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उत्तर प्रदेश में छोटे दलों का बड़ा गठबंधन

प्रदेश में छोटी, क्षेत्रीय और जाति आधारित कई पार्टियों ने गठजोड़ कर लिया है. छोटे दलों की मौजूदगी से बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दलों के उम्मीदवारों की किस्मत छोटी पड़ सकती है.

अपडेटेड 3 जनवरी , 2012

प्रदेश में बड़े दल अपने कील-कांटे दुरुस्त कर रहे हैं तो छोटे दल भी इन चुनावों में अपनी जगह तलाशने का खम भर रहे हैं. कोई स्थानीय जातीय समीकरण के बूते मैदान में उतर रहा है तो कोई विरोधियों को महज सबक सिखाने की मंशा से कूद पड़ा है. यही वजह है कि बीते विधानसभा चुनाव में एक ओर जहां पंजीकृत छोटे दलों की संख्या 112 थी वहीं अब तक वह 178 पर पहुंच गई है.

04 जनवरी 2012: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

पिछले विधानसभा चुनाव में 112 छोटे दलों ने चुनाव लड़ा लेकिन इनके खाते में केवल 5 विधायक ही आए. लोकतांत्रिक कांग्रेस, भारतीय जनशक्ति, जनमोर्चा, राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी और उत्तर प्रदेश यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को एक-एक सीट मिली थी. पिछले चुनाव में आंबेडकर क्रांति दल, आदर्श लोकदल, ऑल इंडिया माइनॉरिटीज फ्रंट, भारतीय नागरिक पार्टी, बम पार्टी, जनसत्ता पार्टी, विकास पार्टी और मॉडरेट पार्टी जैसे कई दलों को एक फीसदी वोट भी नहीं मिला. पंजीकृत छोटे दलों में सबसे अधिक 10.49 फीसदी वोट अपना दल को मिला जो कांग्रेस के 8.84 फीसदी से दो फीसदी ज्‍यादा थे. इसके बावजूद अपना दल का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत पाया.

28 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

पिछले चुनाव से सबक लेकर ये दल अपनी ताकत बढ़ाने के लिए एकजुट हो रहे हैं. इत्तेहाद फ्रंट (एकता मोर्चा) इसी का नतीजा है. पीस पार्टी, अपना दल, भारतीय समाज पार्टी और इंडियन जस्टिस पार्टी समेत 13 छोटे दलों से मिलकर बने इस फ्रंट ने प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है. इसी तरह करीब दर्जनभर पार्टियों से बना राष्ट्रीय परिवर्तन मोर्चा भी चुनाव में उतर रहा है. इस मोर्चे में क्षत्रिय, पाल, गड़रिया, केवट, पासी, मौर्य, कुशवाहा, माली के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों के नेता शामिल हैं. राजनैतिक विश्लेषक अभय कुमार बताते हैं, ''अगली विधानसभा में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत न मिलता देख छोटे दलों ने अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी है. इसी वजह से कई छोटे दल एक साथ आ रहे हैं.'' यही नहीं, वामपंथी दलों ने भी एकजुट होने की रणनीति बनाई है.

21 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

समाजवादी पार्टी (सपा) से अलग हुए अमर सिंह का मुख्य उद्देश्य अपने विरोधी आजम खान को सबक सिखाना है. उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकमंच भी ताल ठोकने को तैयार है. उन्होंने ऐलान कर दिया है, ''आज़म जहां से चुनाव लड़ेंगे जयाप्रदा भी वहीं से जनता के बीच उतरेंगी.''

छोटे दल उन नेताओं की एक शरणस्थली भी साबित हो रहे हैं जिनका बड़े दलों से टिकट कट रहा है. बसपा से निकाले गए नेताओं के लिए पीस पार्टी ने अपने दरवाजे खोल दिए हैं. पूर्व बसपा विधायक जीतेंद्र सिंह बबलू और लखीमपुर से बसपा विधायक राजेश गौतम पीस पार्टी में शमिल होकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. रमेश दीक्षित बताते हैं, ''कुछ लोग चुनाव लड़ने के बहाने सुर्खियों में आने की कोशिश करते हैं. छोटे दल उनकी हसरतें आसानी से पूरी कर देते हैं.''

14 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

इसके अलावा राजनीति में अपराधियों, व्यवसायियों और नौकरशाहों की बढ़ती आमद ने भी छोटे दलों की संख्या में इजाफा किया है. इन दलों पर नकेल कसने में चुनाव आयोग अपने को अक्षम पाता है. राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा बताते हैं कि चुनाव आयोग के पास दलों के पंजीकरण का अधिकार तो है लेकिन इनका पंजीकरण निरस्त करने का अधिकार न होने के कारण छोटे दलों की संख्या पर लगाम नहीं लग पा रही है.

प्रदेश में किसी भी दल के पास कोई बड़ा मुद्दा न होने और कई जगहों पर बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा के बीच दिलचस्प संघर्ष के मद्देनजर छोटे दलों को अपनी अहम भूमिका नजर आने लगी है. उन्हें लगता है कि वे एक मोर्चे के तौर पर त्रिशंकु विधानसभा में सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. ऐसे में छोटे दलों का गठजोड़, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई बड़े दलों के उम्मीदवारों की किस्मत छोटी कर सकता है.

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