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योगी आदित्यनाथ का जापान-सिंगापुर दौरा चुनावी साल के लिहाज से कितना सफल रहा?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की विदेश यात्रा को 2029-30 तक राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में एक अहम पड़ाव बताया जा रहा है

हाई स्पीड ट्रेन में सवार हुए सीएम योगी. (Photo: Screengrab)
जापान में 600 किमी/घंटा की स्पीड से चलने वाली मैग्लेव ट्रेन में सवार योगी आदित्यनाथ
अपडेटेड 27 फ़रवरी , 2026

चुनावी साल में योगी आदित्यनाथ का सिंगापुर और जापान दौरा सिर्फ एक औपचारिक विदेशी यात्रा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति और विकास नैरेटिव के लिहाज से अहम कदम के रूप में देखा जा रहा है. 23 से 26 फरवरी के बीच चार दिन के इस दौरे के दौरान 1.5 लाख करोड़ रुपये के एमओयू साइन हुए और करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया गया. सरकार इसे 2029-30 तक राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में एक अहम पड़ाव बता रही है, जबकि विपक्ष इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल उठा रहा है.

दौरे का सबसे चर्चित पड़ाव जापान का यामानाशी प्रीफेक्चर रहा, जहां ग्रीन हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी पर समझौता हुआ. मुख्यमंत्री ने इसे प्रधानमंत्री मोदी के नेट जीरो लक्ष्य की दिशा में बड़ा कदम बताया और कहा कि इस समझौते के तहत प्रदेश के उच्च तकनीकी संस्थानों के छात्रों को जापान में प्रशिक्षण मिलेगा. साथ ही ग्रीन हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी को उद्योग, सार्वजनिक परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र में लागू करने की तैयारी होगी. 

सरकार का कहना है कि इससे प्रदेश को भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था में बढ़त मिलेगी. जापान प्रवास के दौरान मुख्यमंत्री योगी ने 500 किमी प्रति घंटे से अधिक रफ्तार वाली SCMAGLEV या सुपरकंडक्टिंग मैग्नेटिक लेविटेशन हाई-स्पीड ट्रेन की सवारी भी की. उन्होंने इसे सिर्फ तेज रफ्तार का प्रतीक नहीं, बल्कि स्वच्छ और ऊर्जा दक्ष परिवहन व्यवस्था का उदाहरण बताया. यामानाशी में उन्होंने Mount Fuji का भी दर्शन किया और जापान की सांस्कृतिक अनुशासन और तकनीकी क्षमता की सराहना की. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की तस्वीरें और संदेश चुनावी साल में विकास और आधुनिकता की छवि को मजबूत करते हैं.

यात्रा के दौरान कई बड़ी जापानी कंपनियों से समझौते हुए. इनमें Kubota Corporation, Japan Aviation Electronics Industry और Nagase & Co. Ltd. जैसी कंपनियां शामिल हैं. बिजनेस टू गवर्नमेंट बैठकों में Suzuki Motor Corporation, Honda Cars India Limited, Mitsui & Co.Ltd., Marubeni Corporation और MUFG Bank जैसी कंपनियों की भागीदारी बताई गई. प्रस्तावित निवेश के क्षेत्र कृषि मशीनरी, ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, ग्रीन हाइड्रोजन, लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग तक फैले हुए हैं. यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी क्षेत्र में 500 एकड़ में “जापान सिटी” विकसित करने की घोषणा भी की गई है, जहां जापानी कंपनियों के लिए विशेष औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र बनाया जाएगा. 

जापान में एक औद्योगिक इकाई का निरीक्षण करते सीएम योगी
जापान में एक औद्योगिक इकाई का निरीक्षण करते सीएम योगी

इसके अलावा आईआईटी कानपुर, आईआईटी बीएचयू, हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी और मदन मोहन मालवीय यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के साथ मिलकर ग्रीन हाइड्रोजन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने की योजना है. सरकार का दावा है कि इससे शोध, कौशल विकास और औद्योगिक निवेश को एक साथ बढ़ावा मिलेगा.

सिंगापुर दौरे में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहाल यानी एमआरओ, कार्गो हब, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स और फिनटेक जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा हुई. जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को एमआरओ और कार्गो हब के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर भी बातचीत हुई. मुख्यमंत्री योगी ने वहां के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात कर औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया. सरकारी प्रवक्ता का कहना है कि यह दौरा निवेश, तकनीक और वैश्विक साझेदारी के लिहाज से बेहद सफल रहा. 

लेकिन राजनीतिक परिदृश्य में तस्वीर इतनी एकतरफा नहीं है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने इन समझौतों की व्यवहारिकता पर सवाल उठाए हैं. समाजवादी पार्टी के लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक यादव कहते हैं, “पहले भी कई इन्वेस्टर्स समिट में बड़े एमओयू साइन हुए, लेकिन जमीन पर निवेश कम ही दिखाई पड़ रहा है.” उनका कहना है कि चुनाव से ठीक पहले बड़े आंकड़ों की घोषणा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश भर है. 

कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी पूछा कि 1.5 लाख करोड़ के एमओयू में से कितने प्रोजेक्ट समयबद्ध तरीके से धरातल पर उतरेंगे. राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय मानते हैं कि मुख्यमंत्री इस दौरे के जरिए दो संदेश देना चाहते हैं. पहला, उत्तर प्रदेश अब पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर वैश्विक निवेश का केंद्र बन रहा है. दूसरा, प्रदेश का विकास मॉडल राष्ट्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताओं के अनुरूप है. इससे शहरी मध्यम वर्ग, उद्योग जगत और युवाओं के बीच सकारात्मक धारणा बनाने में मदद मिल सकती है.

चुनावी साल में विकास और निवेश की भाषा का अपना महत्व होता है. बेरोजगारी, महंगाई और कृषि आय जैसे मुद्दों के बीच यदि सरकार बड़े निवेश और रोजगार सृजन की संभावना दिखा पाती है, तो वह राजनीतिक विमर्श को अपने पक्ष में मोड़ सकती है. खासकर तब, जब ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और डेटा सेंटर जैसे सेक्टर भविष्य की अर्थव्यवस्था से जुड़े प्रतीक बन चुके हों. 

हालांकि, कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि एमओयू और वास्तविक निवेश के बीच लंबा फासला होता है. उनका कहना है कि जमीन उपलब्धता, नीतिगत स्थिरता, स्थानीय स्तर पर अनुमति प्रक्रिया और बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं तय करेंगी कि निवेश कितनी तेजी से आता है. वे यह भी जोड़ते हैं कि जापान और सिंगापुर जैसे देशों से तकनीकी सहयोग लंबे समय में फायदेमंद हो सकता है, बशर्ते उसे संस्थागत रूप दिया जाए.

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