पौराणिक मान्यता है कि 15वीं के कन्नड़ कवि कुमारव्यास ने महाभारत इस कारण लिखने का फैसला किया था, क्योंकि वे धरती का बोझ अपने सिर पर उठाने वाले शेषनाग के रामायण लिखने वाले कई सारे कवियों के बोझ से कराहने की आवाज सुन सकते थे. उनके इस 'संवेदनहीन' अर्थ पर कोई नाराज नहीं होता कि कई रामायणें हैं, बहुत सारी. कुमारव्यास ने जो कहा, उससे हमने उनकी शानदार कविताएं पढ़नी बंद नहीं की. 500 साल बाद कुमारव्यास के साहित्यिक वंशज ए.के. रामानुजन को वही बात कहने के लिए एक विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से हटा दिया गया.
1980 के दशक में शिकागो विश्वविद्यालय में रामानुजन 6 साल तक मेरे शिक्षक रहे थे. रामानुजन का जीवन पूरी तरह विचारशील जीवन था. उन्होंने कविताएं लिखीं, अनुवाद किए, छात्रों को पढ़ाया, कहानियों पर विचार किया. एक और कहानी से ज्यादा विचारोतेजक उनके लिए कुछ और नहीं होता था-वह कहानी, जो उन्होंने पहले न सुनी हो, वह कहानी, जो उस कहानी का एक भिन्न रूप हो, जो वे पहले से जानते रहे हों, वह कहानी, जो हाशिए पर पड़ी किसी संस्कृति या भाषा की हो.
जहां हम बाकी लोग अंधे और बहरे थे, वहां अपनी अनंत उत्सुकता, विश्वकोशनुमा दिमाग और अनूठी मेधा से जो भावनात्मक संपर्क देख सकता था, जो थ्री हैंड्रेड रामायंस फाइव एक्जाम्पल्स ऐंड थ्री थॉट्स ऑन ट्रांसलेशन-नामक निबंध लिख सकता था, वे सिर्फ रामानुजन ही हो सकते थे.
रामानुजन भाषा विज्ञान में प्रशिक्षित थे और उन्होंने साहित्य और भाषा का सूक्ष्म और नाजुक गठजोड़ पढ़ाया था. वे भाषा और साहित्य की बारीकियों को लेकर जैसे जीवंत थे, वैसा मैं किसी और को नहीं जानती. उन्होंने छात्रों की एक पीढ़ी को सिखाया था कि बोली में भेद या किसी कहानी के भिन्न संस्करण का कभी असम्मान मत करो, क्योंकि व्यवस्थित और कानूनों से बंधी इस प्रणाली में इस तरह के व्यवधान ही हमें उस चीज को बेहतर ढंग से समझ्ने में मदद कर सकते हैं, जो (एकाधिपत्य वाला) 'मौलिक' बन गई है.
मैं सोचती हूं कि मेरे शिक्षक और जनता के बुद्धिजीवी रामानुजन यह देखकर हैरान रहे होंगे कि रामायण की साहित्यिक परंपराओं के बारे में उनका निबंध इतिहास विभाग में पढ़ाया जा रहा है. मैं सोचती हूं कि वे यह जानकर अचंभित हो गए होंगे कि मीडिया के कुछ तबके ने खुद उन्हें भी एक इतिहासकार में बदल डाला है.
यह बात उनको चूर-चूर कर देती कि उनकी प्रिय रामायण-बहुलतावाद और जीवंत विविधता का वह झ्रना, जो इस उपमहाद्वीप और उसके बाहर की संस्कृतियों को ज्ञान देता है, वाम और दक्षिण, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, इतिहास और साहित्य के बंधनों में सीमित कर दी गई है.
1993 में ए.के. रामानुजन की मृत्यु हो गई. तब मैंने अपने शिक्षक, रामन के लिए श्रद्धांजलि लिखी थी. उस समय मैंने यह सोचकर खुद को सांत्वना दी थी कि उनका काम जिंदा रहेगा, यह कि पड़ताल की उनकी भावना और हर तरह की कहानियों के प्रति उनका आकर्षण हमें उस बारे में ज्यादा गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित करता रहेगा, जो हम पढ़ते हैं, चाहे वह धार्मिक हो या धर्मनिरपेक्ष, शास्त्रीय हो या लोक पारंपरिक.
आज मैं पाती हूं कि मैं उनकी आत्मा के लिए श्रद्धांजलि लिख रही हूं. मैं सोचती हूं कि वे इस बात से ध्वस्त हो गए होंगे कि कवि की कल्पना के करतब, उदारवादी और अनुदारवादी विद्वानों के बीच आक्रामक और रक्षात्मक तर्कों में बदल दिए जाएंगे.
वाल्मीकि रामायण का अर्शिया सत्तार का किया हुआ अनुवाद पेंगुइन बुक्स से प्रकाशित. उनकी नई पुस्तक, लॉस्ट लव्स एक्सप्लोरिंग रामाज एंगग्विश, वाल्मीकि के लेखन पर निबंधों की श्रृंखला है.

