scorecardresearch

शासनः मणिपुर और असम सबसे बेहतरीन

इस साल असम सरकार रायजोर पोदुलित रायजोर सरकार (जनता के द्वार पर जनता की सरकार) की अवधारणा को फिर से अमल में ले आई है.

असम सरकार
असम सरकार
अपडेटेड 6 नवंबर , 2011

असमः जब सरकार पहुंची जनता के द्वार
इस साल असम सरकार रायजोर पोदुलित रायजोर सरकार (जनता के द्वार पर जनता की सरकार) की अवधारणा को फिर से अमल में ले आई है.

यह कार्यक्रम पहले 2002 में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने शुरू किया था. इसके तहत हरेक विभाग में जन शिकायत प्रकोष्ठ स्थापित किया जाएगा.

गोगोई कहते हैं, ''जनता की सरकार का मॉडल एकदम निचले स्तर तक जाएगा, जिसमें ब्लॉक स्तर के अधिकारी लोगों की समस्याओं को जानने के लिए गांवों में जाएंगे.''

 सरकार प्राथमिकता के आधार पर नौकरियां देने के लिए सभी खाली पद भी भर रही है. गोगोई का कहना है, ''वित्त विभाग ने विभिन्न विभागों में 88,298 पदों की मंजूरी दी थी.

अभी तक 36,443 नियुक्तियां की जा चुकी हैं. सभी मंत्रियों से अपने-अपने विभागों में खाली पद भरने के लिए कह दिया गया है.''

कैबिनेट के भीतर युवा ब्रिगेड ने सरकार को जनता के द्वार तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है. गोगोई के भरोसेमंद शिक्षा मंत्री हिमंत विस्वास सरमा ने सरकारी कार्यालयों में औचक निरीक्षण शुरू किया. दूसरे मंत्रियों ने भी उनका अनुसरण किया.

जहां परिवहन मंत्री चंदन ब्रह्मा नियम-कायदों का उल्लंघन करने वाले वाहनों का चालान करते हुए देखे गए तो वहीं ग्रामीण विकास मंत्री रॉकीबुल हुसैन ब्लॉक स्थित सरकारी कार्यालयों का औचक निरीक्षण करते पाए गए.

पीयूष हजारिका और जयंत माल्ला बरुआ सरीखे पहली बार चुने गए विधायकों ने व्यक्तिगत रूप से इस बात का ध्यान रखा कि मनरेगा जैसी योजनाओं का फायदा वास्तविक पात्रों को मिले.

सबसे बड़ा बदलाव तो कानून और व्यवस्था के मामले में हुआ है. दो बड़े उग्रवादी संगठनों-यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम और नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट फॉर बोडोलैंड-के सरकार के साथ बातचीत के लिए राजी हो जाने से जहां बगावत ने गौण रूप ले लिया है, तो वहीं राज्‍य सरकार के लिए अपनी नीतियों पर अमल कर पाना आसान हुआ है.

हिंसा की वारदातें 2008 की 492 के मुकाबले घटकर 2011 में 169 रह गई हैं. नागरिकों की मौतों की संख्या भी घट गई है. 2008 की 261 के मुकाबले 2011 में 24 मौतें ही हुंईं.

यह बदलाव पुलिस महानिदेशक शंकर प्रसाद बरुआ के अपनाए मानवीय नजरिए का नतीजा है. वे कहते हैं, ''मेरा लक्ष्य लोगों को यह यकीन दिलाना था कि पुलिस लोगों की रक्षा के लिए है, उन्हें परेशान करने के लिए नहीं.''

मणिपुरः उम्मीदों से परास्त नाकाबंदी
जब एक राष्ट्रीय अखबार ने पिछले महीने मणिपुर को एक नाकाम राज्‍य घोषित कर दिया तो राज्‍य की राजधानी इंफाल से सात किलोमीटर दूर मलोम की रहने वाली और नर्सिंग का कोर्स कर रही 22 वर्षीया अबेम गोलमी भौंचक रह गईं.

