लखनऊ के शहीद पथ पर स्थित एक प्रतिष्ठित स्कूल में ऑनलाइन लाइव क्लास के दौरान एक छात्र ने अश्लील वीडियो पोस्ट कर दिया. शिक्षक की शिकायत के बाद स्कूल प्रबंधन ने छात्र के अभिभावकों को उसकी हरकत की जानकारी दी. अभिभावकों के माफी मांगने के बावजूद स्कूल प्रबंधन ने उस छात्र को ऑनलाइन लाइव क्लास से सस्पेंड कर दिया है.
इसी तरह गोरखपुर के एक मिशनरी स्कूल में कक्षा दस की छात्रा का मोबाइल नंबर कई व्हाट्सएप ग्रुप में जुड़ने से उसके घर में हड़कंप मच गया. इस ग्रुप पर अश्लील संदेश भेजे जा रहे थे. अभिभावकों ने ग्रुप को ब्लॉक कर पता लगाया तो मालूम हुआ कि स्कूल के कुछ छात्रों ने छात्रा का मोबाइल नंबर दूसरे लोगों को बांटा था. इन छात्रों को ऑनलाइन क्लास के जरिए छात्रा का मोबाइल नंबर मिला था.
ऑनलाइन क्लास के साइड इफेक्ट केवल यही नहीं हैं. लखनऊ के एक मिशनरी स्कूल में कक्षा छह के छात्र रोहित वर्मा के लिए मोबाइल स्क्रीन पर आंखें गड़ाकर स्कूल की ऑनलाइन कक्षाएं अटेंड करना एक बहुत मुश्किल काम साबित हो रहा है. स्कूल के मेधावी छात्रों में शुमार रोहित किसी तरह ऑनलाइन क्लास में बताए गए पाठ को कापी में नोट कर लेते हैं. लेकिन बात-बात पर टीचर से सवाल पूछने वाले रोहित ऑनलाइन क्लास में खामोश ही रहते हैं, इनका पूरा ध्यान केवल बताए जा रहे पाठ को नोट करने में ही लगा रहता है.
ऑनलाइन क्लास से पढ़ाई में लगे ज्यादातर छात्रों के साथ रोहित जैसी ही स्थिति है. लॉकडाउन में काम-धंधों के साथ स्कूल भी बंद हो गए. स्कूलों ने ऑनलाइन क्लास पर फोकस किया. इसके जरिए पढ़ाई तो शुरू कर दी गई लेकिन अब इसके नकारात्मक पहलू सामने आने लगे हैं. यह नया पैटर्न छात्र-छात्राओं में सवालों की भूख खत्म कर रहा है. इसमें एकतरफा संवाद ज्यादा हो रहा है.
यह सामने आया है दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय (डीडीयू) के एक सर्वे में. यह सर्वे मनोविज्ञान विभाग की प्रो. अनुभूति दुबे और शोध छात्रा निशा कुमारी तथा वंदना सिंह ने गोरखपुर और देवरिया के 74 छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों पर किया है. इसमें 43 छात्राएं और 31 छात्र हैं. यह सभी ऑनलाइन क्लास के जरिए पढ़ाई कर रहे हैं. यह छात्र व्हाट्सएप और जूम ऐप की मदद से पढ़ाई कर रहे हैं. सर्वे में शामिल छात्र-छात्राओं की उम्र 11 से 18 वर्ष के बीच है.
नतीजों का विश्लेषण किया गया तो शिक्षा का सबसे चिंताजनक पहलू सामने आया. ज्यादातर छात्रों ने बताया कि ऑनलाइन क्लास में सिर्फ श्रोता बन कर रह गए हैं. क्लॉस में सवाल पूछने के मौके नहीं हैं. ऐसे में सवाल पूछने की आदत छूटती जा रही है. छात्राओं के नंबर सार्वजनिक होने से अभिभावकों में सामाजिक सुरक्षा की भी चिंता सामने आई. करीब 50 फीसद छात्रों ने माना कि इंटरनेट की स्पीड ठीक न होने से भी पढ़ाई में दिक्कत आ रही है. स्पीड कम होने से वीडियो लेक्चर बार-बार रुक जाता है. इससे समझने में मुश्किल आती है. इस कारण का कोर्स छूट जा रहा है.
इसके अलावा घर में मोबाइल सेट की संख्या सीमित होने से भी बच्चों को दिक्कत हो रही है. कुछ परिवार में एक से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं. घरों में स्मार्टफोन एक ही है जबकि क्लास का समय दोनों बच्चों का एक ही है. ऐसे में यह भी एक दिक्कत है. इतना ही नहीं ग्रामीण इलाकों में बड़ी तादाद ऐसे छात्रों की भी है जिनके घरों में स्मार्टफोन नहीं हैं. विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग की प्रो. अनुभूति दुबे बताती हैं, “यह नई शिक्षा पद्धति है. ज्यादातर छात्रों ने माना कि विषयवस्तु समझ में नहीं आ रही है. इसमें निजता का भी खतरा है. छात्राओं के अभिभावक इसको लेकर ज्यादा चिंतित हैं.”
वहीं अनएडेड प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल बताते हैं “ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान आने वाली शिकायतों से निबटने के लिए हम सभी ने एक गाइडलाइन तैयार की है. सारे निजी स्कूल अब उसी को आधार बनाकर पढ़ाई करा रहे हैं. गंभीर शिकायतें मिलने पर स्कूल प्रबंधन ने छात्र को ऑनलाइन क्लास से सस्पेंड कर दिया है और स्कूल खुलने के बाद छात्र के खिलाफ आगे की कार्रवाई की जाएगी.”
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