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योगी कैबिनेट विस्तार के साथ ही बिछ गई 2027 की बिसात

योगी कैबिनेट विस्तार में OBC, दलित और ब्राह्मण चेहरों को प्रमुखता देकर BJP ने 2027 चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के PDA सामाजिक समीकरण को चुनौती देने की रणनीति दिखाई

UP Cabinet
योगी आदित्यनाथ ने मंत्रिमंडल विस्तार में OBC पर बड़ा दांव लगाया है
अपडेटेड 10 मई , 2026

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 10 मई का योगी मंत्रिमंडल विस्तार केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव की दिशा तय करने वाला एक बड़ा राजनीतिक संदेश है. छह नए मंत्रियों को शामिल करने और दो राज्य मंत्रियों को प्रमोशन देने के जरिए BJP ने साफ संकेत दिया है कि वह समाजवादी पार्टी के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ के नैरेटिव को उसी सामाजिक जमीन पर चुनौती देने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है. 

यह विस्तार ऐसे समय हुआ है जब लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने BJP को यह अहसास कराया कि उत्तर प्रदेश में केवल हिंदुत्व और मोदी फैक्टर के भरोसे चुनावी बढ़त कायम रखना आसान नहीं होगा. समाजवादी पार्टी ने PDA अभियान के जरिए गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और मुस्लिम वोटों को जोड़ने की जो कोशिश शुरू की, उसने BJP को अपने सामाजिक समीकरणों की दोबारा समीक्षा करने के लिए मजबूर किया. योगी सरकार का यह विस्तार उसी समीक्षा का राजनीतिक जवाब माना जा रहा है.

OBC पर सबसे बड़ा दांव

नए मंत्रियों में तीन चेहरे सीधे तौर पर OBC राजनीति को साधने वाले हैं. हंसराज विश्वकर्मा, कैलाश सिंह राजपूत और भूपेंद्र चौधरी अलग-अलग सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं. BJP जानती है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में गैर-यादव पिछड़ा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है. वर्ष 2014 से 2022 तक BJP की सबसे बड़ी ताकत यही सामाजिक गठबंधन रहा, लेकिन लोकसभा चुनाव में इसके कुछ हिस्सों में असंतोष दिखाई दिया. 

हंसराज विश्वकर्मा का चयन इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. वाराणसी के मजबूत संगठनात्मक नेता होने के साथ-साथ वे विश्वकर्मा समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं. हाल के महीनों में इस समुदाय को लेकर विपक्ष ने BJP पर उपेक्षा के आरोप लगाए थे. गाजीपुर में विश्वकर्मा समाज की युवती की कथित हत्या के बाद समाजवादी पार्टी ने इस समाज के लोगों के बीच सवर्ण अत्याचार का मुद्दा बनाया था. ऐसे समय में विश्वकर्मा को मंत्री बनाकर BJP ने यह संदेश देने की कोशिश की कि गैर-यादव OBC अब भी उसके राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में हैं. 

इसी तरह कैलाश सिंह राजपूत का चयन केवल कन्नौज की राजनीति तक सीमित नहीं है. वे लोध समुदाय से आते हैं, जो कभी कल्याण सिंह के दौर में BJP का मजबूत आधार माना जाता था. कन्नौज जैसे इलाके में, जहां अखिलेश यादव का प्रभाव मजबूत है, वहां से लोध चेहरे को आगे बढ़ाना समाजवादी पार्टी के प्रभाव क्षेत्र में सेंध लगाने की कोशिश माना जा रहा है. 

भूपेंद्र चौधरी का मंत्रिमंडल में लौटना भी सिर्फ संगठनात्मक सम्मान नहीं है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट राजनीति का अपना महत्व है. किसान आंदोलन के बाद BJP और जाट वोटरों के रिश्तों में जो दूरी आई थी, उसे कम करने के लिए पार्टी लगातार प्रयास कर रही है. रालोद के साथ गठबंधन के बावजूद BJP जानती है कि जाट नेतृत्व को सीधे सत्ता में हिस्सेदारी देना राजनीतिक रूप से जरूरी है. चौधरी का कद संगठन और सरकार दोनों में संतुलन बनाने वाला माना जाता है.

दलित राजनीति में नई पैठ की कोशिश

BJP का दूसरा बड़ा फोकस दलित राजनीति है. सुरेंद्र दिलेर और कृष्णा पासवान को शामिल कर पार्टी ने दो अलग-अलग संदेश दिए हैं. सुरेंद्र दिलेर वाल्मीकि समुदाय से आते हैं. यह वही वर्ग है, जहां BJP पिछले कुछ वर्षों में लगातार राजनीतिक विस्तार करने की कोशिश कर रही है. हाथरस और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित इलाकों में BJP को यह एहसास हुआ कि केवल प्रतीकात्मक राजनीति से काम नहीं चलेगा. ऐसे में युवा वाल्मीकि चेहरे को मंत्री बनाकर पार्टी ने प्रतिनिधित्व का संदेश देने की कोशिश की है. 

कृष्णा पासवान का चयन और भी ज्यादा राजनीतिक महत्व रखता है. वे चौथी बार विधायक हैं और संगठन के जमीनी ढांचे से ऊपर उठकर आई नेता मानी जाती हैं. BJP ने उन्हें शामिल कर यह दिखाने की कोशिश की कि पार्टी केवल बड़े राजनीतिक परिवारों या प्रभावशाली नेताओं तक सीमित नहीं है. दलित महिला चेहरे को जगह देकर BJP ने महिला वोट बैंक और SC समाज दोनों को साधने का प्रयास किया है. 

