
पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एंट्री को अगर केवल एक स्टार प्रचारक की सक्रियता मान लिया जाए तो यह तस्वीर अधूरी होगी. दरअसल, BJP ने उन्हें बंगाल में उतारकर एक बहुस्तरीय राजनीतिक रणनीति को जमीन पर उतारने की कोशिश की है जहां हिंदुत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और विकास का 'मॉडल' एक साथ बुना जा रहा है.
पश्चिम बंगाल चुनाव में योगी आदित्यनाथ को BJP ने स्टार प्रचारकों की अग्रिम पंक्ति में रखा है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद योगी उन नेताओं में शामिल हैं, जिनकी सबसे ज्यादा करीब 20 रैलियां प्रस्तावित हैं. पार्टी रणनीति के तहत उन्हें खास तौर पर उन सीटों पर उतारा जा रहा है, जहां हिंदुत्व और ध्रुवीकरण का प्रभाव निर्णायक माना जाता है.
2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी योगी आदित्यनाथ ने तीन दर्जन से अधिक जनसभाएं की थीं और कई रोड शो में हिस्सा लिया था. उस दौरान उनके भाषणों में भी हिंदुत्व, घुसपैठ और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे प्रमुख रहे थे. BJP को जिन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन मिला, वहां योगी की सभाओं को भी एक अहम फैक्टर माना गया था. यही वजह है कि 2026 के चुनाव में पार्टी उन्हें और ज्यादा आक्रामक और व्यापक अभियान के साथ मैदान में उतार रही है.

12 अप्रैल को सोनामुखी, नंदकुमार और कांथी दक्षिण में हुई उनकी जनसभाएं इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं, जिनमें उन्होंने ममता बनर्जी सरकार, वामपंथ और कांग्रेस पर एक साथ आक्रामक हमला बोला. कांथी में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी के योगी आदित्यनाथ के चरण स्पर्श करने की घटना ने एक प्रतीकात्मक संदेश दिया. यह केवल व्यक्तिगत सम्मान का मामला नहीं था, बल्कि BJP के भीतर योगी की स्थिति को भी दर्शाता है. उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जा रहा है जो पार्टी के वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे का केंद्र हैं.
हिंदुत्व का आक्रामक चेहरा और बंगाल की जमीन
बंगाल में BJP की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि वह यहां अपनी वैचारिक जमीन को स्थाई रूप से मजबूत करे. पिछले कुछ चुनावों में पार्टी ने हिंदुत्व के मुद्दे पर अच्छा खासा वोट शेयर हासिल किया, लेकिन सत्ता तक नहीं पहुंच पाई. ऐसे में पार्टी को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो इस विचारधारा को बिना किसी झिझक के आक्रामक तरीके से सामने रख सके. योगी आदित्यनाथ इस भूमिका में पूरी तरह फिट बैठते हैं. बंगाल चुनाव में चुनावी रैलियों की शुरुआत करते ही योगी ने TMC के ‘मां-माटी-मानुष’ के नारे पर भी सवाल खड़ा कर दिया. उन्होंने कहा कि आज बंगाल में मां-बहन असुरक्षित हैं, माटी घुसपैठियों के कब्जे में और मानुष भयभीत व असहाय है. बंगाल में तृणमूल व वामपंथी गुंडों का उपचार सिर्फ BJP के पास है. TMC का पूरा मतलब तुष्टिकरण, माफियाराज और कट मनी है.

इस तरह योगी ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि बंगाल की मौजूदा पहचान संकट में है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह रणनीति BJP के कोर वोटर को मजबूत करने के लिए बेहद अहम है. लखनऊ स्थित बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, “BJP बंगाल में वैचारिक ध्रुवीकरण को अंतिम स्तर तक ले जाना चाहती है. योगी आदित्यनाथ इसके सबसे प्रभावी चेहरा हैं, क्योंकि वे बिना किसी राजनीतिक संकोच के हिंदुत्व को केंद्र में रखते हैं.”
बांग्लादेशी हिंदुओं का मुद्दा और भावनात्मक राजनीति
योगी आदित्यनाथ के भाषणों का दूसरा बड़ा स्तंभ बांग्लादेशी हिंदुओं का मुद्दा रहा. उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों का जिक्र करते हुए ममता बनर्जी सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए. यह मुद्दा केवल अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का संदर्भ नहीं है, बल्कि बंगाल की स्थानीय राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ है. बंगाल की सीमाएं बांग्लादेश से लगती हैं और घुसपैठ का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है.
योगी ने मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों का जिक्र करते हुए यह संकेत दिया कि राज्य की डेमोग्राफी बदल रही है. यह बयान सीधे तौर पर उन मतदाताओं को संबोधित करता है जो सांस्कृतिक पहचान और जनसंख्या संतुलन को लेकर चिंतित हैं. कोलकाता के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मधुकर सेन का मानना है, “बांग्लादेशी हिंदुओं का मुद्दा BJP के लिए एक भावनात्मक सेतु का काम करता है. इससे पार्टी न केवल सहानुभूति पैदा करती है, बल्कि असुरक्षा की भावना को भी राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश करती है.”
पश्चिमी बंगाल में उत्तरी 24 परगना के सोदेपुर में, आदित्यनाथ की तस्वीरें वाले बड़े-बड़े होर्डिंग्स प्रमुखता से लगाए गए हैं, जबकि एंटाली में, बुलडोज़र वाले पोस्टरों पर भ्रष्टाचार और अराजकता को खत्म करने का संदेश दिया गया है. बेनियादपुर में, नामांकन पत्र दाखिल करने आए BJP कार्यकर्ताओं को बुलडोज़र पर सवार देखा गया, जिससे पार्टी की इस छवि को एक राजनीतिक बयान में बदलने की कोशिश साफ झलकती है. ऐसे में योगी आदित्यनाथ की पहचान केवल एक हिंदुत्ववादी नेता के रूप में ही नहीं, बल्कि 'सख्त प्रशासक' के रूप में भी बनाई गई है.
उत्तर प्रदेश में उनके 'बुलडोजर मॉडल' को BJP ने एक राजनीतिक ब्रांड में बदल दिया है. बंगाल में भी इसी मॉडल को आक्रामक तरीके से पेश किया जा रहा है. उनके भाषणों में बार-बार यह बात सामने आई कि 'गुंडों का इलाज' केवल BJP के पास है. यह संदेश उन मतदाताओं को लक्षित करता है जो कानून-व्यवस्था और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं.

