scorecardresearch

शब्‍दश: कुछ बातें इतिहास की

चंगेज खान के नोकर तो इतने करीब थे कि उसके दोस्त ही माने जाते थे और उसके अंगरक्षण की रीढ़ थे, जिन्हें केसिग  कहा जाता था. यह दल उसकी हर तरह की सुरक्षा की चिंता करता था, यहां तक कि जहर से बचाने की भी जिम्मेदारी उसी की थी.

अपडेटेड 5 नवंबर , 2011

अक्तूबर के महीने में अटलांटिक के तटवर्ती इलाके में बर्फ की आंधी में फंसना बेहद मजेदार अनुभव भी हो सकता है और उतना ही तकलीफदेह भी. फिलाडेल्फिया और न्यूयॉर्क के बीच की सड़क दमकते सफेद पाउडर से जैसे पावस ऋतु का अपना श्रृंगार कर रही हो. गहरे-भूरे बादल काफी नीचे होकर उड़ान भर रहे होते हैं. बर्फीली छलना पपड़ियों का तो पूछिए ही मत.

गिरती रुई के फाहे-सी हैं लेकिन वही जब बर्फ के बड़े टुकड़ों में तब्दील हो जाती हैं तो उनमें वजनी धातु की-सी ताकत आ जाती है. एक पुल के नीचे से गुजरते वक्त उसकी बीम से ऐसा ही बर्फ का एक बड़ा टुकड़ा चट्टान की तरह भड़ाम से हमारी सेडान गाड़ी पर गिरा. पंजाबी मूल का और हमेशा सकारात्मक सोचने वाला हमारा ड्राइवर भी चौंक गया. बर्फीली आंधी के चलते दो घंटे का हमारा सफर चार घंटे में जाकर पूरा हुआ.

इस तरह के खराब मौसम में एक अदद किताब आपकी बेहतर हमसफर साबित होती है. यह आपके व्यक्तित्व को दो-फाड़ कर देती है. आधा तो मैं तूफान से उपजे अजीब-से सौंदर्य का आनंद लेने में खोया था और मेरा आधा भाग पहली सहस्त्राब्दी के तथ्यों के पन्ने पलट रहा था. यह शानदार किताब थी एंपायर्स ऑफ द सिल्क रोडः ए हिस्ट्री ऑफ सेंट्रल यूरेशिया फ्रॉम द ब्रोंज एज टु द प्रजेंट.

वैसे तो इतिहास के अतीत में विचरण के कई रास्ते हैं लेकिन सबसे अच्छा तरीका तो शब्दों में गुंथी कहानी पढ़ना-सुनना ही है. अब जब कभी आप बाजार से महंगे दामों में सब्जी लाने नौकर-चाकर भेजने की बहादुरी दिखाएं और फिर बावर्ची से उन्हें बनवाएं तो याद करें कि बहादुर, नौकर-चाकर, सब्जी, बाजार और बावर्ची जैसे शब्द 13वीं से 14वीं सदी के बीच चीन, मध्य एशिया और फारस से होकर गुजरते सिल्केन रूट के जरिए हिंदुस्तान आए.

वक्त ने हालांकि, उन शब्दों के मायने बुरी तरह से बदलकर रख दिए हैं. मंगोल राजाओं के जमाने में नौकर और चाकर उम्दा किस्म के खानदानी योद्धा होते थे और राजा के रक्षाकवच का अंग हुआ करते थे. यह सैन्य अभिजात व्यवस्था जन्म की बजाए योग्यता पर आधारित थी; चाकर तो दिलेरी का प्रतीक होता था, घूर दे तो मौत आई समझिए. पर हमारे आज के कथित लोकतांत्रिक दौर में नौकर-चाकर झाड़-लताड़ खाने वाले लौंडे बनकर रह गए हैं.

चंगेज खान के नोकर तो इतने करीब थे कि उसके दोस्त ही माने जाते थे और उसके अंगरक्षण की रीढ़ थे, जिन्हें केसिग  कहा जाता था. यह दल उसकी हर तरह की सुरक्षा की चिंता करता था, यहां तक कि जहर से बचाने की भी जिम्मेदारी उसी की थी. बा-उर्ची खास रसोई का जिम्मा संभालने वाले प्रबंधक होते थे, और कुछ चुनिंदा मर्दाने बातुर कहलाते थे.

