उम्मीद आज को नकारना और आने वाले कल की संभावनाओं का उत्सव है. यह निराशा के खंडहर से उगती है और उन लोगों के सपनों को आकार देती है, जिनका मोहभंग हो चुका है. यह धोखा खाए लोगों की ताकत है; राष्ट्रीय स्वतंत्रता के इतिहास में यह उम्मीद ही है जो असहमति का पोषण करती है और सत्ता के झूठ के खिलाफ बेजुबानों को लामबंद करती है. उम्मीद परिवर्तन की प्रस्तावना होती है.
28 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
2011 के हिंदुस्तान में उम्मीद के सिर पर एक गांधी टोपी थी. उसने अनशन किया, बेलगाम सत्ता के दस्तों को ललकारा, जेल की हवा खाई, मध्य वर्ग को उसकी आरामदायक जड़ता से जगाया, युवाओं और आदर्शवादियों को राजनीति की गलीज सड़क पर उतारा और उस भ्रष्ट सत्ता की बुनियाद हिला डाली जो लगातार शर्मसार होते रहने के बावजूद अपना नंगापन ढांपने में लगी रही. भारत का यह साल जो घोटालों के नाम हो रहा था, अब अण्णा हजारे नाम की उम्मीद की शक्ल में दर्ज किया जाएगा.
महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि गांव के इस सत्याग्रही का भारत की चेतना में उस समय पदार्पण हुआ, जब देश उम्मीद हार चुका था और वैराग्य में शरण लेने के कगार पर था.
21 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
कई करोड़ के संदिग्ध 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के कुत्सित घोटाले तक फैली भ्रष्टाचार की तुच्छ हरकत यूपीए सरकार का चरित्र बन गई थी. लोगों में गहरी निराशा घर कर गई थी. उनमें कुछ नहीं हो सकता, का भाव प्रबल था. कु छ बुरे पुरुष और एक महिला भी जेल जरूर गई लेकिन शासन का सर्वोच्च सोपान जवाबदेही से मुक्त रहा. सड़ी हुई व्यवस्था से उठ रही बदबू जब पूरे देश में फैल गई तब हजारे ने खुद को नाराज नागरिक के रूप में बीच मंच पर स्थापित कर लिया. वे दिल्ली में सत्ता के सर्वोच्च केंद्र-रायसीना की पहाड़ियों पर बने सत्ता के गढ़ के खिलाफ जन विह्नोभ के नायक बने.
14 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
07 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
सेक्स सर्वे: तस्वीरों से जानिए कैसे बदल रहा है भारतीय समाज
सरकार को लगा था कि अपनी दादागीरी से वह असंतोष से निबट लेगी. भारत एशिया का सबसे विकसित नागरिक समाज है और यह हमेशा उन शासकों के प्रति निर्मम रहा है, जो तानाशाह बनना चाहते हैं. संसद किसी नागरिक समाज की सर्वोच्च तीर्थ स्थल होती है और लोकतंत्र के देवताओं के नीचा दिखाए गए तीर्थयात्री के रूप में हजारे अपनी लड़ाई को गर्भगृह तक ले गए. उनके तर्क नैतिक थे और तौर-तरीके गांधीवादी, हालांकि खुद उनके मुताबिक, वे महात्मा नहीं हैं. वे सदन से एक ऐसा ईमानदार तंत्र चाहते थे जिसमें भ्रष्टाचार रूपी कैंसर से लड़ने के लिए जनता की इच्छा को शामिल किया जाए. सरकार ने इस बाहरी दखल का थोड़े समय तक विरोध किया और इसकी भारी कीमत चुकाई.
हजारे और इंडिया अगेंस्ट करप्शन के उनके साथियों के बनाए गए जन लोकपाल यानी जनता के लोकपाल का फैलाव और कार्यक्षेत्र यूपीए सरकार के लिए किसी बुरे सपने जैसी चीज थी. शुरू से अंत तक सरकार की प्रवृत्ति भ्रष्टाचारी को सजा देने की बजाए उसे बचाने की रही है, आखिर वे उसके अपने लोग थे. भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध का मतलब था खुद की सत्ता के विरुद्ध ही युद्ध. इसलिए स्वाभाविक रूप से सरकार ने असुविधा पैदा करने वाले इस दूत के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी.
