उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के बीच हुआ गठबंधन इलाके की राजनीति में नए गुल खिला सकता है. दोनों ही दल इस गठबंधन को लेकर खासे उत्साहित हैं, क्योंकि प्रदेश विधानसभा में दोनों दलों का आंकड़ा पहले से ही जिस रसातल पर है, वहां से आगे बढ़ने के बारे में सोचना ज्यादा कठिन नजर नहीं आता.
28 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
वैसे चुनावी नतीजा जब आएगा तब आएगा, फिलहाल रालोद अध्यक्ष अजित सिंह को केंद्रीय उड्डयन मंत्री की कुर्र्सी के तौर पर पहले ही गठबंधन का राज-प्रसाद मिल गया है. लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पश्चिमी यूपी के किसान आंदोलनों के दौरान पैदा हुआ नया जाट नेतृत्व है. मनवीर सिंह तेवतिया जैसे उभरते नेताओं को अगर उन्होंने अपने रंग में नहीं रंगा तो लंबे समय में उनकी चौधराहट को खतरा हो सकता है.
21 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
पिछले विधानसभा चुनाव में 141 विधानसभा सीटों वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को महज 3 सीटें मिली थीं. दूसरी तरफ रालोद को भी विधानसभा चुनावों में महज 10 सीटों से संतोष करना पड़ा. ये 10 सीटें भी पश्चिमी यूपी के पांच जिलों बागपत, महामाया नगर, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़ और मथुरा तक सिमटी रहीं, जबकि पश्चिमी यूपी में 26 जिले हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों ने अपने दम पर चुनाव लड़ा था. हालांकि अजित सिंह पिछले प्रदर्शन को अतीत का हिस्सा मानते हैं.
14 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
07 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
केंद्रीय मंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद उन्होंने पत्रकारों को बताया, ''अब हम पूरी तरह से उत्तर प्रदेश पर ध्यान दे रहे हैं. प्रदेश के लोग मायावती के शासन से त्रस्त हैं और अब उन्हें सीधा विकल्प मिल गया है.'' उन्होंने दावा किया कि रालोद-कांग्रेस के गठबंधन से पैदा हुई लहर पूरे देश में महसूस की जाएगी. दरअसल, अजित सिंह की आवाज में जो उम्मीद नजर आ रही है, उसकी एक वजह 2009 का लोकसभा चुनाव परिणाम भी है. इस चुनाव में रालोद और कांगे्रस दोनों को ही अच्छी कामयाबी मिली थी.लेकिन यहां याद रखना होगा कि लोकसभा चुनाव रालोद ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर लड़ा था.
रालोद इस बार प्रदेश में 45 सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना रहा है. हालांकि जाट नेता को यह नहीं भूलना चाहिए कि यमुना एक्सप्रेस-वे को लेकर पश्चिमी यूपी में किसान लगातार आंदोलन करते रहे. पहले टप्पल और फिर भट्टा-पारसौल गोलीकांड ने व्यापक राजनैतिक आंदोलन का रूप लिया, लेकिन इस दौरान रालोद ने किसानों के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी नहीं निभाई. बल्कि भट्टा-पारसौल कांड के बाद मनवीर सिंह तेवतिया जाट बिरादरी का नया चेहरा बनकर उभरे.
30 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि राहुल गांधी हर आंदोलन के दौरान जिस तरह किसानों के साथ खड़े हुए, उसका राजनैतिक फायदा पार्टी को मिलेगा. राहुल की पदयात्राएं और अलीगढ़ में हुई किसान महापंचायत को भी पार्टी अपने पक्ष में बहती चुनावी लहर की तरह देखती है. लेकिन मायावती ने इसकी काट के तौर पर इलाके के अहम वोटर यानी गन्ना किसानों को अपनी तरफ करने की कोशिश की है. बसपा सरकार ने किसानों की ओर से व्यापक मांग शुरू होने से पहले ही गन्ने का समर्थन मूल्य उम्मीद से ज्यादा बढ़ा दिया, जबकि इससे कम मूल्य के लिए महाराष्ट्र के किसानों को खूनी संघर्ष का सामना करना पड़ा. नए जिले बनाना और हरित प्रदेश को समर्थन उनके दूसरे प्रमुख दांव रहे.
23 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
16 नवंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
बहरहाल, कांग्रेस-रालोद गठबंधन का भविष्य चुनावी जीत पर टिका है. प्रयोग असफल होने पर अजित सिंह अपनी चिर-परिचित शैली में फिर कोई नया सियासी हमराह तलाशते नजर आ जाएं, तो बड़ी बात नहीं होगी. क्योंकि 'राजनीति में कोई अछूत नहीं होता' वाली कहावत को जितने प्रेक्टिकल ढंग से अजित सिंह अपनाते हैं, शायद ही कोई दूसरा नेता इस कला में इतना प्रवीण हो सका हो.

