नई दिल्ली। आम्रपाली ग्रुप पर एक बार 2010 में आयकर छापा पड़ा और तब समूह ने 1.39 करोड़ रुपए नगद सरेंडर किए थे जबकि 7 अगस्त 2013 के आयकर छापे में कंपनी ने 125 करोड़ रुपए की आय सरेंडर की थी यानी इसका कोई हिसाब-किताब देने में कंपनी नाकाम रही थी. 2013-14 के ऑडिटिड फाइनेंशियल स्टेटमेंट में किसी अतिरिक्त आय का जिक्र नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कंपनी के फोरेंसिक ऑडिट में ये चौंकाने वाले तथ्य आए हैं. पिछले दिनों आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इस रिपोर्ट का जिक्र है. फोरेंसिक ऑडिट टीम ने साफ तौर पर कहा है कि आम्रपाली ग्रुप ने ये बेहिसाब नगदी या तो घर खरीदारों से ली है या बोगस खरीदारी के जरिये विभिन्न कंपनियों से वापसी के तौर पर कैश में ले ली है.
कंपनी लगातार फ्लैट खरीदारों से नगदी लेती रही लेकिन उसकी एंट्री एकाउंट बुक में नहीं की गई. ये भी ऑडिट में स्पष्ट नहीं हो पाया कि कंपनी के सरेंडर 125 करोड़ रु. आयकर विभाग ने किस तरह स्वीकार किए जबकि 2013-14 के दौरान कंपनी ने कोई अतिरिक्त आय खाते-बही में दिखाई नहीं है. जाहिर है घोटाला काफी लंबा किया गया. यही नहीं फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि आयकर विभाग ने नोटबंदी के बाद 17 नवंबर 2016 को कंपनी का आयकर सर्वे हुआ जिसमें अधिकारी कैश और डायरेक्टरों का बयान लेकर गए. लेकिन फोरेंसिक ऑडिट टीम को इसकी जानकारी नहीं अभी तक नहीं दी गई है.
आम्रपाली की कंपनियों पर आयकर विभाग ने 9 सितंबर 2010 और 7 अगस्त 2013 को छापा मारा और तलाशी ली. आयकर विभाग ने पाया कि कंपनी ने बोगस सप्लायरों से सामान खरीद का सिर्फ ब्योरा दे रखा है जबकि कोई भी सामग्री खरीदी नहीं गई. ये फर्जी बिलिंग 842 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की थी. सप्लायरों की सत्यता का पता लगाने के लिए जांच अधिकारियों ने स्पीड पोस्ट से इनके पते पर चिट्ठी भेजी लेकिन ज्यादातर चिट्ठियां इस जवाब के साथ वापस आ गईं, "इस नाम की कोई फर्म इस पते पर मौजूद नहीं है".
कनोडिया सीमेंट्स नामक एक सप्लायर से आम्रपाली ने बजरी व सीमेंट की खरीद 14 फरवरी 2015 से लेकर 2 मार्च 2015 तक की गई दिखाई है. हैरानी की बात ये है कि 30 टन बजरी के ट्रक इस दौरान 19 बार आम्रपाली के परिसरों में घुसे और पांच मिनट के भीतर बजरी गिराकर बाहर निकल आए. कुछेक मामलों में तो 2 मिनट में ही ट्रक वापस आ गया. ये टाइमिंग कंपनी ने अपने चालान में दर्ज की हैं. इस सप्लायर से 11.69 करो की खरीदारी की गई. जाहिर है फर्जीवाड़ा किया जा रहा हो तो सब कुछ मुमकिन है.
कंपनी ने एकाउंटिंग में जबर्दस्त हेरफेर किए हैं. कंपनी ने अकाउंटिंग की पद्धतियों और सॉफ्टवेयर में बदलाव किए ताकि एजेंसियों की आंखों में धूल झोंकी जा सके. फोरेंसिक ऑडिट में पता चला कि कंपनी ने मार्च 2015 तक टैली सॉफ्टवेयर पर एकाउंटिंग की लेकिन इसके बाद फार विजन ले आई जिसे ठीक तरीके से लागू भी नहीं किया गया. नवंबर 2016 में ग्रुप ने फार विजन को भी बीच में छोड़ दिया और कुछ एकाउंटिंग दोबारा टैली में शुरू कर दी. ग्रुप के प्रोमोटर, सीएफओ और अफसरों ने हेराफेरी पकड़ी न जाए इसलिए साल में कुछ समय टैली में और कुछ समय फारविजन में लेन-देन का ब्योरा दर्ज किया. ये साजिश का हिस्सा था और इसके बाद कंपनी ने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज और आयकर विभाग में रिटर्न दाखिल करना बंद कर दिया.
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