एक हजारे पर आक्रमण ने पूरे देश के गांवों और कस्बों में हर आयु, लिंग एवं वर्ग के झुंड के झुंड हजारे पैदा कर दिए, जब सड़कें 'आज-हम-सभी-अण्णा-हजारे हैं' के रोमांच से भर गईं तो दिल्ली हिलने लगी. सरकार के नंगेपन को ढकने वाला कपड़ा तार-तार हो गया और सत्ता अपना तर्क खो बैठी. यह संसद को निरर्थक बनाने वाला आंदोलन नहीं था. इसने बस जनता के सदन को कुछ और विस्तारित और सशक्त कर दिया. भारतीय सेना में ड्राइवर रहे 74 साल के शख्स से प्रेरित यह जनता, एक नाराज जनता थी, उस शख्स की प्रतिबद्धता की प्रचंडता केवल उसके धीरज से मेल खाती थी. लोकपाल अब अपरिहार्य हो गया.
30 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
सड़कों पर फटे ज्वालामुखी से सामना होने के बावजूद सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की बजाए हजारे को रोकने में अधिक रुचि रखती है. सरकार के कुटिल कानूनी दिमागों (कपिल सिब्बल, पी. चिदंबरम और सलमान खुर्शीद) की ओर से तैयार किए गए लोकपाल विधेयक का ड्राफ्ट घुटने टेकने की घोषणा के साथ-साथ सबको शामिल करने वाले एक भ्रष्टाचार-निरोधी संस्थान के सिद्धांत से भटकना भी है. निचली नौकरशाही का एक व्यापक हिस्सा लोकपाल के तहत आएगा लेकिन केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआइ सरकार की जरखरीद गुलाम ही बनी रहेगी.
यह हजारे को दो-टूक जवाब है जो सीबीआइ को लोकपाल के अंतर्गत रखना चाहते हैं और भाजपा को भी जो उसे एक स्वायत्त निकाय के रूप में देखना चाहती है. हालांकि प्रधानमंत्री को बाहर नहीं रखा गया है लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर उनके पास बचाव के काफी रास्ते होंगे. समर्पण के इन क्षणों में भी साउथ ब्लॉक में प्रतिष्ठा नाम का नैतिक गुण दूर-दूर तक नजर नहीं आता, यदि हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष की एक खुली किताब हैं तो यूपीए सरकार उससे जान बचाने का एक गुप्त ग्रंथ.
हजारे का जवाब साफ है-हमला तेज करो. जब एक सर्द शाम इंडिया टुडे ने दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में उनसे मुलाकात की तो उनमें एक ही बदलाव नजर आया. उनकी पहचान बन चुकी सफेद सूती गांधी टोपी की जगह एक नीली ऊनी टोपी ने ले ली थी. वे सत्ता प्रतिष्ठान की जमी हुई अंतरात्मा से तो लोहा ले सकते हैं लेकिन राजधानी की दिसंबर की सर्दी उनके लिए बहुत भारी है. फिर भी चौतरफा घिरी यूपीए सरकार का यह ताकतवर सितमगर मौसम की अनिश्चितताओं से हार मारने वाला नहीं लगा. ''मेरी तरफ देखो क्या मैं बीमार लगता हूं.''
सचमुच, कमरे में कोई हीटर नहीं था. हालांकि बाहर मेहमानों के कमरे में दो हीटर लगे थे और वह कमरा स्वयंसेवकों और सत्ता को हिला देने वाले इस संत के अनुयायियों से भरा था. हालांकि उस शाम वे अपनी छवि को ही दबाने में लगे थे. उन्होंने कहा, ''मुझे गांधी के साथ मत जोड़ो'' (देखिए साक्षात्कार). यह शिक्षा उन्हें विवेकानंद से मिली थी कि आंतरिक खुशी अपने कर्तव्य पालन से ही मिलती है. गांधी का प्रभाव तो बाद का था.
23 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे16 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
उन्होंने एक कुटिल और शातिर सत्ता की ताकत के खिलाफ सत्याग्रह के गांधीवादी हथियार का इस्तेमाल किया. उन्होंने भूख की ताकत को ताकत की भूख के खिलाफ खड़ा किया. फौज के अनुशासन और ग्रामीण इलाके की समझ से अनुकूलित उनके नैतिकतावादी तौर-तरीके कई मायनों में उन महानगरीय युवाओं की आकांक्षाओं और रवैयों से मेल नहीं खाते जो उनका प्रशंसक वर्ग बन बैठा है. उन्होंने रालेगण के अपने ग्रामीण इलाके में शराब पीने जैसे व्यसनों के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है.
हजारे के आदर्श राज्य के विचार में भयावह होने की हद तक सादगी और स्पष्टता है जिसमें कुछ बड़े लोगों को पंच के रूप में रखा जाता है. ज्ञानियों की इस नैतिकतावादी तानाशाही में बहस या सर्वसम्मति को स्वीकार करने का धीरज नहीं है. दंभी अनुयायियों का समूह तथाकथित टीम अण्णा दरअसल नागरिक समाज की आदर्श प्रतिनिधि नहीं है. प्रतिरोध की ताकत और टीवी के परदे पर नजर आते रहने के कारण उनमें अपराजेयता का एक झूठा एहसास घर कर गया है. हजारे तो प्रतीक मात्र हैं. आभामंडल को बनाए रखने वाली स्क्रिप्ट टीम अण्णा लिखती है.
