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MSP के दांव से किसानों को कितना साध पाएगी योगी सरकार

MSP बढ़ोतरी, रिकॉर्ड खरीद और तेज भुगतान के दावों के बीच असली सवाल है कि क्या योगी आदित्यनाथ सरकार की रणनीति हर किसान तक असली लाभ पहुंचा पा रही है?

India isn't ship-to-mouth anymore: Ashok Gulati says time’s up for MSP
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 24 मार्च , 2026

उत्तर प्रदेश में किसानों को लेकर राजनीति और नीतियों का केंद्र बिंदु लंबे समय से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) रहा है. योगी आदित्यनाथ सरकार ने हाल के फैसलों में जिस तरह गेहूं, गन्ना और ‘श्रीअन्न’ (मिलेट्स) पर फोकस बढ़ाया है, उससे साफ संकेत मिलता है कि 2026-27 के रबी विपणन वर्ष और उससे आगे की रणनीति में MSP एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक औजार बन चुका है. 

सवाल यह है कि क्या यह रणनीति जमीन पर किसानों को वास्तव में राहत दे रही है या अभी भी कई परतों में चुनौतियां मौजूद हैं. सबसे पहले गेहूं की बात करें तो इस बार सरकार ने 23 मार्च को MSP में 160 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर इसे 2585 रुपए कर दिया है. खरीद अवधि 30 मार्च से 15 जून तक तय की गई है और 50 लाख टन खरीद का लक्ष्य रखा गया है. 

यह लक्ष्य पिछले प्रस्तावित 30 लाख टन से काफी अधिक है, जिसे मुख्यमंत्री के निर्देश पर बढ़ाया गया. 6500 क्रय केंद्रों की स्थापना और 48 घंटे के भीतर डीबीटी के जरिए भुगतान का वादा सरकार की मंशा को स्पष्ट करता है कि वह किसानों के बीच भरोसा मजबूत करना चाहती है. बाराबंकी के किसान रामनरेश यादव बताते हैं, “MSP बढ़ने से कागज पर तो फायदा दिखता है, लेकिन असली फर्क तब पड़ता है जब समय पर खरीद हो, बिचौलिएं इससे दूर रहें और पैसा सीधे खाते में आए. अगर 48 घंटे में भुगतान होता है, तो यह बड़ा बदलाव होगा.” उनके जैसे कई किसान इस बार की व्यवस्था को लेकर आशावादी हैं लेकिन सतर्क भी हैं.

सरकार ने बिचौलियों की भूमिका कम करने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण अनिवार्य किया है. अब तक करीब दो लाख किसानों का पंजीकरण हो चुका है. खाद्य एवं रसद विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “हमने पूरी प्रक्रिया को डिजिटल किया है ताकि पारदर्शिता बनी रहे. पिछले वर्षों में जो शिकायतें थीं, उन्हें कम करने की कोशिश है.” हालांकि जमीनी हकीकत इतनी सरल नहीं है. लखनऊ के कृषि अर्थशास्त्री प्रो. एस.के. तिवारी कहते हैं, “MSP बढ़ाना जरूरी है, लेकिन खरीद की क्षमता उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है.अगर लक्ष्य पूरा नहीं हुआ या केंद्रों पर भीड़ और देरी हुई, तो किसान फिर से खुले बाजार की ओर लौटेंगे, जहां उन्हें अक्सर कम कीमत मिलती है.”

कितना ‘मिठास’ देगा गन्ना 

गन्ना किसानों के लिए भी सरकार ने बड़ा दांव खेला है. पिछले वर्ष अक्टूबर में पेराई सत्र 2025-26 के लिए 30 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी करते हुए अगेती गन्ना का मूल्य 400 रुपए और सामान्य प्रजाति का 390 रुपए तय किया गया. सरकार का दावा है कि इससे किसानों को करीब 3000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त लाभ होगा. किसानों को आठ साल में 2.9 लाख करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान होने का आंकड़ा भी लगातार प्रचार में है. बागपत के गन्ना किसान जितेंद्र मलिक का कहना है, “रेट बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन असली दिक्कत भुगतान में देरी है. कई बार मिलों से पैसा महीनों तक अटका रहता है. अगर सरकार इस पर सख्ती करे तो फायदा ज्यादा दिखेगा.” 

यह बयान उस बड़ी चुनौती की ओर इशारा करता है, जहां MSP घोषित होने के बावजूद भुगतान चक्र पूरी तरह से सुचारू नहीं रहता. गन्ना विभाग के एक अधिकारी का कहना है, “सरकार मिलों पर लगातार दबाव बना रही है. पिछले कुछ वर्षों में भुगतान की स्थिति में बहुत सुधार हुआ है, लेकिन इसे पूरी तरह समयबद्ध बनाना अभी भी चुनौती है.”

'श्रीअन्न' की खरीद में बढ़ोतरी 

MSP की राजनीति का तीसरा बड़ा स्तंभ ‘श्रीअन्न’ यानी मिलेट्स है. बाजरा, ज्वार और मक्का की खरीद  में इस साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है. बाजरा की खरीद दोगुनी होकर 2.13 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा पहुंच गई, जबकि ज्वार और मक्का में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई. सरकार ने इन फसलों के लिए आकर्षक MSP तय किया, जैसे ज्वार के लिए 3749 रुपए प्रति क्विंटल और बाजरा के लिए 2775 रुपए प्रति क्विंटल. कानपुर देहात के किसान शिवपाल सिंह बताते हैं, “पहले हम बाजरा कम उगाते थे क्योंकि बाजार में दाम नहीं मिलता था. अब सरकारी खरीद और अच्छा MSP मिलने से रुझान बढ़ा है.” 

कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि मिलेट्स पर फोकस केवल आय बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि जलवायु और पोषण दोनों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है. कृषि वैज्ञानिक डॉ. मनीषा वर्मा कहती हैं, “मिलेट्स कम पानी में उगते हैं और पोषण से भरपूर होते हैं. अगर सरकार लगातार बेहतर MSP और खरीद सुनिश्चित करे, तो यह दीर्घकालिक कृषि सुधार का आधार बन सकता है.”

चुनौतियां भी कम नहीं 

इसके बावजूद चुनौतियां कम नहीं हैं. सबसे बड़ी समस्या खरीद व्यवस्था की असमानता है. कई जिलों में क्रय केंद्र पर्याप्त नहीं हैं या उनकी दूरी अधिक है, जिससे छोटे किसानों के लिए वहां तक पहुंचना मुश्किल होता है. इसके अलावा गुणवत्ता मानकों को लेकर भी अक्सर विवाद होते हैं, जहां किसानों का गेहूं या अन्य फसलें ‘मानक के अनुरूप नहीं’ बताकर लौटा दी जाती हैं. हरदोई के किसान मुकेश कुमार कहते हैं, “केंद्र पर गेहूं ले जाने के बाद अगर कहा जाए कि नमी ज्यादा है या दाना छोटा है, तो हमें वापस ले जाना पड़ता है. इससे समय और लागत दोनों बढ़ती है.” यह समस्या बताती है कि MSP का लाभ तभी व्यापक होगा, जब खरीद प्रक्रिया किसान-हितैषी हो. दूसरी बड़ी चुनौती लॉजिस्टिक्स की है. 

पिछले सीजन में जूट के बोरों की कमी से धान और चावल की आपूर्ति प्रभावित हुई थी. इस बार सरकार ने 87 हजार गांठ जूट बोरे खरीदने के लिए अतिरिक्त वित्तीय स्वीकृति दी है, लेकिन यह समस्या बताती है कि सप्लाई चेन में छोटी चूक भी पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकती है. नीति विश्लेषक अजय श्रीवास्तव कहते हैं, “MSP सिर्फ घोषणा नहीं है, यह एक पूरी प्रणाली है जिसमें खरीद, भंडारण, परिवहन और भुगतान सब शामिल हैं. अगर इनमें से किसी एक कड़ी में कमजोरी है, तो पूरी योजना का असर कम हो जाता है.”

किसान राजनीति पर बढ़ रहा प्रभाव 

उत्तर प्रदेश में MSP का दायरा बढ़ा जरूर है, लेकिन इसका लाभ अभी-भी सीमित किसानों तक ही पहुंचता है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, धान जैसे प्रमुख फसलों में यूपी के केवल करीब एक चौथाई से भी कम किसान ही सरकारी खरीद से सीधे लाभान्वित हो पाते हैं. कुल मिलाकर देश में भी 10 फीसद से कम किसान ही प्रभावी रूप से MSP का फायदा ले पाते हैं. 

जातिगत रूप से देखें तो लाभार्थियों में ओबीसी किसानों की हिस्सेदारी सबसे अधिक, करीब 40 फीसद से ज्यादा है, जबकि सामान्य वर्ग करीब 36 फीसद, एससी लगभग 12 फीसद और एसटी करीब 10 फीसद के आसपास हैं. यही कारण है कि MSP अब सीधे तौर पर ओबीसी और छोटे किसानों की राजनीति से जुड़ गया है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां किसान वोट निर्णायक हैं, MSP नीतियां सामाजिक समीकरण साधने और ग्रामीण समर्थन मजबूत करने का अहम औजार बन चुकी हैं. इसीलिए योगी सरकार लगातार यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि उसने पिछली सरकारों की तुलना में अधिक भुगतान किया और अधिक समर्थन दिया. 

लेकिन विपक्ष का तर्क है कि केवल आंकड़ों से तस्वीर पूरी नहीं होती. उनका कहना है कि किसानों की लागत तेजी से बढ़ रही है, जिसमें डीजल, खाद और मजदूरी शामिल है. ऐसे में MSP बढ़ोतरी का वास्तविक लाभ सीमित रह जाता है. कृषि अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि MSP का फायदा मुख्य रूप से उन किसानों को मिलता है, जो सरकारी खरीद प्रणाली तक पहुंच बना पाते हैं. छोटे और सीमांत किसानों का बड़ा हिस्सा अभी भी खुले बाजार पर निर्भर है, जहां उन्हें MSP से कम कीमत मिलती है. 

यह कहा जा सकता है कि MSP के जरिए किसानों को लुभाने की रणनीति आंशिक रूप से सफल दिख रही है, खासकर वहां जहां सरकारी खरीद प्रभावी है. लेकिन व्यापक सफलता के लिए सरकार को उन बुनियादी चुनौतियों पर काम करना होगा, जो अभी भी खेत से लेकर खरीद केंद्र तक के सफर को कठिन बनाती हैं. 

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