कविता लिखना अगर साहस का काम है तो ये साहस 'गुल' राकेश ने एक बार फिर दिखाया है. 2024 में इनका काव्य संग्रह 'मां के होंठ’ आया था और अब 'गुलाबी धूप’ नाम से उनकी रचनाओं का नया संग्रह पाठकों के हाथ में आ गया है. उन्होंने संग्रह की प्रस्तावना में स्पष्ट कर दिया है कि " गुलाबी धूप में संकलित अधिकांश कविताएं मैने अपने जीवन के एक ऐसे दौर में लिखीं जब मेरे आस-पास और मेरे अंदर बहुत उथल-पुथल हो रही थी. तकरीबन सब कुछ बिखर रहा था. ना रिश्ते संभल रहे थे, ना दिल ना दिमाग. ऐसा लगता था कि आगे के सभी रास्ते अंधकार में डूबे हैं. जब भी नए रास्ते की खोज में निकलता तो किसी न किसी दीवार से टकरा जाता. रोशनी की तलाश करता तो अंधेरों में भटक जाता… अजीब कशमकश वाला दौर था…”
और कवि ने उस दौर का प्रतिबिंब कविता में कुछ यूं उतारा-”घर बसाने को हाथ तंग था/तुमको पाने को हाथ तंग था/ना उठाते जाम तो क्या करते/मुस्कुराने को हाथ तंग था.” 'गुल' राकेश की कविताओं में मौसम प्रकृति के दर्शन किसी न किसी स्वरूप में मिल जाते हैं. घोंसला शीर्षक से कविता में उन्होंने मौसम के कालखंड को कुछ यूं परिभाषित किया है-"ग्रीष्म ऋतु ने बाजू फैलाकर अंगड़ाई ली/तो एक हाथ वर्षा ऋतु से टकरा गया."
एकेडमिक फाउंडेशन की तरफ से प्रकाशित 66 कविताओं की इस पुस्तक की कीमत 895 रुपए रखी गई है जो कि बहुत ज्यादा है. उनका दावा है कि पाठकों से मिले प्रेम की वजह से उन्होंने दूसरा कविता संग्रह प्रकाशित किया तो लगता है कि उनका पाठक वर्ग कविताओं को हाथोंहाथ ले रहा है. बहरहाल, ‘गुलाबी धूप’ की कविताओं का असर पाठकों की प्रतिक्रिया पर निर्भर है.

