अमीन सायानी की होने वाली पत्नी ने पहली दफा उनकी आवाज सुनते ही रेडियो बंद करा दिया था!

चार दशक से भी ज्यादा समय तक जिसकी आवाज से रेडियो की दुनिया गुलजार होती रही, बीते 21 फरवरी को वह आवाज थम गई. अपने 'बिनाका गीतमाला' कार्यक्रम से घर-घर नेह जोड़ लेने वाले मशहूर रेडियो प्रेजेंटर अमीन सायानी की मुंबई में हार्ट अटैक से हुई मौत के बाद लोग उन्हें याद कर रहे हैं. अपने अलहदा अंदाज-ए-बयां और आवाज से वे करीब 42 सालों तक 'वॉइस ऑफ रेडियो' बने रहे. लेकिन एक ऐसा समय भी था जब उन्हें ऑल इंडिया रेडियो ने हिन्दी प्रेजेंटर के रूप में खारिज कर दिया था.

सायानी का जन्म 1932 में मुंबई में हुआ था. उनकी मां कुलसुम सायानी और पिता डॉक्टर जान मोहम्मद सायानी दोनों स्वतंत्रता सेनानी थे. गांधी जी के कहने पर कुलसुम ने हिंदुस्तानी लहजे में एक अखबार निकालना शुरू किया, जिसका नाम था-रहबर. टीनएज से ही सायानी इसमें अपनी मां की मदद किया करते थे. इनके बड़े भाई हामिद सायानी खुद उस समय के एक जाने-माने प्रस्तोता थे. उन्होंने ही सायानी को ब्रॉडकास्टिंग की दुनिया से रू-ब-रू कराया. कुछ ही समय में उन्होंने एक अच्छे अंग्रेजी प्रेजेंटर के रूप में छवि बना ली.

शायद 'रहबर' का प्रभाव रहा हो या और कुछ. एक दिन सायानी मुंबई के ऑल इंडिया रेडियो के हिन्दी सेक्शन में पहुंच गए, और वहां उन्होंने हिन्दी प्रेजेंटर के रूप में ऑडिशन के लिए गुजारिश की. उन्होंने कहा, "आप मुझे सालों से एक अंग्रेजी प्रेजेंटर के रूप में जानते रहे हैं. लेकिन अब जब भारत आजाद हो गया है तो मैं हिन्दी सेक्शन में काम करना चाहता हूं. कृपया मेरा ऑडिशन ले लीजिए." एआईआर ने इसे खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया. हालांकि चीजें सायानी के पक्ष में नहीं गईं.

बकौल सायानी, "मैंने बड़े आत्मविश्वास के साथ अपनी स्क्रिप्ट पढ़ी. पर उनका जवाब था, 'आपने अच्छा पढ़ा, अमीन. लेकिन आपके उच्चारण में अंग्रेजी और गुजराती बोलियों का आभास हो रहा है. इसलिए आपका आवेदन अस्वीकार किया जाता है. सॉरी!'...ये सुनकर मेरा दिल बैठ गया था." हालांकि सायानी ने हार नहीं मानी. उन्होंने अगले कुछ दिनों तक अपने उच्चारण पर काम किया और कुछ महीनों बाद उन्हें वही जॉब मिल गई. हालांकि 1951 में एआईआर ज्वॉइन करने के बाद उनकी आवाज की टोन थोड़ी लाउड ही थी. एक किस्सा है कि जब वॉइस आर्टिस्ट और सिंगर रमा मट्टू ने उनकी आवाज पहली दफा रेडियो पर सुनी तो उन्होंने अपने भाई से रेडियो बंद कर देने के लिए कहा था. मजेदार बात यह है कि अगले कुछ सालों में मट्टू सायानी की पत्नी बन गईं. (रेडियो सीलोन के एक कार्यक्रम में अभिनेत्री नंदा के साथ अमीन सायानी/फोटो-एक्स)

बहरहाल, सायानी को जल्द ही यह एहसास हो गया कि अगर उन्हें घर-घर अपनी धाक जमानी है तो अपने अंदाज-ए-बयां पर काम करना होगा. उन्होंने लोगों से बात करने के लिए सामान्य 'बोल-चाल की भाषा' का प्रयोग करने का फैसला किया. जैसे कि वे लोगों के दोस्त हैं जो चाय पर उनके साथ फिल्मों और गीतों पर चर्चा कर रहा हो. यह आइडिया चल निकला. दिसंबर, 1951 में शुरू हुआ आधे घंटे का प्रोग्राम 1952 तक जबर्दस्त हिट हो गया. तभी तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री रहे बीवी केस्कर ने 'राष्ट्रीय संस्कृति' के नाम पर एआईआर को नाथने का काम किया. उन्होंने फिल्म संगीत को 'कामुक और अश्लील' बताते हुए इस पर बैन लगा दिया और केवल शास्त्रीय संगीत को प्रसारित होने की अनुमति दी. (अमीन सायानी/फोटो-वीकिमीडिया कॉमंस)

उस समय कोलंबो से प्रसारित होने वाला रेडियो सीलोन का कार्यक्रम 'हिट परेड' भारत में भी खूब सुना जाता था. हालांकि यह एक अंग्रेजी कार्यक्रम था, जिसमें लोकप्रिय अंग्रेजी गाने बतौर काउंटडाउन बजते थे. उस समय रेडियो सीलोन के व्यावसायिक मामलों के निदेशक हुआ करते थे-क्लिफॉर्ड डॉड. उनके पास लोगों के लगातार खत आ रहे थे कि हिट परेड की ही तर्ज पर हिन्दी फिल्मी संगीत कार्यक्रम भी शुरू किया जाए. डॉड ने सायानी से संपर्क किया. सायानी ने रेडियो सीलोन पर बिनाका गीतमाला शो को होस्ट करना शुरू कर दिया. शो काफी लोकप्रिय रहा. 1970 में वे ऑल इंडिया रेडियो पर प्रायोजित कार्यक्रम के साथ लौटे. इस दौरान उन्होंने लता मंगेशकर, राज कपूर समेत भारतीय सिने जगत् के कई दिग्गजों का इंटरव्यू लिया. वे सही मायनों में 'वॉइस ऑफ रेडियो' थे. भले ही वे सुखन-वर नहीं थे पर ग़ालिब के शब्दों में कहें तो उनका अंदाजे-बयां कुछ और ही था. (अमीन सायानी/फोटो-एक्स)
