मोदी 3.0 : तस्वीरों से जानिए, केंद्र सरकार में पहली बार कैबिनेट मंत्री बने इन आठ नेताओं की कहानी

रविवार, 9 जून को नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार और स्वतंत्र भारत के 20वें प्रधानमंत्री के तौर पर पद की शपथ ली. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मोदी के अलावा 71 और मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई. एनडीए की अगुआई वाली इस सरकार में 30 कैबिनेट मंत्री, पांच राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और 36 नेताओं ने राज्य मंत्री की शपथ ली है. कैबिनेट मंत्रियों की सूची में आठ नए चेहरों को जगह मिली है. हालांकि इनमें से कुछ का राजनीति से काफी पुराना नाता रहा है. तो आइए इन आठ नए कैबिनेट मंत्रियों के बारे में जानते हैं.

1. शिवराज सिंह चौहान, 65 वर्ष
चार बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाल चुके शिवराज राज्य के लोगों में "मामा" के नाम से प्रसिद्ध हैं. अपने तीन दशक से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन में वे पहली बार केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बने हैं. मोदी 3.0 सरकार में शिवराज को कृषि और किसान कल्याण मंत्री और ग्रामीण विकास मंत्री का मंत्रालय सौंपा गया है. आपातकाल के दौरान उन्होंने एक छात्र नेता के तौर पर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी. वे पहली बार 1990 में बुधनी निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा के लिए चुने गए. इसके अगले ही साल पहली बार विदिशा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने गए. 2024 के आम चुनाव को मिलाकर वे कुल छह बार सांसद बन चुके हैं. हालिया लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने कड़ी मेहनत की. उन्होंने राज्य में भाजपा के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार किया. नतीजतन भाजपा छिंदवाड़ा समेत राज्य की सभी 29 लोकसभा सीटें तो जीती ही, शिवराज ने भी विदिशा लोकसभा सीट पर 8.21 लाख मतों के रिकॉर्ड अंतर से जीत दर्ज की है. इस आम चुनाव से पहले मध्य प्रदेश में एक रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने शिवराज की जमकर तारीफ की थी. पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा था, "हमारे भाई शिवराज जी विदिशा से उम्मीदवार हैं. हम दोनों संगठन में साथ काम करते थे. हम दोनों मुख्यमंत्री थे. शिवराज जब संसद गए तो हम पार्टी के महासचिव के रूप में साथ काम कर रहे थे. अब मैं उन्हें एक बार फिर अपने साथ दिल्ली ले जाना चाहता हूं."

2. मनोहर लाल खट्टर, 70
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री रहे खट्टर 2014 में पहली बार करनाल से विधायक बने और उसी साल उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री पद भी मिल गया. वे बीते दस सालों से राज्य के मुख्यमंत्री थे. लेकिन भाजपा ने इस बार लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाकर करनाल से लोकसभा चुनाव लड़वाया और उन्होंने दो लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की. दिलचस्प बात है कि पहली बार सांसद बनने के बाद उन्हें अब कैबिनेट में भी जगह मिली है. इस बार की मोदी सरकार में खट्टर को आवास और शहरी मामलों के मंत्री और बिजली मंत्री का दायित्व सौंपा गया है. हालांकि खट्टर की पहचान एक राजनेता के तौर पर कम और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक के तौर पर ज्यादा रही है. वे 1977 में संघ में शामिल हुए थे और सिर्फ तीन सालों बाद ही संगठन के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए. संघ के पूर्ण कालिक प्रचारक होने की वजह से उन्होंने शादी नहीं की. साल 1994 में भाजपा ज्वाइन करने से पहले खट्टर ने 14 सालों तक आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में काम किया. 2000-2014 के दौरान, खट्टर हरियाणा में भाजपा के संगठन महासचिव पर थे. वे 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा की हरियाणा चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष भी बने थे, जिसके बाद उन्हें पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का सदस्य भी चुना गया था.

3. एचडी कुमारस्वामी, 64
पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के बेटे और कर्नाटक के दो बार मुख्यमंत्री रहे कुमारस्वामी ने 1996 में राजनीति में कदम रखा था और इसी साल 11वीं लोकसभा के लिए वे पहली बार कनकपुरा सीट से चुनकर संसद पहुंचे. हालांकि केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के तौर पर कभी शपथ नहीं ले पाए थे. इस बार उनके सामने कांग्रेस के वेंकटरामणे गौड़ा (स्टार चंद्रू) की चुनौती थी. कुमारस्वामी ने गौड़ा को पौने तीन लाख मतों के भारी अंतर से मात दी. कुमारस्वामी की पार्टी जनता दल (एस) या जेडीएस एनडीए के सहयोगी दलों में से है, और इस बार उन्हें पहली बार कैबिनेट में जगह मिली है. उन्हें भारी उद्योग मंत्री और इस्पात मंत्री का मंत्रालय सौंपा गया है. कुमारस्वामी ने फरवरी 2006 से अक्टूबर 2007 तक राज्य के मुख्यमंत्री (कर्नाटक के 18वें मुख्यमंत्री) के रूप में कार्य किया. 2018 में भी उनकी पार्टी जेडीएस किंगमेकर बनकर उभरी थी. कुल 37 सीटें जीतने के बावजूद एचडी कुमारस्वामी को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाया गया था और कांग्रेस ने सरकार का समर्थन किया था. हालांकि यह सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकी थी. कुमारस्वामी चन्नापटना से कर्नाटक विधानसभा के सदस्य भी हैं. कैबिनेट मंत्री बनने के बाद उन्हें विधानसभा से इस्तीफा देना होगा.

