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अर्जुन मुंडा भरोसेमंद हैं पर क्या टिकाऊ भी?

अतीत को लेकर अच्छी बात यह है कि यह गुजरी बातों के आकलन का मौका देता है. अब साल 2011 इतिहास के पन्नों में समा रहा है, ऐसे में साल की चर्चित हस्तियों में झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का जिक्र लाजिमी है.

अर्जुन मुंडा
अर्जुन मुंडा
अपडेटेड 30 दिसंबर , 2011

अतीत को लेकर अच्छी बात यह है कि यह गुजरी बातों के आकलन का मौका देता है. अब साल 2011 इतिहास के पन्नों में समा रहा है, ऐसे में साल की चर्चित हस्तियों में झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का जिक्र लाजिमी है.

वे साल भर झारखंड के लिए हर जरूरी विचार को मूर्त रूप देने की कोशिशों में जुटे रहे हैं. सितंबर, 2010 में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से ही मुंडा कुछ करने के जज्‍बे से लैस रहे हैं. उस समय कोई इस बात का अंदाजा तक नहीं लगा सकता था कि अतीत में कुशासन का पर्याय बन चुका झारखंड उनके नेतृत्व में साल भर में सुशासन संबंधी कदमों की नायाब मिसाल बनकर उभरेगा. यह साल मुंडा की उपलब्धियों की कहानी है.

झारखंड 30 अगस्त को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के जरिए जनसेवाएं प्रदान करने का कानून बनाने वाला देश का पहला राज्‍य बन गया. अगर आप झारखंड में हैं तो आय, जाति और आवास प्रमाण-पत्र जैसी सार्वजनिक सेवाएं इंटरनेट के जरिए आप तक पहुंच सकती हैं.

झारखंड के नक्शेकदम पर चलते हुए 'बडे़ भाई' बिहार ने भी पहली दिसंबर से इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के जरिए जनसेवाएं मुहैया कराने का कदम उठाया. झारखंड देश का चौथा ऐसा राज्‍य बन गया है, जहां 'सेवा का अधिकार' कानून लागू है. इसके तहत सरकारी अधिकारी एक निश्चित समय सीमा के अंदर जनसेवाएं प्रदान करने के लिए बाध्य हैं.

साल भर वे लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध शख्स के रूप में दिखे. सड़कों का जायजा लेने के लिए दूरदराज के इलाकों का दौरा करने से लेकर जनता के साथ सीधा संपर्क साधने के लिए कॉल सेंटर तक की रूपरेखा बनाने तक, मुंडा राज्‍य में प्रेरणादायी और भरोसेमंद प्रशासन कायम करने के लिए सक्रिय रहे हैं.

वे ऐसी शख्सियत के रूप में उभरे हैं जो नारों की बजाए काम में यकीन रखता है. वे अपने लक्ष्य में इसलिए भी कामयाब हुए कि उन्होंने सीखने की प्रवृत्ति लगातार बनाए रखी. राज्‍य के एक वरिष्ठ आइएएस अधिकारी कहते हैं, ''वे हमारे प्रस्तावों पर गौर फरमाते हैं. वे विकास लक्ष्यों पर चार्ट और प्रजेंटेशन के जरिए विचार-विमर्श करते हैं और बेहतर प्रशासन के क्रम में लगातार सीखने को उत्सुक रहते हैं.''

हर तरह की उथल-पुथल के बावजूद सकारात्मक नतीजे देने की उनकी प्रतिभा, उन्हें अपने समकालीन नेताओं से अलग बनाती है. 15 नवंबर, 2000 को झारखंड के अस्तित्व में आने के बाद से ही इस राज्‍य में तमाम सरकारें संकटग्रस्त रही हैं.

11 साल में राज्‍य ने राष्ट्रपति शासन के दो दौर के अलावा आठ सरकारें देखी हैं. ये तमाम सरकारें निहित स्वार्थों वाले सहयोगी दलों के समर्थन-वापसी के खतरों के साए तले झूलती रहीं.

मुंडा सरकार भी इसका अपवाद नहीं है. बदतर यह कि मुंडा सरकार को ऐसे विधायकों का समर्थन हासिल है जो अपने निहित स्वार्थों के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं और 'मलाईदार' पदों के लिए बेचैन रहते हैं. मुंडा उन्हें खुश करने में यकीन नहीं करते.

इस तरह की विषम परिस्थितियों में भी मुंडा ने ऐसे कई कदम उठाए हैं जिनसे उनका कद और बढ़ा है. उनके कई फैसले तो बेहद जोखिम भरे और सरकार को अस्थिर करने वाले हो सकते थे.

मांडू उपचुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन की जीत मुंडा के नेतृत्व कौशल का सबसे बड़ा सबूत है. उन्होंने इस उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी नहीं उतारा. अपनी सहयोगी आजसू को भी ऐसा करने के लिए मना लिया. फिर अपने सबसे भरोसेमंद और एक दशक पुराने सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) की कीमत पर झामुमो के प्रत्याशी का समर्थन करने का फैसला किया.

यह फैसला उस समय सही साबित हुआ जब जद(यू) प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई और झामुमो उम्मीदवार की जीत हुई. हालांकि, सब कुछ उनके मनमाफिक नहीं हुआ.

मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके द्वारा खाली की गई जमशेदपुर संसदीय सीट पर उपचुनाव में भाजपा की हार उनके लिए सबसे बड़ा झटका थी. जैसे-जैसे 2011 आगे बढ़ता गया, मुंडा ऐसी शख्सियत के रूप मे उभरे जिसका विरोधी भी सम्मान करते हैं.

झारखंड प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष प्रदीप बालमुचु कहते हैं, ''उनमें सभी तरह के लोगों को मैनेज करने की क्षमता है. पर विपरीत विचारधाराओं वाले लोग व्यक्तिगत हित साधने के लिए उनकी सरकार चला रहे हैं.''

उन्होंने सत्ता-संतुलन का बेहतरीन नमूना पेश करते हुए गठबंधन सरकार को गति दी. जद (यू) के 5 मंत्रियों के दबाव में 2003 में इस्तीफा देने को मजबूर बाबूलाल मरांडी की जगह पद संभालने वाले मुंडा आज राज्‍य में भाजपा का सबसे भरोसेमंद चेहरा हैं.

मुख्यमंत्री के रूप में यह उनका तीसरा कार्यकाल है. वे एक बार भी पांच साल तक पद का स्वाद नहीं चख सके हैं. झारखंड की उखाड़-पछाड़ की राजनीति में मुंडा का टिके रहना भी एक उपलब्धि है.

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