BJP यह दिखाना चाहती है कि जिस तरह उत्तर प्रदेश में अपराध पर नियंत्रण पाया गया, उसी तरह बंगाल में भी यह संभव है. सुशील पांडेय कहते हैं, “बंगाल में कानून-व्यवस्था का मुद्दा हमेशा से चुनावी बहस का हिस्सा रहा है. योगी आदित्यनाथ इस मुद्दे को एक ठोस उदाहरण के साथ पेश करते हैं, जिससे उनका संदेश ज्यादा प्रभावी बनता है.”
बंगाल से यूपी तक: दोहरे राजनीतिक लक्ष्य
योगी आदित्यनाथ के भाषणों में केवल हिंदुत्व या सुरक्षा की बात ही नहीं होती, बल्कि वे उत्तर प्रदेश के विकास मॉडल को भी प्रमुखता से सामने रखते हैं. उन्होंने अपने भाषणों में एमएसएमई, रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर के आंकड़े गिनाते हुए यह दिखाने की कोशिश की कि BJP की सरकार केवल वैचारिक नहीं, बल्कि विकासात्मक भी है. बंगाल में पसीना बहा रहे यूपी के सहकारिता मंत्री जेपीएस राठौर के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी यह संदेश देते हैं कि अगर बंगाल में भी BJP की सरकार बनेगी, तो केंद्र और राज्य मिलकर विकास की गति को तेज करेंगे.
बंगाल में योगी आदित्यनाथ की सक्रियता को केवल राज्य की राजनीति तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता. इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक लक्ष्य उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव भी हैं. 12 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में चुनावी अभियान शुरू करने के एक दिन पहले 11 अप्रैल को योगी लखीमपुर खीरी में थारु बाहुल्य इलाके में थे. यहां उन्होंने मियांपुर का नाम बदलकर रविंद्रनगर किए जाने को गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर से जोड़ा. वे बार-बार यूपी के 'नो कर्फ्यू, नो दंगा' और 'सख्त शासन' का जिक्र करते हैं.
यह संदेश बंगाल के मतदाताओं के साथ-साथ यूपी के मतदाताओं तक भी पहुंचता है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह एक तरह से 'डुअल कैंपेन' है जहां एक राज्य में प्रचार करते हुए दूसरे राज्य के लिए जमीन तैयार की जा रही है. रैलियों में उमड़ती भीड़, बसों की छतों पर सवार होकर पहुंचते लोग और भगवा प्रतीकों की मौजूदगी- ये सभी संकेत देते हैं कि BJP इस चुनाव को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में पेश करना चाहती है.
जोखिम और संभावनाएं
हालांकि, यह रणनीति पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं है. राजनीतिक विश्लेषक मधुकर सेन के मुताबिक बंगाल की राजनीति ऐतिहासिक रूप से सांस्कृतिक और भाषाई पहचान पर आधारित रही है. यहां बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा भी अक्सर उभरता है. ऐसे में योगी आदित्यनाथ जैसे बाहरी नेता का आक्रामक अंदाज कुछ वर्गों को आकर्षित कर सकता है, तो कुछ को असहज भी कर सकता है.
लखनऊ में रह रहे कोलकाता में 25 वर्ष तक शिक्षण कार्य करने वाले व राजनीतिक विश्लेषक सौम्यजीत घोष कहते हैं, “BJP का यह दांव हाई-रिस्क, हाई-रिवार्ड जैसा है. अगर ध्रुवीकरण सफल होता है तो पार्टी को फायदा हो सकता है, लेकिन अगर यह उल्टा पड़ा तो TMC इसे ‘बाहरी हस्तक्षेप’ के रूप में भुना सकती है.”

