शहरी युवाओं के लिए, किशन बाबूराव हजारे भारत की आखिरी उम्मीद हैं. उनसे चिढ़ने-कुढ़ने वाले भी उनकी जन्मजात सरलता से मुग्ध हैं, बावजूद इसके कि उनका अड़ियलपन अहंकार के करीब है. अण्णा हजारे की लोकप्रियता देशव्यापी है. युवा उनके देसी मिजाज पर फिदा हैं.
21 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
18 दिसंबर को अण्णा बंगलुरू आए. 27 दिसंबर से अपने प्रस्तावित अनशन और 1 जनवरी से 'जेल भरो' आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश में दक्षिण का दौरा यहीं से शुरू हुआ. इस बार रामलीला मैदान की अगस्त क्रांति जैसा कोई जबरदस्त जोश नहीं था. भीड़ कम थी, और जिन जगहों पर हजारे ने सभाओं को संबोधित किया, उनके इर्दगिर्द ट्रैफिक सामान्य रूप से चल रहा था.
लेकिन राजनैतिक रैलियों में जुटाई जाने वाली भारी भीड़ की तुलना में, हजारे की सभाओं में आने वाले लोगों की भीड़ अलग है. इन लोगों को लगता है कि वे स्वतंत्र सोच रखते हैं. इनके लिए हजारे गांधी और रॉकस्टार का मेल हैं.
14 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
कंधों पर बस्ता लादे स्कूली लड़कों से लेकर लंबे-तगड़े आइटी कर्मी हजारे की चुटीली बातों पर जोश से गरजते थे, उनके सीधे-सादे उपदेशों पर वाहवाही करते थे. पी. चिदंबरम और बी.एस. येद्दियुरप्पा से लेकर 'भले प्रधानमंत्री' मनमोहन सिंह के 'रिमोट कंट्रोल' और महाराष्ट्र के उन छह कैबिनेट मंत्रियों तक के पूरे राजनैतिक वर्ग पर हंसते थे, जिनके लिए हजारे कह रहे थे कि वे उनका 'विकेट' पहले ही ले चुके हैं. अण्णा ने 'जेल भरो' की अपील की. खाते-पीते श्रोता वर्ग में से कई लोगों ने कहा कि वे वास्तव में इस मकसद के लिए जेल जाएंगे.
07 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
बीपीओ में काम करने वाले 32 वर्ष के हरिहर नाथ ने कहा, ''उन्होंने कोई नई बात नहीं कही, लेकिन मुझे खुशी है कि मैंने उनको देखा. अगर जरूरी हुआ, तो मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं. यह अभी नहीं, तो कभी नहीं वाली हालत है.''
वे हजारे को 'लाइव' देखने के लिए अपनी पत्नी और दो साल के बेटे के साथ आए थे. 34 वर्ष की वीना रॉय अपने 10 साल के बेटे धनुष को 'आधुनिक गांधी' दिखाने लाई थीं.
उनका कहना था, ''मैं जेल जाने के बारे में नहीं जानती, लेकिन मैं यह पक्का करने की कोशिश करूंगी कि मेरे जीते जी भ्रष्टाचार खत्म हो जाए. मैं अपने बेटे को भी यही सिखाऊंगी.'' चाहे 42 साल के सरकारी अफसर गुरुप्रसाद हों, 28 साल के दुकानदार शिवकांत सिंह हों, या 32 साल के मैकेनिकल इंजीनियर प्रशांत एम.सी. हों, अपने जीते-जी भ्रष्टाचार से लड़ने की उनकी योजनाओं में हजारे इफेक्ट साफ नजर आता था.
लेकिन संदेह का सुर उठाने वाले लोग भी थे. 24 साल के जर्मन छात्र मैथ्यू रंग-रैनो नेशनल लॉ स्कूल यूनिवर्सिटी के अपने साथियों के संदेह और हजारे समर्थकों के जोश में तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहे थे.
उन्होंने सवाल किया, ''अण्णा जनता के चुने हुए नहीं हैं. क्या उनके लिए यह मांग उठाना सही है?'' 44 वर्ष के आइटी कर्मी सत्यनारायण ने पलट कर जवाब दिया, ''हमारे चुनावों में धांधली होती है, पैसे और शराब से वोट खरीदे जाते हैं. जो चुने हुए हैं, वे हमारे फैसले करने वाले कौन होते हैं?''
नमाजी टोपी पहने कार्यकर्ता शेख अब्दुल रज्जाक ने एक बड़ा सीधा-सादा सवाल किया, ''अण्णा, वे लोग कहते हैं कि आप आरएसएस के प्रतिनिधि हैं. मेरे जैसे लोग इसके जवाब में क्या कहें?'' हजारे का जवाब है, ''अपमान का घूंट पीना सीखो. पैगंबर मोहम्मद को भागना पड़ा था. ईसा मसीह को सलीब पर लटकना पड़ा था. जब वे महान लोग ऐसी चीजों से निबट सकते हैं, तो हम अपमान का घूंट क्यों नहीं पी सकते?''
आलोचक कहते हैं कि आम ऑटो-चालक, या घरेलू नौकर या मैकेनिक उनके नजदीक नहीं आता है. नेशनल एलायंस फॉर वुमेन की अध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रुथ मनोरमा कहती हैं, ''मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके साथ काम करूंगी, लेकिन ऐसे कई नव-उदारवादी ढांचे और मुद्दे हैं, जो अण्णा के आंदोलन को जनांदोलन बनने से रोकते हैं.''
यहां तक कि शिक्षित वर्ग में भी कई लोगों कृषि मंत्री शरद पवार के लिए कही गई बात, ''बस एक चांटा मारा?'' और शराबखोरी का समाधान, ''पीट-पीट कर बाहर निकाल दो''-सरीखे अण्णावाद पर आपत्ति है.
इन्फोसिस के पूर्व एचआर निदेशक टी.वी. मोहनदास पै कहते हैं कि अण्णा खुद भी इस उत्साहहीनता के बारे में जानते हैं. वे बताते हैं, ''उन्होंने कहा कि वे सब कहते हैं अण्णा हम तुम्हारे साथ हैं लेकिन जब वे पीछे घूम कर देखते हैं, तो कोई नजर नहीं आता.''