इन शब्दों के मौजूदा अवतार बावर्ची और बहादुर में वह जज्‍बा नहीं दिखता. इनसे तो ऐसी ही छवि उभरती है जैसे कि कलकत्ता में मैली-कुचैली लुंगी पहने घूमता अदना-सा आदमी या फिर मुंबई में कोई बेचारा-सा द्वारपाल. मंगोल-चीनी शासकों में सबसे महान कुबलाई खान के पास तो ऐसे 12,000 अंगरक्षक हुआ करते थे. मार्को पोलो ने लिखा है कि खान ने इनमें से हरेक को अलग-अलग रंग की 13 पोशाकें उपहार में दे रखी थीं और इसके लिए अंदाजन 10 लाख गज से ज्‍यादा के रेशम की दरकार होती थी.

विकास की तो अपनी ही रफ्तार होती है. हिंदुस्तान में इन शब्दों के अर्थों में होने वाले बदलाव ने अपना समय लिया. अश्वारोही आक्रांता जैसे-जैसे अपने को जमाते हुए एक पुरसुकून शासक तबके में तब्दील हुए तो बैठकर चलाई जाने वाली इस सत्ता के तंत्र में उनका दरबार, उनके कायदे-कानून और जाति व्यवस्था सब बेमानी हो गए. एक समय था जब खास किस्म के काम ने आपका रुतबा बढ़ाया, अब वह रुतबा निहायत बंधे-बंधाए खांचों में फिट कर दिया गया है.

शासक की सेवा में लगा कोई भी शख्स महज नौकर बनकर रह गया. अंग्रेजों ने पहले से चली आ रही ऊंच-नीच वाली इस ओहदेदारी में एक अपमान का पहलू भी जोड़ दिया. शाही मुगल दरबार की पोशाकें उन्होंने खानसामाओं और परिचारकों को पहना दीं और बीच की कतार वालों को अपना थ्री-पी सूट और नेकटाइ पहना दी.

इन लोगों को अंग्रेजों ने अपने राज की दूसरे और तीसरे दर्जे की व्यवस्था में रखा. दिल्ली में भूरे साहबों वाले किसी क्लब में चले जाइए, आपको इसके सुबूत मिल जाएंगे. आजादी के बाद के हमारे लोकतंत्र में नए शासक वर्ग के रूप में उभरे भारतीय मध्य वर्ग ने सामंतों और औपनिवेशिकों वाला अहंमन्यता भाव तो ओढ़ लिया लेकिन न तो सामंतों जैसी दरियादिली अपना सका और न ही औपनिवेशिकों सरीखी कार्यकुशलता.

पचास साल पहले अमेरिकी लड़के लुटेरों को दौड़ाकर मारने वाला दरोगा बनने का सपना देखते थे. दरोगा अब रहे नहीं अमेरिका में. सब पुलिस अफसर कहलाते हैं. इसकी वजह है. आप अगर किसी ऑफिस में बैठते हैं तो आप अफसर हैं. ट्रेन ड्राइवर इंजीनियर कहलाते हैं और अमेरिकी राजनेता जब अपने मध्य वर्ग की बात करें तो उनका आशय बीते कल के कामगारों से ही होता है. भाषा सामाजिक सम्मान का पैमाना है और सम्मान की शुरुआत आत्मसम्मान से होती है.

भारत इतना बड़ा है कि किसी एक परिभाषा में फिट नहीं बैठता. पर यह साफ लग रहा है कि आज का युवा हमारे मुल्क के वे पारंपरिक मानसिक सांचे-खांचे तोड़ रहा है, जिसमें किसी गरीब की जगह धरती पर और दिमाग में भी एक किनारे ही मान ली गई थी. यह युवा पुरानी कोई भी अवधारणाएं मानने को राजी नहीं. रोज के 32 रु. कमाने वालों के गरीबी रेखा से ऊपर होने के मुद्दे पर उपजा अप्रत्याशित आक्रोश इसका गवाह है.

अर्थशास्त्री अचंभे में थे क्योंकि पांच दशक में उन्होंने अपने सामाजिक मापक बदले ही नहीं. इस मौन क्रांति के अगुआ गरीबी रेखा से नीचे वाले नहीं बल्कि वे हैं जिन्हें गरीबी की न्यूनतावादी व्याख्या मंजूर नहीं. नए हिंदुस्तानी को बारीकी से सच दिखाने वाले वे आइने और बड़ी महत्वाकांक्षाएं चाहिए. कभी समाज बहिष्कृत लोगों के लिए अब दलित शब्द आ गया है. 10 साल में नौकर या तो मंगोल काल वाला अर्थ फिर से पा लेगा या फिर उन भारतीय भाषाओं से गायब ही हो जाएगा, जो इस शब्द का उपयोग करते हैं.

Advertisement
Advertisement