद्र हैं.
इतिहास के बाद वह हरिद्वार से लेकर पौड़ी गढ़वाल, टिहरी, चमोली, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग के सभी दर्शनीय स्थल, मंदिर, घाट, आश्रम और शांत प्राकृतिक स्थानों के बारे में विस्तार से लिखती हैं. हिमालय से प्रेम करने वाले और प्रकृति के सानिध्य में जीने वाले लोगों के लिए यह किताब गाइड का काम भी कर सकती है, क्योंकि इसमें किसी स्थान विशेष के ऐतिहासिक महत्व और पृष्ठभूमि के साथ-साथ वहां जाने के संसाधनों, रुकने की व्यवस्था आदि के बारे में भी जानकारी दी गई है.
लेकिन यह महज ट्रैवल गाइड इसलिए नहीं है क्योंकि इसमें गहरा भावात्मक अनुराग है, जिसका अनुभव पढ़ते हुए भी होता है. लेखिका किसी मंदिर, गुफा, कंदरा या पहाड़ी झ्रने का जिक्र करते हुए जैसे उसमें रम जाती हैं, उसे पढ़ते हुए उन जगहों को खुद अपनी खुली आंखों से देखने की जिज्ञासा सिर उठाने लगती है.
जिसने स्वयं कभी अपनी आंखों से हिमालय को देखा है, वह जानता है कि उसकी वास्तविक गरिमा, उदात्तता और धवलता का गौरव गान करने वाला संसार का हर शब्द कितना छोटा और नाकाफी है. आधुनिक विज्ञान और तकनीक चाहे कितने भी करिश्मे कर दिखाए, न्यूयॉर्क के स्काई स्क्रैपर्स चाहे जितने ऊंचे हों और एफ1 की रफ्तार चाहे जितनी भी ज्यादा, ये सारे करिश्मे प्रकृति के करिश्मों के आगे बहुत बौने हैं. लेकिन ये बातें उनके लिए महज शब्दों की कलाकारी होगी, जिन्होंने उन करिश्मों को न देखा, न महसूस किया.
पहाड़ों से गुजरते, उनके संग जीते हुए अमेरिका और ग्लोबलाइजेशन के बड़े से बड़े मुरीद को भी अपने भीतर एक आध्यात्मिक ऊर्जा का एहसास होता है. बेशक यह आध्यात्म हिंदुत्व के नए फैशनेबल गुरुओं का आध्यात्म नहीं है. अनेक वर्षों से अलकनंदा के सानिध्य में रह रहे मेरे एक मार्क्सवादी दोस्त ने एक बार कहा था कि पहाड़ों में रहते हुए मैंने महसूस किया है कि कार्ल मार्क्स भी दरअसल आध्यात्मिक व्यक्ति थे. मार्र्क्सवाद और आध्यात्म शायद एक ही बात कर रहे हैं. लेकिन हमने एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़ा कर दिया है. यह बड़ी बात है और इसे समझ्ने के लिए तमाम पूर्वाग्रहों के लबादों को उतारकर बहुत दिनों तक हिमालय के साथ रहना-जीना पड़ता है. वह ठीक-ठीक विचार न दे तो भी एक सुंदर मन तो जरूर देता है. वह हमें सरल और विनम्र होना सिखाता है.
केदारखंड का जिक्र करते हुए यह बातें इसलिए जरूरी हो जाती हैं कि प्रकृति के अंतरंग कोनों को तथाकथित धर्म और आध्यात्मिकता के जाल से मुक्त करके उसके आदि रूप में देखने और महसूस करने की जरूरत है. उस तरह से नहीं, जैसे गर्मियों की छुट्टियों में हिंदुस्तान का मध्यवर्ग पहाड़ों को देखता है. मॉल रोड में शॉपिंग करके, बनावटी पार्कों में झूला झूलकर और कोका कोला पीकर लोग दिल्ली-मुंबई की धकमपेल में लौट आते हैं. बेशक बाजार ने हिमालय पर भी अपने विज्ञापनों के होर्डिंग लटका दिए हैं, पर जो उनसे अछूता रहकर सिर्फ हिमालय को जान सके, वह उस गहरी मानवीयता का अनुभव कर पाएगा, जो प्रकृति के कण-कण में समाई हुई है. लंबे शोध और परिश्रम से लिखी गई यह किताब सहज-सरल भाषा में उस मानवीयता का अनुभव कराती है, जिसकी अनुभूति आज सबसे कम हो गई है.