हां, यह सही है कि राज्‍य को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाले दो राजमार्गों पर लगातार 92 दिन तक चली नाकाबंदी ने राज्‍य में गतिरोध पैदा कर दिया.

आम जरूरत की वस्तुओं की कीमतें आसमान पर पहुंच गईं, ईंधन की कमी ने परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह ठप कर दिया और अस्पतालों में दवाइयों की खतरनाक हद तक कमी हो गई.

इससे भी बदतर बात यह रही कि न तो राज्‍य सरकार और न ही केंद्र सरकार ने इस नाकाबंदी को खत्म कराने के लिए तुरंत कोई पहल की. जून, 2010 में भी राज्‍य को इसी तरह दो माह तक नाकाबंदी का सामना करना पड़ा था.

इसके बावजूद गोलमी हार मानने को तैयार नहीं हैं और यह नहीं मान पा रहीं कि उनका राज्‍य नाकाम हो गया है. उनका कहना है, ''मैं जानती हूं कि प्रेस को नकारात्मक किस्म की खबरें ज्‍यादा रास आती हैं, लेकिन पिछले साल राज्‍य में बहुत-सी अच्छी चीजें भी हुई हैं. मैं समझ्ती हूं कि मणिपुर में दो साल पहले के मुकाबले आज कहीं ज्‍यादा अमन और चैन है. कम से कम इतना तो है कि फर्जी मुठभेड़ों की खबरें यहां सुर्खियां नहीं बन रही हैं.''

इस तरह की बात करने वाली गोलमी अकव्ली नहीं हैं. हालांकि ज्‍यादातर लोग मानते हैं कि राज्‍य सरकार यहां की ज्‍यादातर समस्याओं का राजनैतिक हल निकालने में नाकाम रही है, लेकिन पिछले एक साल में कानून और व्यवस्था की हालत में बहुत सुधार हुआ है.

मणिपुर में, जहां आज भी 1958 का सशस्त्र सुरक्षा बल (विशेष अधिकार) कानून लागू है, सुरक्षा बलों और राज्‍य पुलिस ने उग्रवादी संगठनों को आत्मसमर्पण करने अथवा म्यांमार और बांग्लादेश सरीखे पड़ोसी देशों में शरण लेने को मजबूर कर दिया है.

यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख राजकुमार मेघेन सरीखे बड़े उग्रवादी नेताओं की गिरफ्तारियों की वजह से यहां उग्रवादी हमलों में खासी कमी आ गई है.

राज्‍य में पुलिसकर्मियों की तादाद भी 2010 में बढ़कर 10,249 हो गई, जबकि इसके मुकाबले 2009 में यह 8,541 और 2008 में 5,502 हुआ करती थी.

अक्तूबर में जारी की गई राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की भारत 2010 की रिपोर्ट से पता चलता है कि संज्ञेय अपराधों की संख्या में कमी आ रही है.2008 में ऐसे अपराधों की संख्या 3,349 थी, जो घटकर 2009 में 2,852 और 2010 में 2,715 रह गई.

संज्ञेय अपराधों की संख्या में कमी लाने का श्रेय राज्‍य के पुलिस महानिदेशक वाय. जॉयकुमार सिंह को जाता है, जिन्होंने राज्‍य पुलिस को पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है.

पर मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह, जो संयोग से राज्‍य के गृह मंत्री भी हैं, विभिन्न संगठनों की ओर से आयोजित किए जाने वाले बंदों, नाकाबंदियों, आम हड़तालों, धरनों, प्रदर्शनों और रैलियों से उपजी अराजकता को लेकर चिंतित हैं.

वे कहते हैं, ''इन समस्याओं का हल बलप्रयोग नहीं है. सरकार किसी भी समस्या के समाधान के लिए किसी भी संगठन से बातचीत को तैयार है.''

Advertisement
Advertisement