बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण की वोटिंग मंगलवार को होगी लेकिन इसी दिन तीन राज्यों में होने वाले उप-चुनाव में भाजपा की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है. नतीजे बेशक 10 नवंबर को आएंगे लेकिन उप-चुनाव के परिणाम यदि अनुकूल नहीं हुए तो, भाजपा के प्रति लोगों के हो रहे मोहभंग के संकेत भी उप-चुनाव के नतीजे प्रकट कर देंगे.
भाजपा के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उप-चुनाव मध्य प्रदेश का है. यहां कुल 28 सीटों पर उप-चुनाव होंगे. इनमें से 22 सीट ऐसी हैं जहां से कांग्रेस के तत्कालीन नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे. हालांकि भाजपा को अपनी सरकार बचाने के लिए यहां सिर्फ 9 सीट जीतने की जरूरत है जबकि कांग्रेस तभी सरकार बनाने की स्थिति में आएगी जब वह 22 सीट जीते. भाजपा के पास अभी 107 विधायक हैं. मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सदस्य हैं और 116 सदस्यों के साथ भाजपा की सरकार बनी रहेगी अगर निर्दलीय और अन्य विधायक शिवराज सिंह चौहान के साथ बने रहते हैं. कांग्रेस नेता फिलहाल इस कोशिश में हैं कि अगर 22 सीट नहीं भी जीत सके तो कम से कम सीट भाजपा जीत सके ताकि शिवराज सिंह सरकार की स्थिरता को लेकर सवाल उठते रहें. बहरहाल सबसे बड़ी चुनौती शिवराज सिंह चौहान के लिए है क्योंकि उन्हे अपनी ताकत दिखाने का शायद यह आखरी मौका है. अगर वे 22 सीटें जीत जाते हैं तो पार्टी नेतृत्व उन पर भरोसा करने की स्थिति में होगा. इससे कम सीट जीतने की स्थिति में शिवराज के विरोधी मुखर हो सकते हैं. दूसरी बात ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर है. यदि उनके समर्थक सभी 22 सीटों पर जीत हासिल नहीं करते हैं तो ऐसे में केंद्रीय मंत्रीमंडल में उनकी बारगेनिंग पॉवर कम होगी.
मध्य प्रदेश के अलावा गुजरात की 8 तथा उत्तर प्रदेश की 7 सीटों पर भी उप-चुनाव होंगे. गुजरात में अगर भाजपा जीत हासिल नहीं भी कर पाती है तो सरकार की स्थिरता पर कोई असर नहीं पड़ेगा. लेकिन इससे गुजरात भाजपा के नए अध्यक्ष सी.आर. पाटिल की स्थिति असहज हो सकती है. उन्होंने अध्यक्ष बनने के बाद घोषणा की थी कि गुजरात विधानसभा के अगले चुनाव में वे सभी 182 सीटें जीत कर दिखाएंगे. उत्तर प्रदेश में भी 7 सीटों पर उप-चुनाव हैं और 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी ताकत दिखाने का मौका है.
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