दरअसल, समाजवादी पार्टी लंबे समय से यह आरोप लगाती रही है कि BJP की राजनीति में दलितों को केवल प्रतीकात्मक स्थान मिलता है. योगी कैबिनेट विस्तार में दलित मंत्रियों की संख्या बढ़ाकर 10 करना इसी आरोप की काट के रूप में देखा जा रहा है.

ब्राह्मण और क्षेत्रीय असंतुलन को साधने की कवायद

पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण असंतोष की चर्चा लगातार होती रही है. विपक्ष ने कई बार यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की कि योगी सरकार में ठाकुर नेतृत्व हावी है और ब्राह्मणों की उपेक्षा हो रही है. BJP इस धारणा को तोड़ने की कोशिश लगातार करती रही है. मनोज कुमार पांडे को कैबिनेट मंत्री बनाना इसी रणनीति का हिस्सा है. वे लंबे समय तक समाजवादी पार्टी का ब्राह्मण चेहरा रहे. अखिलेश यादव के करीबी माने जाने वाले पांडे का BJP में आना केवल एक नेता का दल बदल नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीकवाद भी है. BJP यह संदेश देना चाहती है कि SP के भीतर भी ब्राह्मण नेतृत्व असहज है और उसका स्वाभाविक राजनीतिक ठिकाना BJP बन सकती है. 

पांडे को कैबिनेट में शामिल कर BJP ने एक साथ कई राजनीतिक लक्ष्य साधने की कोशिश की है. पहला, ब्राह्मण समाज को सत्ता में हिस्सेदारी का भरोसा देना. दूसरा, समाजवादी पार्टी के भीतर राजनीतिक असंतोष को सार्वजनिक करना. और तीसरा, यह दिखाना कि BJP अब भी सर्वसमावेशी सामाजिक गठबंधन की राजनीति कर रही है.

यह विस्तार सिर्फ जातीय गणित तक सीमित नहीं है. इसमें क्षेत्रीय संतुलन का भी खास ध्यान रखा गया है. वाराणसी से हंसराज विश्वकर्मा, कन्नौज से कैलाश राजपूत, अलीगढ़ से सुरेंद्र दिलेर, फतेहपुर से कृष्णा पासवान और पश्चिमी यूपी से भूपेंद्र चौधरी को शामिल करना दिखाता है कि BJP 2027 से पहले पूरे राज्य में संगठनात्मक ऊर्जा बनाए रखना चाहती है. लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल और पश्चिमी यूपी दोनों क्षेत्रों में BJP को अपेक्षा के अनुरूप सफलता नहीं मिली थी. ऐसे में पार्टी अब क्षेत्रीय असंतोष को सत्ता में प्रतिनिधित्व देकर कम करने की रणनीति पर काम कर रही है. 

PDA की चुनौती कितनी गंभीर?

समाजवादी पार्टी का PDA अभियान दरअसल मंडल राजनीति के नए संस्करण के रूप में देखा जा रहा है. अखिलेश यादव ने यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को जोड़ने की कोशिश की है. लोकसभा चुनाव में कई सीटों पर इसका असर दिखाई भी दिया जब BJP महज 33 सीटें ही जीत सकी थी जबकि सपा ने 36 लोकसभा सीटें जीती थीं. इस तरह NDA ने यूपी में 36 तथा इंडिया गठबंधन ने कुल 43 लोकसभा सीटें जीती थीं. राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ के जय नारायण डिग्री कालेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख ब्रजेश मिश्र बताते हैं, “BJP को सबसे ज्यादा चिंता इसी बात की है कि अगर गैर-यादव पिछड़ा वर्ग और दलित वोटों का एक हिस्सा भी SP की ओर स्थायी रूप से शिफ्ट होने लगा, तो 2027 की लड़ाई कठिन हो सकती है. इसलिए पार्टी अब केवल हिंदुत्व के सहारे नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति के जरिए जवाब देने की कोशिश कर रही है.” 

योगी कैबिनेट विस्तार में यही रणनीति साफ दिखाई देती है. BJP ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसके यहां OBC, दलित और सवर्ण सभी को सत्ता में भागीदारी मिल रही है. यही कारण है कि विस्तार के बाद सरकार में पिछड़ा वर्ग के मंत्रियों की संख्या 25, दलित मंत्रियों की संख्या 10 और ब्राह्मण मंत्रियों की संख्या 8 हो गई है. इसके अलावा योगी मंत्रिमंडल में राजपूत वि‍धायकों की संख्या 06, वैश्य 04, भूमिहार 02 और अन्य जिनमें सिख व मुस्ल‍िम भी शामिल हैं, की संख्या 05 हैं. इस तरह पहली बार योगी मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों की कुल संख्या 60 पहुंच गई है. 

संगठन और सरकार के बीच संतुलन
इस विस्तार का एक और महत्वपूर्ण पहलू संगठन और सरकार के बीच तालमेल बनाना है. भूपेंद्र चौधरी जैसे नेता लंबे समय तक संगठन में रहे. उन्हें वापस सरकार में लाकर BJP ने यह संकेत दिया है कि चुनावी लड़ाई में संगठनात्मक अनुभव रखने वाले नेताओं की भूमिका बढ़ाई जाएगी. 

इसी तरह हंसराज विश्वकर्मा जैसे कैडर नेताओं को मंत्री बनाना भी BJP की पारंपरिक संगठनात्मक राजनीति को मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है. ब्रजेश मिश्र बताते हैं, “BJP की राजनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बूथ और संगठन स्तर पर सामाजिक प्रतिनिधित्व तैयार करने की कोशिश भी करती है. यह विस्तार उसी मॉडल को आगे बढ़ाता दिखता है.”

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