बहुचर्चित 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले पर सीबीआइ का अगला आरोपपत्र, जिसके अगस्त के अंत तक आने की उम्मीद है, सारा ध्यान कंपनी जगत से हटाकर नेताओं की ओर ले जाएगा.
दूरसंचार मंत्रालय में ए. राजा की सदारत के दिनों पर पूरा ध्यान लगाने के बजाए, आरोप पत्र 2001 से लेकर 2007 तक, टेलीकाम लाइसेंसों में सारी गड़बड़ियों और प्रक्रियागत त्रुटियों की जांच करेगा, जब प्रमोद महाजन, अरुण शौरी और दयानिधि मारन दूरसंचार मंत्रालय के शीर्ष पद पर थे.
इसका मतलब है कि एस्सार ग्रुप सहित 2जी घोटाले से कथित तौर पर लाभान्वित होने वाले कुछ औरों के लिए अभी थोड़ी राहत हो सकती है. किसी और कॉर्पोरेट घराने का नाम न लेने के लिए सीबीआइ पर सरकार का भारी दबाव है, क्योंकि सरकार को लग रहा है कि इस जांच के जारी रहने से निवेश के माहौल पर नकारात्मक असर पड़ रहा है.
7 जुलाई को, जब सीबीआइ अपनी स्टेट्स रिपोर्ट पेश करेगी, तब इस पर सुप्रीम कोर्ट का नजरिया कुछ अलग हो सकता है, लेकिन जांच एजेंसी न्यायमूर्ति शिवराज पाटील की एक सदस्यीय समिति की रिपोर्ट का अपने आदर्श के तौर पर प्रयोग करेगी. तीसरा आरोपपत्र, जिसका मकसद 2जी से लाभान्वित होने वाले अन्य लोगों को निशाना बनाना था, वास्तव में राजा से पहले की सूची में बदल जाएगा. आरोपपत्र इन गड़बड़ियों और प्रक्रियागत त्रुटियों का विवरण देगाः
*स्पेक्ट्रम को 6.2 मेगाहर्टज् से बढ़ाकर 10 मेगाहर्टज् तक आवंटित करने का 2002 का फैसला, जिससे एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया सेलुलर, एयरसेल, बीपीएल और रिलायंस इन्फोकॉम को फायदा मिला.
*2001 में आए चौथे ऑपरेटर के लिए तयशुदा प्रवेश शुल्क लगाने का 2003 का फैसला, जिससे रिलायंस इन्फोकॉम और टाटा टेलीसर्विसेज को फायदा मिला.
*2003 में पहले आओ-पहले पाओ नीति अपनाना, जिससे रिलायंस इन्फोकॉम और टाटा टेलीसर्विसेज को लाभ हुआ.
*एयरसेल को लाइसेंस देने में तब तक देरी करना, जब तक उसे मैक्सिस कम्युनिकेशंस को बेच नहीं दिया गया. सी. शिवशंकरन को एयरसेल को मैक्सिस कम्युनिकेशंस को बेचना पड़ा, जिससे मारन के परिवार के नियंत्रण वाले सन टीवी ग्रुप को 725 करोड़ रु. मिले.
2004 से 2007 के बीच केंद्रीय टेलीकॉम मंत्री के रूप में मारन की भूमिका में सीबीआइ को खास रुचि है. जांच एजेंसी को भरोसा है कि वह मारन के कुछ फैसलों में पैसों का स्पष्ट हित साबित कर सकती है. मारन के लिए हालात मुश्किल करने वाली बातों में बीपीएल मोबाइल के पूर्व अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर का हाल ही में सीबीआइ के सामने दिया गया वह बयान है, जिसमें उन्होंने अपनी कंपनी एस्सार को बेचे जाने में मारन की भूमिका के जिक्र पर कहा है कि कोई था जो चाहता था कि वे कंपनी बेच दें.
चंद्रशेखर की गवाही इस वजह से अहम है, क्योंकि यह सीबीआइ के सामने सी. शिवशंकरन की पेशी के तुरंत बाद हुई है, जिसमें शिवशंकरन ने कहा था कि एयरसेल को मैक्सिस को बेच देने के लिए उन पर मारन ने दबाव डाला था. मारन और एयरसेल के अलावा टाटा टेलीसर्विसेज भी खुद को सीबीआइ के जाल में फंसा हुआ पा सकती है.
चंद्रशेखर ने बिना बोली लगाए 2003-04 में नई यूनीफाइड एक्सेस सर्विस लाइसेंस (यूएएसएल) जारी करने के लिए अवैध गतिविधियों और षड्यंत्रों के सबूत के तौर पर सीबीआइ को दो प्रस्तुतियां दी हैं. चंद्रशेखर कहते हैं कि तत्कालीन केंद्रीय दूरसंचार मंत्री अरुण शौरी और तत्कालीन टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया के प्रमुख प्रदीप बैजल के फैसलों से मोटा लाभ टाटा को हुआ था.
एक सदस्यीय पाटील समिति की रिपोर्ट के मुताबिक लाभान्वित होने वाले दूसरी कंपनियां थीं-भारती एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया सेलुलर.
पाटील समिति की रिपोर्ट में नए लाइसेंस देने में और इन कंपनियों को हुए फायदे में ट्राइ अधिनियम के उल्लंघन की ताईद करने वाले सबूत पेश किए हैं. रिपोर्ट की संबद्ध धाराओं में धारा 3.2 (1)-(4), धारा 2.51-2.55 और सबसे अहम धारा 6.1.(1) है, रिपोर्ट में कहा गया है कि ''यूएएसएल दिए जाने के लिए कोई अधिसूचित प्रक्रिया के बिना और सभी से आवेदन पत्र मांगे बगैर, जो प्रक्रिया इस तरह बनाई गई, उसे टाटा के बेसिक सर्विसेज लाइसेंस देने के लिए निर्धारित फॉर्मों पर किए गए आवेदन पर विचार करने में मददगार होने में इस्तेमाल किया गया.''
रिपोर्ट कहती है, ''बताए गए अधिकारी प्रक्रिया के निर्धारण में किए गए बदलाव के लिए जिम्मेदार दिखते हैं.'' सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चल रही सीबीआइ जांच अब अपने अंतिम चरण में है, और हो सकता है कई बड़े घराने इस जाल में फंसने से बच गए हों. लेकिन अब बड़ा सवाल यह है कि क्या एक कठोर और निर्मम सर्वोच्च न्यायालय ऐसा होने देगा.