4. जीतनराम मांझी, 79
1991, 2014 और 2019 में सांसदी के लिए हाथ आजमाने वाले और हर बार हार का मुंह देखने वाले हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के संरक्षक जीतनराम मांझी को इस बार के आम चुनाव में सफलता मिली है. इस बार उन्होंने बिहार के गया लोकसभा क्षेत्र से राष्ट्रीय जनता दल के कुमार सर्वजीत को 1,01,812 वोटों के अंतर से हराया है. इस तरह मांझी न सिर्फ पहली बार सांसदी का चुनाव जीते, बल्कि एनडीए-3 सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया है. उन्हें महत्वपूर्ण सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री बनाया गया है. मांझी को भी बिहार की राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है. अपने 44 साल के राजनीतिक करियर में उनका लगभग सभी दलों के साथ जुड़ाव रहा है. इनमें जनता दल, आरजेडी, जेडीयू और भाजपा जैसे दल शामिल हैं. इसी तरह अपने सियासी करियर को उड़ान देते हुए उन्होंने साल 2014 में बिहार के 23 वें मुख्यमंत्री के पद को संभाला था. वह बिहार में दलित समुदाय के तीसरे मुख्यमंत्री थे. मांझी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस के साथ की. कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने कई बार पार्टियां बदलीं. इस तरह साल 1980 में गया की बाराचट्टी विधानसभा सीट से विधायक चुनकर पहली बार विधानसभा पहुंचे. फिर साल 1990, 1996 और 2005 में भी विधानसभा चुनाव जीते. उन्होंने इस बीच उपमंत्री और राज्यमंत्री के पद भी संभाले. साल 2008 में वे राज्य कैबिनेट मंत्री बने और फिर साल 2014 में मुख्यमंत्री के पद को संभाला. लेकिन नीतीश कुमार से संबंधों में खटास आ जाने के कारण उन्हें पार्टी से बाहर होना पड़ा और मुख्यमंत्री पद गंवा दिया. इसी के बाद उन्होंने नीतीश से अलग होकर बिहार में हम की स्थापना की थी.

5. राजीव रंजन सिंह, 69
जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) कोटे से एनडीए-3 सरकार में राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह भी पहली बार कैबिनेट मंत्री पद की शपथ ले रहे हैं. ललन सिंह को पंचायती राज मंत्री तथा मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया है. इस बार के आम चुनाव में उन्होंने बिहार की मुंगेर लोकसभा सीट पर राजद की कुमारी अनिता को 80,870 वोटों के अंतर से हराया. वे चौथी बार संसद पहुंचे हैं. जेपी आंदोलन (1974) के प्रोडक्ट रहे ललन सिंह ने समाजवादी नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के साथ रह कर राजनीति की बारीकियां सीखी. ललन सिंह भारत की 15वीं लोकसभा के सदस्य थे और बिहार के मुंगेर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे. 17वीं लोकसभा (2019) में उन्होंने तीसरी बार सांसद के रूप में मुंगेर का प्रतिनिधित्व किया. 2014 से 2019 के बीच वे बिहार सरकार में मंत्री रहे. ललन सिंह अप्रैल 2000 से 2004 तक राज्य सभा सांसद भी रह चुके हैं. 2014 में अपनी लोकसभा सीट हारने के बाद उन्हें बिहार विधान परिषद के सदस्य के रूप में चुना गया था. जेडीयू का भूमिहार चेहरा ललन सिंह नीतीश कुमार के सबसे करीबी लोगों में शामिल हैं. वे नीतीश के सहपाठी भी रह चुके हैं. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ चारा घोटाला मामले में पटना हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले लोगों में ललन सिंह का भी नाम शामिल है. 2010 में उन पर पार्टी फंड का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा जिसके चलते उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी. हालांकि बाद में नीतीश के साथ उनकी सुलह हो गई और वे विधान परिषद के सदस्य बने और मंत्रिपरिषद में शामिल हुए.