गांधीवाद से प्रेरित मुक्ति के उनके पाठ को जो चीज लुटियंस की दिल्ली के बाहर रहने वाली बहुसंख्यक जनता के बीच सहज स्वीकार्य बनाती है, वह है उसका राजनैतिक संदर्भ. एक ऐसे साल में जो प्रतिष्ठित लोगों के धूल-धूसरित होने का साक्षी बना. इस साल अकेले अण्णा ही उम्मीद के स्त्रोत के रूप में सीना तान कर खड़े नजर आए. जहां बहुप्रशंसित आधुनिकतावादी प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों के प्रति अत्यंत उदार परछाईं मात्र साबित हुए वहीं हजारे दिल्ली के ओछेपन के बहुत ऊपर उड़ान भरते रहे. जहां मनमोहन सिंह की बोली शासक वर्ग में भरोसा बहाल करने में असफल रही वहीं हजारे की सादगी भरी बातों ने हिंदुस्तान के दिलो-दिमाग को हिला दिया.
9 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे2 नवंबर 201: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
जहां सरकार के चापलूस वार्ताकारों ने अपनी कानूनी दलीलों का इस्तेमाल किया, वहीं हजारे ने अपने उद्देश्य की पवित्रता और चरित्र की अखंडता के बल पर भारत का दिल जीत लिया. हजारे सड़क के फैशनेबल युवाओं को राजनीति में वापस ले आए. उनसे मुकाबिल सरकार उनके रोष की ही हकदार थी. एक डरी हुई मगर बदला लेने के लिए तत्पर सरकार, जो उस शख्स को खामोश करने के लिए लंबा रास्ता तय करेगी जिसने उसे उसकी आरामदायक दुनिया से बाहर निकालने का दुस्साहस किया है. उनके अपार्टमेंट के दरवाजे पर आधी रात की दस्तक या तिहाड़ जेल की हवा हजारे को खामोश नहीं कर पाई. उन्होंने तो इस बागी की दंतकथा को बस थोड़ा और रोचक बना दिया.
अब जब कलंक का यह साल समाप्त होने को है, हजारे का क्रोध भारत की राजनीति को बदल चुका है. और एक पूरी पीढ़ी को आदर्शवाद से सराबोर कर चुका है. उन्होंने राजनैतिक वर्ग को डराकर शासक और शासित के बीच की दूरी को कम कर दिया है. हजारे ने राजनैतिक गुरुत्वाकर्षण के केंद्र को खिसका दिया. प्रधानमंत्री अब सत्ता में नहीं, कार्यालय में हैं. हजारे उस आम आदमी की आकांक्षाओं और नाराजगी से ताकत पाते हैं जो भ्रष्टाचार को अपना राजकीय धर्म बना चुकी सत्ता से हताश हो चुका है. एक ऐसे देश में जो जनसांख्यिकीय दृष्टिकोण से नौजवान होता जा रहा है, शहरी युवाओं को राजनीति में हिस्सेदार बनाने के लिए भारत के सुदूर ग्रामीण इलाके के एक नैतिकतावादी योद्धा का साहस काम आया. हजारे अंतःकरण की राजनीति के माध्यम से हम भारत के लोगों को आजादी के एक आंदोलन की अग्रगामी सैन्य टुकड़ी में ले आए.
19 अक्टूबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
12 अक्टूबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
5 अक्टूबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
यह नागरिक हजारे का साल था जिसने उस बदनाम सत्ता के खिलाफ खुद को समाधिस्थ कर लिया जो किसी तरह की असहमति से नफरत करती थी. लेकिन जब अण्णा का आंदोलन परवान चढ़ा तो सरकार बार-बार उनके आगे दंडवत होती दिखी. अण्णा की कामयाबी यह नहीं है कि वे क्या हासिल कर पाते हैं. उन्हें इस वजह से सराहें कि वे उम्मीद जगाते हैं.
अण्णा हजारे इंडिया टुडे के इस साल की सुर्खियों के सरताज हैं क्योंकि उनके क्रोध के वेग ने शासकों की नकचढ़ी नकारात्मकता को चूर-चूर कर दिया और शासितों के बीच उम्मीद को बहाल किया. नागरिक हजारे के संघर्ष ने भारतीय लोकतंत्र को मुक्त कराया है और एक पीढ़ी की नाउम्मीद जनता को सशक्त और सबल बनाया है.
-प्रिया सहगल के साथ

