राम मंदिर की मूर्तिकला और पौराणिक प्रतीकों में क्या है खास, देखें तस्वीरें

मंदिर के निर्माण में करीब पांच लाख बीस हजार घनफुट गुलाबी सैंडस्टोन का उपयोग हुआ है. ये पत्थर राजस्थान के भरतपुर जिले के बंसी पहाड़पुर से लाए गए, जिनकी रंगत और मजबूती पूरे ढांचे को एक अलग आभा देती है. मुख्य मंदिर में प्रवेश करते ही गर्भगृह की शुरुआत सफेद संगमरमर से उकेरी गई चंद्रधारी गंगा और यमुना की भव्य मूर्तियों से होती है. ये मूर्तियां मंदिर के पावन जल-तत्त्व और पवित्रता के प्रतीक के रूप में खड़ी हैं. गर्भगृह के बाईं ओर बना विशाल मंडप विशेष आकर्षण है. यहां एक ताखे में गणेश जी की मूर्ति स्थापित है और उसके ऊपर रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ के प्रतीक अंकित किए गए हैं. इसी मंडप में आगे बढ़ते ही एक ताखे में हनुमान जी की प्रणाम मुद्रा दिखाई देती है. उनके ऊपर अंगद, सुग्रीव और जामवंत की मूर्तियां बनाई गई हैं, जो रामायण के युद्धकालीन सहयोग और समर्पण की कहानी को जीवंत करती हैं.
गर्भगृह के मुखमंडप के ऊपर पत्थर पर उकेरी गई विष्णु की शेषनाग पर लेटी हुई प्रतिमा ध्यान खींच लेती है. उनके पास लक्ष्मी जी विराजमान हैं और साथ ही ब्रह्मा और शिव की मूर्तियां भी अंकित हैं. यह पूरा शिल्प संसार के संरक्षण, संचालन और संतुलन का दार्शनिक चित्र है. गर्भगृह के ठीक ऊपर पहली मंजिल पर राम दरबार स्थापित है. इसके ऊपर बने विशाल जगमोहन का उपयोग आगे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट तय करेगा.
मंदिर की संरचना जितनी भव्य है, उतनी ही सुविचारित भी है. मुख्य मंदिर के उत्तर-पूर्व दिशा में विशाल यज्ञमंडप तैयार किया गया है, और उसके पास ही सीता कूप बनाया गया है, जिसकी अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान है. परिसर में भगवान गणेश, भगवान शंकर, सूर्य देव, हनुमान जी, मां दुर्गा और माता अन्नपूर्णा के अलग-अलग मंदिर भी निर्मित किए गए हैं. जहां पहले सीता रसोई हुआ करती थी, उसी स्थान पर माता अन्नपूर्णा का नया मंदिर बनाया गया है. इसके साथ ही शेषावतार मंदिर को भी नया स्वरूप दिया गया है, जिसमें लक्ष्मण जी की भव्य प्रतिमा है.

मंदिर के भीतर की सभी मूर्तियों का स्केच पद्मश्री वासुदेव कामथ ने तैयार किया और मूर्तियों का निर्माण जयपुर में कराया गया. वहां से इन्हें अयोध्या लाकर मंदिरों में स्थापित किया गया. मुख्य मंदिर के लोअर प्लिंथ पर वाल्मीकि रामायण पर आधारित चित्र श्रृंखला भी बनाई गई है, जिन्हें वासुदेव कामथ ने चित्रित किया और इनका परिचयात्मक लेखन यतीन्द्र मिश्र ने किया है. मंदिर परिसर का एक और प्रमुख आकर्षण सप्त मंदिर है. इनमें आदिकवि वाल्मीकि, महर्षि वशिष्ठ, देवी अहल्या, महर्षि अगस्त्य, माता शबरी और निषादराज गुह को समर्पित मंदिर बनाए गए हैं. वाल्मीकि रामायण की कथा, वशिष्ठ की गुरु परंपरा, अहल्या की मुक्ति कथा, शबरी की भक्ति और निषादराज की मित्रता जैसे प्रसंग यहां एक साथ जीवित महसूस होते हैं.

रामकथा में वर्णित पवित्र स्थलों और कथाओं को भी परिसर में प्रतीकात्मक रूप दिया गया है. कुबेर टीला को विशेष रूप से विकसित किया गया है. जनश्रुति के अनुसार यहां कुबेर का निवास माना जाता है. अंगद टीला को भी नया रूप मिला है. जटायु की विशाल आकृति गर्व से खड़ी है, मानो उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाती हो जब उसने सीता की रक्षा के लिए जीवन दांव पर लगाया था. रामसेतु में गिलहरी के योगदान की कथा को भी यहां साकार किया गया है. परिसर में ‘पावन गिलहरी’ नाम से स्थापित आकृति संकेत देती है कि छोटे प्रयास भी महान कामों का हिस्सा बनते हैं. इसके पास ही तुलसीदास की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जो रामकथा की अविच्छिन्न परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में खड़ी है.

रामायण में वर्णित महत्वपूर्ण किरदारों की मूर्तियां भी यहां स्थापित की गई हैं जैसे कि यह गिलहरी. राम कथा में जिक्र आता है कि लंका तक के लिए जब राम सेतु का निर्माण हो रहा था तब एक नन्ही गिलहरी भी इसमें सहायता करने आई थी.

राम मंदिर परिसर के चारों प्रवेश द्वार वैष्णव परंपरा के महान संतों के नाम पर रखे गए हैं- जगद्गुरु रामानंदाचार्य, जगद्गुरु माध्वाचार्य, आद्य शंकराचार्य और जगद्गुरु रामानुजाचार्य. यह व्यवस्था मंदिर की दार्शनिक विविधता का प्रतीक है.

राम मंदिर परिसर के अंदर एक प्राचीन निर्माण शैली में एक कुंड (पुष्करणी) का निर्माण किया गया है.