6. चिराग पासवान, 42
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और दिवंगत रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने पारंपरिक हाजीपुर लोकसभा सीट से 1 लाख सत्तर हजार से अधिक मतों से जीत हासिल की है. उन्होंने राजद के शिवचंद्र राम को हराया. उनकी पार्टी ने इस बार बिहार में पांच लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी पर जीत हासिल की. इस तरह चिराग की अहमियत को देखते हुए उन्हें पहली बार मोदी कैबिनेट 3.0 में जगह मिली है. चिराग को उनके पिता और चाचा की तरह ही खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री बनाया गया है. फिल्मों में करियर को गति पाता न देखकर चिराग ने राजनीति में कदम रखा और 2014 में अपना पहला आम चुनाव बिहार के जमुई से लड़ा था. तब उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी सुधांशु भास्कर को 85 हजार से अधिक मतों से हराया था. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भूदेव चौधरी को हराया. इसी साल वे अपने पिता द्वारा स्थापित लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. लेकिन 2021 में पार्टी में दो फाड़ हो गया. उनके चाचा चाचा और हाजीपुर के सांसद पशुपति पारस गुट के अलग होने के बाद उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का गठन किया और इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. चिराग के बॉलीवुड करियर की बात करें तो उनकी फिल्म 'मिले ना मिले हम' साल 2011 में रिलीज हुई थी. इसमें उन्होंने कंगना रनौत के साथ काम किया था. कंगना भी इसी साल हिमाचल प्रदेश के मंडी से निर्वाचित होकर संसद पहुंची हैं.

7. राम मोहन नायडू, 36
मोदी मंत्रिमंडल में इस समय सबसे चर्चित नामों में से एक तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के सांसद राम मोहन नायडू किंजरापु का है. वे महज 36 साल की उम्र में कैबिनेट मंत्री बने हैं. मोदी सरकार 3.0 में नायडू को नागरिक उड्डयन मंत्री का दायित्व मिला है. राम मोहन 2014 से ही संसद में टीडीपी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. वे चंद्रबाबू नायडू के बेहद करीबी और खास माने जाते हैं. राम मोहन नायडू को राजनीति विरासत में मिली है. उनके पिता येरन नायडू भी टीडीपी के बड़े नेताओं में शुमार रहे हैं. पिता की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद राम मोहन नायडू ने राजनीति में कदम रखा था. वे शायद कभी राजनीति में नहीं आते. दिल्ली में शुरुआती पढ़ाई करने के बाद नायडू हायर स्टडी के लिए अमेरिका चले गए थे. यहां उन्होंने इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. फिर एमबीए किया और इसके बाद सिंगापुर चले गए. यहां वह अपना करियर बनाने में जुटे ही थे कि सिर से पिता का साया उठ गया. 18 दिसंबर, 1987 को जन्मे नायडू तब सिर्फ 24 साल के थे. इसके बाद राम मोहन नायडू ने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए 2014 में राजनीति में उतरे और 26 साल की उम्र में श्रीकाकुलम से पहली बार सांसद चुने गए. भ्रष्टाचार के आरोपों में जब चंद्रबाबू नायडू की गिरफ्तारी हुई, तो उस मुश्किल दौर में राम मोहन नायडू ने दिल्ली में टीडीपी चीफ के बेटे नारा लोकेश के साथ काफी काम किया था. राम मोहन करीब 9 साल से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थे, ऐसे में नारा लोकेश के साथ मिलकर उन्होंने चंद्रबाबू नायडू की गिरफ्तारी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाई. चंद्रबाबू जब भी दिल्ली आते हैं, तो उनके साथ राम मोहन नायडू नजर आते हैं. राम मोहन नायडू 2020 में संसद रत्न पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं. इसके अलावा वे संसद की कई समितियों के भी सदस्य रह चुके हैं.

8. सीआर पाटिल, 69
इस बार गुजरात से दो नए चेहरे मोदी कैबिनेट में शामिल हुए हैं. इनमें से एक सीआर पाटिल हैं जो गुजरात भाजपा के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष हैं. मोदी सरकार में उन्हें जल शक्ति मंत्री बनाया गया है. पाटिल का अध्यक्ष पद का कार्यकाल साल 2023 में खत्म हो चुका था, लेकिन लोकसभा चुनाव तक उनका कार्यकाल बढ़ाया गया. लगातार चौथी बार वे नवसारी लोकसभा से चुनाव जीतकर आए हैं. उन्होंने कांग्रेस के नौशादभाई भूपतभाई देसाई को साढ़े सात लाख से ज्यादा मतों के अंतर से हराया है. पाटिल 1989 में भाजपा में शामिल हुए थे और सूरत शहर के खजांची के तौर पर काम करना शुरू कर दिया. इसके बाद वे सूरत शहर के भाजपा उपाध्यक्ष भी बने. कार्यकर्ताओं और जनता से आसानी से मिलने वाले जमीनी नेताओं में सीआर पाटिल की गिनती होती है. साल 2020 में वे गुजरात के पहले गैर-गुजराती भाजपा अध्यक्ष बने. उनके प्रदेश अध्यक्ष कार्यकाल में गुजरात में भाजपा लगातार मजबूत होती गई. इसकी वजह से साल 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अब तक की सबसे ज्यादा 156 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी.
