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एक ठग गांधी नाम का

अभय गांधी को दूसरा नटवरलाल कहना ज्‍यादा उचित होगा. पांच महीनों में, अहमदाबाद की एक गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी (एनबीएफसी) के मालिक ने नौ महीने में रकम दोगुनी करने का वादा करके 10,000 खासकर गरीबों और मध्यमवर्गीय गुजरातियों के करीब 1,000 करोड़ रु. ठग लिए. इसके बाद वह चकमा देकर अपने परिवार के साथ नौ दो ग्यारह हो गया. उसके ग्राहक अभी भी सदमे में हैं.

अपडेटेड 20 जून , 2011

अभय गांधी को दूसरा नटवरलाल कहना ज्‍यादा उचित होगा. पांच महीनों में, अहमदाबाद की एक गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी (एनबीएफसी) के मालिक ने नौ महीने में रकम दोगुनी करने का वादा करके 10,000 खासकर गरीबों और मध्यमवर्गीय गुजरातियों के करीब 1,000 करोड़ रु. ठग लिए. इसके बाद वह चकमा देकर अपने परिवार के साथ नौ दो ग्यारह हो गया. उसके ग्राहक अभी भी सदमे में हैं.

किसी अखबार में उसने कोई विज्ञापन नहीं दिया. इसकी बजाए उसने 100 एजेंट रखे थे. वह बेहद सावधानी से अपना नेटवर्क चलाता था. इन एजेंटों को निवेशक ढूंढ़कर लाने के लिए वह अच्छा पैसा देता था.

एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले इस 31 वर्षीय कॉमर्स ग्रेजुएट की अमीर बनने की लालसा थी और इस बारे में उसके अंदर इतना अधिक आत्मविश्वास था कि उसने अपने सामने बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण से विवाह करने, अमिताभ बच्चन जैसा घर खरीदने और 2014 तक अपनी संपत्ति को बढ़ाकर 10,000 करोड़ रु. और 2020 तक 50,000 करोड़ रु. करने जैसे असाधारण लक्ष्य रखे.

गांधी की ठगी का कार्य-व्यापार अप्रैल के तीसरे हफ्ते में उस वक्त सामने आया, जब उसके हजारों निवेशकों को उसकी अभय इंट्राडे स्ट्रेटेजी एक्सपर्ट (एआइएसई) नाम की पूंजी प्रबंधन कंपनी में निवेश करने पर वापसी की दूसरी और तीसरी किश्त नहीं मिली.

बमुश्किल साल भर पहले उसने यह कंपनी शुरू की थी. उसके कुछ ग्राहकों ने मिलकर उसे घेरने की कोशिश की लेकिन वह अपने एजेंटों के जरिए उन्हें यह समझा पाने में कामयाब रहा कि उसकी निवेश योजनाओं में उसे अस्थायी नुक्सान हुआ है और वह एक महीने के अंदर उन्हें उनकी बकाया राशि दे देगा.

इसके बाद वह अपने मां-बाप के साथ अहमदाबाद से निकल भागा. उसके परिवारवाले एक छोटे से फ्लैट में रहते थे जबकि वह खुद किराए के एक आलीशान बंगले में रहता था और बीएमडब्लू कार में घूमता था. चर्चा है कि वह लंदन भाग गया है लेकिन इस मामले की जांच कर रहे सहायक पुलिस आयुक्त मयूरसिंह चावड़ा का कहना है कि अहमदाबाद अपराध शाखा अभी कुछ कहने की स्थिति में नहीं है. ''ठगने में उसकी काबिलियत का मुकाबला कर पाना संभव नहीं. लेकिन जिस तरह से उसने झ्टका दिया है, उससे लगता है कि शेयर बाजार में उसे भारी नुक्सान हुआ जिसके बाद वह भागा.

शेयर बाजार से उसे काफी फायदे की उम्मीद थी, जिसके बल पर वह अपने ग्राहकों को उनका पैसा लौटाता.'' गांधी के ज्‍यादातर ग्राहक गरीब मुसलमान थे, जो कम समय में बड़ी रकम बनाने के गांधी के एजेंटों के झंसे में आ गए. उसके अधिकतर एजेंट भी मुसलमान थे. अहमदाबाद में पकोड़े बेचने वाले 48 वर्षीय इरशाद शेख को सबसे ज्‍यादा नुक्सान हुआ है. उसने एआइएसई कैपिटल में 28 लाख रु. निवेश किए थे.

बर्बाद हो चुके शेख ने अपने पैसों के अलावा अपनी बहनों और ससुरालवालों का पैसा भी लगा दिया. उसने अपने पिता को 5 लाख रु. में घर बेचने के लिए राजी करवा लिया, ताकि पूंजी योजना में निवेश की जा सके. शेख का कहना है, ''अगर मैं पैसा लौटा नहीं पाया तो मुझे डूब मरना चाहिए.''

गांधी ने एजेंट तैयार करने के बाद साल की शुरुआत में दो योजनाएं शुरू कीं और किराए की एक तिमंजिला इमारत में अपना ऑफिस बनाया. पहली योजना में, निवेशक से वादा किया गया कि नौ महीने में उसकी मूल राशि दोगुनी हो जाएगी. अगर कोई निवेशक 1 लाख रु. लगाता था तो उसे आगे के नौ महीनों के लिए 22,000-22,000 के चेक दे दिए जाते थे. लगभग सभी मामलों में पहले दो चेक भुगतान कर दिए गए. जब तक तीसरे या चौथे चक बाउंस हुए, वह गायब हो चुका था.

गांधी अपनी आमदनी का पांच प्रतिशत उन एजेंटों को देता था, जो ग्राहक लाते थे और पांच प्रतिशत ऑफिस के रख-रखाव और लाइफ स्टाइल पर खर्च करता था.

इसका मतलब है कि हर 1 लाख रु. पर उसने 30,000 से 50,000 रु. तक बनाए. गांधी की दूसरी योजना में फ्री गिफ्ट या दुबई/थाइलैंड की यात्रा और छह महीने में पैसा वापस करने का वादा किया गया था. इस योजना में कर्ज लौटाने के बारे में एक रसीद भी दी जाती थी.

पुलिस को उसके देश छोड़कर भाग जाने के बारे में पक्का भरोसा हो जाने पर वह इंटरपोल की मदद से उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी कराएगी. जिन लोगों के साथ धोखाधड़ी हुई है, वे सरकार को इस बात के लिए दोषी ठहरा रहे हैं कि वह ठगों के मामले में सतर्क नहीं है.

लेकिन 12.5 प्रतिशत मुनाफे के वादे करने वाली एनबीएफसी में निवेश करने के खिलाफ आरबीआइ की ओर से बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद, उन्होंने खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी, इसमें किसी को भला क्या शक है?

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