सर्वेक्षण: युवाओं का गुस्सा और उम्मीद |पढ़ें: युवा सर्वेक्षण

भारत का युवा देश के राजनैतिक तबके से नाराज है. अण्णा हजारे के आंदोलन से उस गुस्से की झ्लक दिखी थी. अब वैश्विक बाजार अनुसंधान एजेंसी साइनोवेट द्वारा 18 से 25 साल के बीच के 2,500 भारतीयों पर किया गया इंडिया टुडे विशेष जनमत सर्वेक्षण युवाओं में राजनीतिक विरोधी मानस की पुष्टि करता है.


उनके सामने जब टीम अण्णा के जाने-माने सदस्यों और प्रमुख राजनीतिकों के बीच तीन परिकल्पित चुनावी मुकाबलों का विकल्प रखा गया तो जनादेश बिल्कुल साफ दिखा.

लेकिन यह नाराजगी सिर्फ कांग्रेस से ही नहीं है. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येद्दियुरप्पा और पूर्व लोकायुक्त एन. संतोष हेगड़े में किसी एक को चुनना हो तो हेगड़े को येद्दियुरप्पा के 22 के मुकाबले 78 प्रतिशत वोट मिलेंगे.

कांग्रेस को सबसे अधिक भ्रष्ट राजनैतिक पार्टी आंका गया है, लेकिन दूसरे नंबर पर मुख्य विपह्नी पार्टी भाजपा बहुत पीछे नहीं है, जिसे बसपा या द्रमुक से भी ज्यादा भ्रष्ट माना गया है.


उत्तर देने वालों में से 86 फीसदी ने कहा कि वे अगले आम चुनाव में मतदान करेंगे. अण्णा के आंदोलन ने भारत के लोकतंत्र को किसी तरह नुक्सान नहीं पहुंचाया है बल्कि इसके बजाए जनता में पारंपरिक रूप से भावशून्य वर्ग को राजनीति की मुख्यधारा से जोड़कर दरअसल उसे मजबूत ही बनाया है.

भारत के युवा राजनैतिक और आर्थिक दोनों ही मामलों में मायने रखते हैं. भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है, जहां 65 फीसदी आबादी की उम्र 35 साल से कम है.


युवाओं के विचार भारत के भविष्य की झ्लक देते हैं. ये विचार अक्सर स्पष्ट रूप से विरोधाभासी हैं. उसी तरह, जैसे इंडिया टुडे-साइनोवेट जनमत सर्वेक्षण में सरकार और राजनीति को लेकर गहरी निराशा के साथ ही उनमें अपने जीवन एवं संपन्नता के बारे में जबरदस्त आशावाद का अनोखा मिश्रण दिखता है.

यह नौजवानों में किसी तरह की खामी नहीं है बल्कि उनकी सबसे बड़ी संपत्ति हैः व्यवस्थित सोच वाले दिमाग विभिन्न विचारों के प्रति खुले हैं.

उत्तर देने वालों में से 84 फीसदी युवाओं का मानना है कि वे शिक्षा, आजादी, आमदनी और जीवन शैली के मायनों में उससे बेहतर जिंदगी बसर करेंगे, जैसी उनके माता-पिता व्यतीत कर चुके हैं. 81 फीसदी का मानना है कि सरकार के बावजूद वे आज के मुकाबले भविष्य में ज्यादा सुखी होंगे.

उत्तरदाताओं में से खासे यानी 80 फीसदी का कहना है कि अगर उन्हें अमेरिका और भारत में वैसी ही नौकरी की पेशकश की जाए तो वे भारत में ही काम करना पसंद करेंगे. इस स्पष्ट विरोधाभास को समझ्ना मुश्किल नहीं है.

महानगरों और बड़े शहरों में जिन युवाओं को सर्वेक्षण में शामिल किया गया, उनमें से ज्यादातर अब अपनी संपन्नता के लिए सरकार पर निर्भर नहीं हैं.



लेकिन खासकर महानगर के बाहर के युवाओं में सरकारी नौकरी में जाने की इच्छा बरकरार है. मिसाल के तौर पर, पटना के 74 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि सरकारी नौकरी उनकी पहली पसंद है.


दिल्ली, मुंबई और चेन्नै में, जहां अवसर ज्यादा हैं, सरकारी क्षेत्र से बाहर नौकरी की पसंद बहुत ज्यादा है. एक बात तो स्पष्ट है कि युवा भारत ने अपने कॅरिअर पर ध्यान केंद्रित कर रखा है.


भारतीय युवाओं के सामाजिक रुख ने उनके राजनैतिक-आर्थिक नजरिए से कहीं ज्यादा दिलचस्प विरोधाभास पेश किए. उनमें नव-उदारवाद और पुराने रूढ़िवाद का स्पष्ट मिश्रण दिखता है. पांच महानगरों और द्वितीय श्रेणी के 5 शहरों के जवाबों में बिल्कुल स्पष्ट अंतर दिखता है.
सेक्स के प्रति विभिन्न जगहों पर उदार रुख है. 68 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि वे यौन रूप से सक्रिय हैं. लेकिन केवल 15 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि वे संसर्ग कर चुके हैं. ज्यादातर युवा चुंबन और स्पर्श को सेक्स के दर्जे में रखते हैं.
